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गुरुवार, जनवरी 16

मन


मन 

सुख-दुःख, राग-द्वेष के तट पर नदिया जैसा बहता है मन, इस तट आकर पुलकित होता उस तट उदग्विन रहता है मन ! मिट कर चैन मिले न जाने किरणों संग यदि उड़ जाये, उसी एक से एक हुआ तब नजर नहीं किसी को आये ! किन्तु उसे दूर जाना है लक्ष्य कई मन में पाले हैं, पाहन, जंगल, विजन, शहर भी उसके रस्ते में आने हैं ! नहीं ज्ञात है आखिर में तो हर नदिया को मिटना होगा, सागर के खारे जल में ही सूरज के संग तपना होगा !