शुक्रवार, अक्तूबर 29

टेर लगाती इक विहंगिनी

टेर लगाती इक विहंगिनी


इन्द्रनील सा नभ नीरव है

लो अवसान हुआ दिनकर का,

इंगुर छाया पश्चिम में ज्यों  

हो श्रृंगार सांध्य बाला का !


उडुगण छुपे हुए जो दिन भर

राहों पर दिप-दिप दमकेंगे,

तप्त हुई वसुधा इतरायी

शीतलता चंद्रमा देंगे !


उन्मीलित से सरसिज सर में

सूर्यमुखी भी ढलका सा है,

करे उपराम भास्कर दिन का 

अमी गगन से छलका सा है !


कर-सम्पुट  में भरे पुष्पदल

संध्या वन्द करें बालाएं,

कन्दुक खेलें बाल टोलियाँ

लौट रहीं वन से चर गाएं !


तिमिर घना ज्यों कुंतल काले

संध्या सुंदरी के चहुँ ओर,

टेर लगाती इक विहंगिनी

केंका करते लौटें मोर !




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