शुक्रवार, जुलाई 17

मिथ्या-अमिथ्या

मिथ्या-अमिथ्या 


बादल ज्यों नभ में आकार लेते हैं 
और पल में बदल जाते हैं 
सागर में लहरें, बूंदें, फेन बनती, बिगड़ती हैं 
गगन पर नक्षत्र  उगते, अस्त होते हैं 
कहीं  कोई स्थिर नहीं... 
देह में कोशिकाएं जन्मती-मरती रहती हैं प्रतिक्षण 
मन एक सरिता की भांति 
बहता जाता है अनंत काल से 
क्रोध, प्रेम, उदारता की लहरें जिसमें 
उमगती मिटती रही हैं हजारों बार 
जो अभी था, अभी नहीं है 
 मिथ्या है
जैसे पर्दे पर कोई तस्वीर हो चलती फिरती 
छुपा है वह प्रोजेक्टर जो पीछे से 
भेज रहा है प्रकाश  
जिससे बनती हैं ये सारी आकृतियां 
उसे खोजें और पल भर के लिए ही कभी 
रिक्त हो जाये पट 
शायद उस क्षण मिलन होगा उससे 
जो मिथ्या नहीं है !


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