मंगलवार, फ़रवरी 3

अनुराग बहे भीतर

अनुराग बहे भीतर 

जड़ता से मुक्त हृदय 
आओ नव सृजन करें, 
बिखरा दें श्रम सीकर  
सुमनों से धरा भरें ! 

संतोषी अंतर मन 
पुलकित हो गात सदा, 
जीवन को खेल समझ 
बढ़ती हो बात सदा ! 

विराग ना राग रहे 
अनुराग बहे भीतर, 
उन्माद पिघल जाये 
बस जाग रहे भीतर ! 

भावों के दीप जलें 
विवाद ना शुष्क करें 
उर सदा कृतज्ञ रहे 
जन्मों का दर्द हरें ! 

अग्निमयी  बुद्धि  जले 
भीतर आनंद पले,  
युग-युग से मुरझाया 
जीवन का पुष्प खिले ! 

12 टिप्‍पणियां:



  1. आपकी लिखी रचना ब्लॉग "पांच लिंकों का आनन्द" बुधवार 4 फरवरी 2026 को साझा की गयी है......... पाँच लिंकों का आनन्द पर आप भी आइएगा....धन्यवाद!
    अथ स्वागतम शुभ स्वागतम।

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  2. आपकी लिखी रचना "पांच लिंकों के आनन्द में शनिवार 14 मार्च, 2026 को लिंक की जाएगी .... http://halchalwith5links.blogspot.in पर आप भी आइएगा ... धन्यवाद!

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  3. भावों के दीप जलें
    विवाद ना शुष्क करें
    उर सदा कृतज्ञ रहे
    जन्मों का दर्द हरें !
    सुन्दर प्रस्तुति

    जवाब देंहटाएं