सत्य
सत्य को छोड़कर हम चैन से जी नहीं सकते
असत्य कितना भी मोहक हो
विष में बदल जायेगा
यह जानते हुए उसे पी नहीं सकते
हिंसा असत्य से उपजी है
हिंसा अक्षम्य है
जीवन की माँग है सत्य
वह वहीं पनपता है
जहां सामंजस्य हो विपरीत ध्रुवों में
जहां अलगाव नहीं
मेल की चाह हो
जहां बेहोशी जीने का ढंग न बन जाये
शुतुरमुर्गीय चलन
न अपना लिया जाये
हर संकट को देख
जहां हर उस राह पर
चलने की तैयारी हो
जो शांति में नये विश्वास को जन्म दे
जो जड़ों तक जाकर समाधान सुझाये
क्योंकि सत्य को छोड़कर
हम चैन से जी नहीं सकते !



