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मंगलवार, अप्रैल 21

राम

राम  

ग्रीष्म-शीत आते औ' जाते, 
सदा वसन्त राम अंतर में, 
संध्या के स्वर सदा गूँजते 
रात्रि-दिवस की हर बेला में !

कोना-कोना होता गुंजित 
कोकिल के मधुरिम गीतों से,
सदा महकता उर का उपवन 
ब्रह्म कमल की मृदु सुगन्ध से !

समता का शुभ अनिल विचरता 
रस की खानों से मधु रिसता,
शशधर की शीतल आभा से 
भीगा हुआ प्रेम भी झरता !

उर सरिता के ठहरे जल में 
प्रातः अरुण निज मुखड़ा धोता,
दिन भर विचरण करता नभ में 
 आ पुनः वहीं विश्रांति पाता  !

मंगलवार, फ़रवरी 5

नव बसंत आया



नव बसंत आया

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सरसों फूली कूकी कोयल
पंछी चहके कुदरत चंचल,
नवल राग गाया जीवन ने
नव बसंत लाया कोलाहल !

भँवरे जैसे तम से जागे
फूल-फूल से मिलने भागे,
तितली दल नव वसन धरे है
मधुमास कहता बढ़ो आगे !

आम्र मंजरी बौराई सी
निज सुरभि कलश का पट खोले,
रात-बिरात का होश न रखे
जी चाहे जब कोकिल बोले !

कुसुमों में भी लगी होड़ है
धारे नूतन रूप विकसते,
हरी-भरी बगिया में जैसे
कण-कण भू का सजा हुलसते !

किसके आमन्त्रण पर आखिर
रंगों का अंबार लगा है,
पवन बसंती मदमाती सी
मनहर बन्दनवार सजा है !

शीत उठाये डेरा डंडा
चहूँ ओर भर गया उल्लास,
नई चेतना भरने आया
समाई जीवन में नव आस !


शनिवार, फ़रवरी 28

कोंपल कोंपल रस झरता


कोंपल कोंपल रस झरता

मदमस्त हुआ आलम सारा
आया वसंत नव कुसुम खिले ,
उमड़ी आती मधुमय सुरभि
पौधों के सोये कोष खुले !

खलिहानों पर छायी मस्ती
शुभ पीताम्बर ओढ़े हँसते,
जल धाराएँ बह निकलीं हैं
हटा शीत की चादर तन से !

तंद्र तज जागे वन प्रान्तर
जीवन से फिर हुआ मिलन,
छूट गया अवांछित था जो
जाग उठा कोई नव रंग !

जाना पहचाना सा प्रियतम
आया मनहर रूप धरे,
बासंती जब पवन बहे तो
सूने अंतर भये हरे !

जीवन फिर अंगड़ाई लेता
नव रूप लिये हँसता खिलता,
ऋतु फागुनी मादक मोहक
कोंपल कोंपल रस झरता !



सोमवार, जनवरी 13

मकर संक्रांति पर शुभकामनायें




मकर राशि में सूर्य का हो रहा प्रवेश
संक्रांति काल लेकर आया पर्व विशेष !

उत्तर में खिचड़ी कहें दक्षिण में है पोंगल
लोहड़ी जो पंजाब में असम में बीहू मंगल !

लकड़ी का एक ढेर हो शीत मिटाए आग
बैर कलुष जल खाक हों पर्व मनायें जाग !

मीठे गुड में तिल मिले नभ में उड़ी पतंग
लोहड़ी की इस आ ने दिल में भरी उमंग !

दाने भुने मकई के भर रेवड़ियाँ थाल
अंतर में उल्लास हो चमकें सबके भाल !

गुरुवार, जनवरी 3

अग्नि ही उनका सखा है


अग्नि ही उनका सखा है

रह-रह कर कंपकंपाते
शीत में तन सिकुड़ जाते,
पात भी कुछ पीत होकर
सर्दियों में थरथराते !

दूब जो पहले हरी थी
सूखती सी रंगी भूरी,
दिन हुआ छोटा सा देखो
शाम से ही रात उतरी !

ओढ़ कंबल ताप सेंकें
बाल, बूढ़े उस सड़क पर
अग्नि ही उनका सखा है
नहीं हीटर और गीजर !

सुबह सूरज भी संवरता
पहन कर पाले का स्वेटर,
हवा तुम विश्राम ले लो
भाव यह होता मुखर !

सर्दियों की भोर अनुपम
दोपहर बैठक सजाती,
स्वेटरों के रंग खिलते
मूंगफली की दाल गलती !

थी गुलाबी सर्दियाँ जो
आज यौवन पा गयी हैं,
घन कोहरे के कारण 
फिर उड़ानें रद हुई हैं !