मंगलवार, अक्तूबर 26

जाना है उस दूर डगर पर

जाना है उस दूर डगर पर

दिल में किसी शिखर को धरना
सरक-सरक कर बहुत जी लिए,
पंख लगें उर की सुगंध को
गरल बंध के बहुत पी लिए !

जाना है उस दूर डगर पर
जहाँ खिले हैं कमल हजारों,
पार खड़ा कोई लखता है
एक बार मन उसे पुकारो !

जहाँ गीत हैं वहीं छिपा वह
शब्द, नि:शब्द युग्म के भीतर,
भीतर रस सरिता न बहती
यदि छंद बद्ध न होता अंतर !

सागर सा वह मीन बनें हम
संग धार के बहते जाएँ,
झरने फूटें सुर के जिस पल
 झरे वही, लय में ले जाये !

रिक्त रहा है जो फूलों से
विटप नहीं वह बन कर रहना,
गंध सुलगती जो अंतर में
वह भी चाहे अविरत बहना !

निशदिन जो बंधन में व्याकुल
मुक्त उड़े वह नील गगन में,
प्रीत झरे जैसे झरते हैं
हरसिंगार प्रभात वृक्ष से  !

9 टिप्‍पणियां:

  1. जी नमस्ते ,
    आपकी इस प्रविष्टि् के लिंक की चर्चा कल गुरुवार(२८-१०-२०२१) को
    'एक सौदागर हूँ सपने बेचता हूँ'(चर्चा अंक-४२३०)
    पर भी होगी।
    आप भी सादर आमंत्रित है।
    सादर

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  2. बहुत ही सुंदर ! गहन छाया वादी सृजन गहन अर्थ समेटे
    अध्यात्म में विलीन होता लेखन।
    बहुत सुंदर।

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  3. रिक्त रहा है जो फूलों से
    विटप नहीं वह बन कर रहना,
    गंध सुलगती जो अंतर में
    वह भी चाहे अविरत बहना !
    वाह!!!
    बहुत ही सारगर्भित सृजन।

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  4. सुधा जी, कुसुम जी, सरिता जी तथा प्रसन्न वादन जी आप सभी का स्वागत व आभार!

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