मन
सुख-दुःख, राग-द्वेष के तट पर
नदिया जैसा बहता है मन,
इस तट आकर पुलकित होता
उस तट उदग्विन रहता है मन !
मिट कर चैन मिले न जाने
किरणों संग यदि उड़ जाये,
उसी एक से एक हुआ तब
नजर नहीं किसी को आये !
किन्तु उसे दूर जाना है
लक्ष्य कई मन में पाले हैं,
पाहन, जंगल, विजन, शहर भी
उसके रस्ते में आने हैं !
नहीं ज्ञात है आखिर में तो
हर नदिया को मिटना होगा,
सागर के खारे जल में ही
सूरज के संग तपना होगा !
