मौन
देह करे अवशोषण भोजन का
इतना ही तो पर्याप्त नहीं
हर विचार, भावना और हर अनुभव को
आत्मसात करे मन भी !
जीना है हर पल को शिद्दत से
न रहे कोई कटु स्मृति
न भीतर रह जाये
कोई अधपका विचार
संतुलन ही वह अग्नि है
जो भीतर जगानी है
देह और श्वास हों जब संतुलित
प्राण बहते हैं भीतर अबाधित
साहस जगता है वैसे ही
जैसे रात के बाद दिन
संतुलन केवल मौन नहीं है
वहाँ प्राणों की धारा बहती है
और ह्रदय ज्ञान से जगमगा उठता है !
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बहुत सुंदर अभिव्यक्ति
जवाब देंहटाएंस्वागत व आभार प्रियंका जी !
हटाएंआपकी लिखी रचना ब्लॉग "पांच लिंकों का आनन्द" पर मंगलवार 14 जुलाई 2026 को लिंक की गयी है....
जवाब देंहटाएंhttp://halchalwith5links.blogspot.in पर आप सादर आमंत्रित हैं, ज़रूर आइएगा... धन्यवाद!
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बहुत बहुत आभार रवींद्र जी !
हटाएंसुन्दर
जवाब देंहटाएंस्वागत व आभार हरीश जी!
हटाएंसही कहा आपने
जवाब देंहटाएंस्वागत व आभार !
हटाएंभोजन तो हर कोई कर लेता है
जवाब देंहटाएंविचार और भावना को जगाना जरुरी है
स्वागत व आभार !
हटाएंसुंदर
जवाब देंहटाएंस्वागत व आभार !
हटाएंसुंदर
जवाब देंहटाएंस्वागत व आभार!
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