गुरुवार, जुलाई 22

एक चिंगारी असल की

एक चिंगारी असल की 

दर्द भीतर सालता जो 

प्रेम बनकर वह बहेगा,  

भूल चुभती शूल बनकर 

पंक से सरसिज खिलेगा !


खोल दो हृदय को अपने 

जब साथ है रहबर खड़ा, 

लक्ष्य अपना एक हो तो 

विष  यहाँ अमीय बनेगा !


परख लो हर बात अपनी 

बनी हो चाहे बिगड़ती,  

सत्य का दामन न छोड़ा 

झूठ फिर कब तक टिकेगा !


सौ भ्रमों से ढका हो मन 

ज़िंदगी आसान लगती, 

एक चिंगारी असल की 

खेल फिर कब तक टिकेगा !


हुआ सच से सामना जब 

नहीं कोई ठौर मिलता, 

नींद स्वप्नों से भरी हो 

जागना इक दिन पड़ेगा !




13 टिप्‍पणियां:

  1. सादर नमस्कार,
    आपकी प्रविष्टि् की चर्चा शुक्रवार (23-07-2021) को "इंद्र-धनुष जो स्वर्ग-सेतु-सा वृक्षों के शिखरों पर है" (चर्चा अंक- 4134) पर होगी। चर्चा में आप सादर आमंत्रित हैं।
    धन्यवाद सहित।

    "मीना भारद्वाज"

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  2. खोल दो हृदय को अपने

    जब साथ है रहबर खड़ा,

    लक्ष्य अपना एक हो तो

    विष यहाँ अमीय बनेगा !
    बिल्कुल जागना पड़ता एक दिन । बहुत सुंदर भाव से सुसज्जित रचना

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  3. बहुत सुंदर, बहुत खूब। सादर बधाई आपको।

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  4. आप सभी सुधीजनों का हृदय से स्वागत व आभार!

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  5. दर्द भीतर सालता जो
    प्रेम बनकर वह बहेगा,

    भूल चुभती शूल बनकर

    पंक से सरसिज खिलेगा !

    बहुत सुंदर सृजन अनीता जी,सादर

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  6. परख लो हर बात अपनी
    बनी हो चाहे बिगड़ती,
    सत्य का दामन न छोड़ा
    झूठ फिर कब तक टिकेगा !

    सुन्दर सृजन...

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