सोमवार, जनवरी 21

कवि रजनीश तिवारी का काव्य संसार- खामोश,ख़ामोशी और हम में


खामोश, ख़ामोशी और हम के अगले कवि हैं, शिक्षा और पेशे से इलेक्ट्रिकल इंजीनियर श्री रजनीश तिवारी, तिवारी जी को लेखन के साथ फोटोग्राफी भी भाती है, इस संकलन में इनकी छह कवितायें हैं.
सभी जीवन के विविध रंगों को उजागर करती हैं.
पहली कविता एक बूंद में कवि सुबह सवेरे ओस की एक बूंद को देखकर हुई अनुभूति को व्यक्त करता है, जीवन का एक रहस्य जैसे वह बूंद परत दर परत खोलती जाती है.
एक बूंद

ओस की इक बूंद
जमकर घास पर
सुबह सुबह
मोती हो गयी
...
..
फिर वो बूंद
सूरज की किरणों
पर बैठ उड़ गयी
..
कुछ पलों का जीवन
और दिल पर ताजगी भरी
नमकीन अमिट छाप
एक बूंद छोड़ गयी
..
एक बूंद में होता है सागर
..
भरा होता है एक बूंद में
दर्द जमाने भर का
..
प्यार की एक बूंद का नशा उतरता नहीं
..
एक बूंद जिंदगी बना देती है
बूंद-बूंद चखो जाम जिंदगी का
बूंद बूंद जियो जिंदगी
जीवन में लोग अक्सर धोखा खाते हैं, क्योंकि मानव जो है वह उसे स्वीकार नहीं जो होना चाहता है, वही दिखाने का प्रयास उसे छल करने पर विवश कर देता है, इसी कटु सच्चाई को बयान करती है दूसरी कविता छलावा   
छलावा

तुम्हें जो खारा लगता है
वो सादा पानी होता है
... ..
मेरे आंसू क्या सस्ते हैं
जो गैरों के दर्द पर रोयें
दिल नहीं दिखावा है
वही भीतर से रोता है
...
परेशान खुद से ही हूँ मैं
तुम्हारी सुध मैं कैसे लूँ
मुझे फुर्सत कहाँ, तुम्हारी
तकलीफों पर मैं रोऊँ

होता वो नहीं हरदम
नजरों से जो दिखता है
..
खुद को दोष क्या दूँ मैं
शिकायत क्या करूं तेरी
मुझे हर कोई मुझ जैसा
खुद में खोया लगता है

सपने देखना किसे नहीं भाता, कुछ तो सारा जीवन सपनों को देखने में ही बिता देते हैं..कवि ने सपनों का कच्चा चिट्ठा खोल कर रख दिया है सपनों का हिसाब-किताब नामक कविता में-

सपनों का हिसाब-किताब

कल रात बैठा लेकर
सपनों का हिसाब-किताब
अरमान, तमन्नाएँ, सपने
और हासिल का कच्चा चिट्ठा लिए
सोचता रहा कहाँ खर्च किया
पल दर पल खुद को
....
न जाने कितने पन्ने भरे मिले
सपने में ही जीने की दास्ताँ लिए
...
कई मौसम चले गए
टूटे बिखरे सपनों को समेटने में
.. ..
कई बार आंधी-तूफान और बारिश में
सपनों की पोटली सम्हालने
और बचाने में वक्त लगा
...
न जाने कितनी बार बाढ़ में
सपनों को दबाए हुए बगल में
मीलों और बरसों बहता रहा हूँ
... ...
कई बार ऊब भी हुई है सपनों से
तब गठरी छोड़ कर बस की खिडकी से
नीले अनंत आसमान में देखने का दिल किया
...
तैयारी या इंतजार में रहे अक्सर
और हर बार कुछ पल ही जिए
सपनों को सच होता देखते
हाँ, सपनों का खाता खत्म न हुआ

स्मृतियों को बार बार जीना मानव का स्वभाव है, सजीव या निर्जीव जिनसे उसका नाता रहा हो उसकी यादों में वह जिन्दा रहता है, कुछ ऐसा ही अनुभव कवि करता है दिल का रिश्ता में
दिल का रिश्ता

आज छूकर देखा
कुछ पुरानी दीवारों को
..
आज एक पुराने फर्श पर
फैली धूल पर चला
उस परत के नीचे
अब भी मौजूद थे
मेरे चलने के निशान
...
किये साफ कुछ वीरानगी के दाग
बिखरे हिस्सों को समेटा
...
जी उठी दीवार
साँस लेने लगी जमीन
..
खट्टी-मीठी यादों की गंध
फ़ैल गयी हर कोने
दिल का रिश्ता
सिर्फ दिल से ही नहीं
दीवारों से भी होता है

जीवन विरोधी मूल्यों से बना है, काले की पृष्ठ भूमि पर ही सफेद उभर कर आता है, कवि का होना इन्हीं विरोधी भावों पर आधारित है, अपना परिचय देते समय वह एक साथ शांति का सागर और ज्वालामुखी दोनों होना स्वीकारता है
परिचय

पर्वत मैं हूँ स्वाभिमान का
मैं प्रेम का महासमुद्र हूँ
मैं जंगल हूँ भावनाओं का
एकाकी मरुथल हूँ मैं,
... ...
हूँ घाट एक रहस्यों का
संबंधों का महानगर हूँ मैं

झील हूँ मैं एक शांति की
मैं उद्वेगों का ज्वालामुख हूँ
.. ..

हूँ गुफा एक वासनाओं की
भयाक्रांत वनचर हूँ मैं

दावानल हूँ विनाशकारी
मैं शीतल मंद बयार हूँ
..

हूँ इस प्रकृति का एक अंश
सूक्ष्म, तुच्छ मनुष्य हूँ मैं,

कशमकश में कवि अपने लिखने की विभिन्न मुद्राओं को अंकित करता जाता है, हर रचनाकार की तरह वह समझ नहीं पाता कभी चाहने पर भी पंक्ति उतरने से इंकार करती है और कभी सहज ही लेखन घटता है
कशमकश

कभी विचार करते हैं क्रन्दन
और फिर मैं लिखता हूँ
... ..
कभी लिखता हूँ तो कुछ उतरता नहीं ख्यालों में
..
मैं कभी महसूस करता हूँ
किसी क्षण का कंपन
...
कभी चलती है कलम बिना किसी झंकार के
..
कभी लिखते हुए महसूस होता है स्याही का नृत्य
..
कभी जो सोच में घटता है, अहसास में नहीं होता
कभी अहसास का चेहरा ही नहीं पढ़ा जाता
... ...
कभी सोच, सिर्फ सोच रह जाती है संवेदना शून्य
...
कभी सोचता हूँ कुछ, लिख जाता हूँ कुछ और
...
कभी लाइनें ही टकरा जाती हैं आपस में
लड़ बैठती हैं और शब्द भाग जाते हैं

इसी कशमकश में रोज
किसी कविता का करता हूँ नामकरण
या फिर उसे देता हूँ मुखाग्नि  


कवि रजनीश तिवारी जी की कविताएँ काव्य का सुखद अनुभव तो कराती ही हैं, जीवन की सच्चाइयों से भी रूबरू कराती हैं, जीवन सूत्रों को प्रस्तुत करती हैं. आशा है आप सभी सुधी पाठक गण भी इनका रसास्वादन कर आनन्दित होंगे. इनके ब्लॉग का नाम है रजनीश का ब्लॉग- http://rajneesh-tiwari.blogspot.com
इनका इमेल पता है- rajneeshtiwari@live.in





शुक्रवार, जनवरी 18

जहाँ हैं हम अक्सर वहाँ नहीं होते


जहाँ हैं हम अक्सर वहाँ नहीं होते, तभी तो उसके दरस नहीं होते
जिंदगी कैद है दो कलों में, आज को दो पल मयस्सर नहीं होते


जनवरी की रेशमी, गुनगुनी धूप
सहलाती है तन को
बालसूर्य की लोहित रश्मियाँ
लुभाती हैं मन को..
रह-रह के भर जाती है
कुसुम गंध नासपुटों में
बोगेनविला की पत्तियों से
टपकती ओस की बूँदे
अंतर भिगाती हैं..
झरे हुए पुष्पों की पंखुरियाँ
बिछ जाती हैं जब धरा पर
जीवन को उसकी सुंदरता का
अहसास हैं कराती
अम्बर की नीलिमा
लिए जाती है स्वप्न लोक
कूजन खगों की
ज्यों लोरी सुनाती है
पत्तों की सरसराहट, ज्यों
पवन पायल छनकाती है
गुलाबी रंगत कलिका की
कराती है मिलन का अहसास
हर शै कुदरत की ओ खुदा !
तेरी याद है दिलाती
इतनी सुंदर थी यह दुनिया
क्या पहले भी...
तुझसे इश्क के बाद
नजर जो आती है
दूब के तिनके की हरी नोक भी
सुख सरिता बहाती है यहाँ
सड़क पर जाते हुए
हरकारे की आवाज भी
कैसी जगाती है हूक
श्रमिक की खुरपी मानो
जन्नत का संदेश सुनाती है
रचा जा रहा है हर पल
कुछ न कुछ, यह बात
आज समझ में आती है
सूर्य की आभा में लॉन की घास
जब चमचमाती है
वृक्षों की डालियाँ अनोखी
छटा भर मुस्काती हैं !

बुधवार, जनवरी 16

मुक्त गगन सा गीत गा सके



मुक्त गगन सा गीत गा सके

‘सावधान’ का बोर्ड लगाये
हर कोई बैठा है घर में,
मिलना फिर कैसे सम्भव हो
लौट गया वह तो बाहर से !

या फिर चौकीदार है बुद्धि
साहब से मिलने न देती,
ऊसर ऊसर ही रह जाता
अंतर को खिलने न देती !

प्राणों का सहयोग चाहिए
भीतर वह प्रवेश पा सके,
सत्य को जो भी पाना चाहे
मुक्त गगन सा गीत गा सके !

प्रकृति अपने गहन मौन में
निशदिन उसकी खबर दे रही,
सूक्ष्म इशारे करे विपिन भी 
गुपचुप वन की डगर कह रही ! 

पल में नभ पर बादल छाते
गरज-गरज कर कुछ कह जाते
पानी का बौछारें भी तो
पाकर कितने मन खिल जाते !

जो भी कुछ जग दे सकता है
शब्दों में ही घटता है वह,
लेकिन सच है पार शब्द के
जो निशब्द में ही मिलता है !

  

रविवार, जनवरी 13

महाकुम्भ के अवसर पर



अमृत मंथन

यह सारा ब्रह्मांड परम ऊर्जा से भरा कुम्भ है, सूर्य ज्योति कुम्भ है, नव ग्रह इस ऊर्जा को ग्रहण करने व वितरित करने हेतु बने कुम्भ हैं और धरा जीवन कुम्भ है. जीव प्रेम कुम्भ है. मानव देह के भीतर जिस घट-घट वासी परमात्मा का निवास है, वह स्वयं शांति, प्रेम, सुख, आनंद, शक्ति, पवित्रता और ज्ञान का कुम्भ है. ये सभी जिस मूल तत्व से बने हैं वह अमृत्तत्व है, छल-छल छलकता अमृत इन सभी से पल-पल इस सृष्टि में प्रवाहित हो रहा है. इसी की याद दिलाने न जाने कितनी सदियों से पुण्य भूमि भारत में चार पावन तीर्थों पर आयोजित किया जाता है कुम्भ महोत्सव. गंगा के तट पर हरिद्वार, त्रिवेणी तट पर प्रयाग, गोदावरी तट पर नासिक तथा क्षिप्रा तट पर उज्जैन में समय-समय पर ग्रह-नक्षत्र की गणना के अनुसार कुम्भ का आयोजन होता है.
इलाहबाद प्रयाग में होने वाला महाकुम्भ विश्वभर में अपनी विशालता और भव्यता के लिए प्रसिद्ध है, जो बारह पूर्ण कुम्भों के बाद आता है, अर्थात पूरे एक सौ चवालीस वर्षों के बाद. इस वर्ष चौदह जनवरी, मकर संक्रांति के दिन से आरम्भ होने वाला यह पर्व दस मार्च शिवरात्रि के दिन तक चलेगा. पुराणों में कथा आती है, एक बार इंद्र द्वारा दुर्वासा ऋषि का अपमान करने पर उनके शाप के कारण देवता शक्तिहीन हो गए थे, असुर बलशाली होते जा रहे थे. देवताओं को विष्णु ने सुझाव दिया कि दानवों से मैत्री करके, मिलजुल कर वे दोनों सागर मंथन करें तो अमृत की प्राप्ति होगी, सागर मंथन में पहले हलाहल विष निकला जिसे शिव ने ग्रहण किया, जो कल्याणकारी हैं, सृष्टि के कण-कण में बसे हैं, जब अमृत कलश या कुम्भ मिला उसको प्राप्त करने के लिए पुनः देवों व असुरों में युद्ध होने लगा, पूरे बारह दिनों तक युद्ध चला, इस दौरान अमृत की कुछ बूँदें हरिद्वार, प्रयाग, नासिक तथा उज्जैन में गिरीं, जहां हर बारह वर्ष के बाद पूर्ण कुम्भ का आयोजन होता है. इस अमृत का वितरण किया मोहिनी रूपधारी विष्णु ने, अपनी-अपनी रूचि के अनुसार दोनों को उनका प्राप्य मिला.
यह माना जाता है कि उच्च लोकों को जाने का द्वार इन दिनों में खुल जाता है, साधकों की जन्मों की साधना सफल होती है और अमरत्व की प्राप्ति होती है. कहते हैं कि इस मेले में ऐसे अनेक साधु-संत भी आते हैं जो वर्षों से हिमालय की गुफाओं में निवास करते हैं, ऐसे किसी दुर्लभ संत से मिलने की आशा में भी दूर-दूर से लोग यहाँ आते हैं. जन-जन का सैलाब उमड़ता है जिसमें भेद-भाव भुलाकर मानव समूह एकत्र होते हैं, देश-विदेश के इतने बड़े जन समुदाय का एक साथ एक लक्ष्य के लिए एकत्र होना अपनी मिसाल अपने आप है.
अमृत ही उर्जा का स्रोत है, जो जीवन व्यापर के लिए परम आवश्यक है. कड़ाके की ठंड में शीतल बालू पर निवास, अति शीतल जल में स्नान करने के लिए ऐसी ही आध्यात्मिक ऊर्जा की आवश्यकता है. दुःख, दुर्बलता, मनो-मालिन्य, किसी भी तरह का विक्षेप इन सब को भुलाकर साधक कुम्भ का एक पर्व अपने भीतर भी मनाता है. भीतर ही देवता भी हैं और असुर भी, जब-जब सत्य का अपमान होता है, दैवीय गुण क्षीण हो जाते हैं, दुर्गुण प्रबल, तब संत जन कहते हैं आत्म मंथन करना चाहिए, जिससे आत्मा रूपी अमृत के कलश की प्राप्ति हो, आत्ममंथन से ही शक्ति प्राप्त होती है. इस ऊर्जा के कलश को पाकर भी यदि द्वंद्व समाप्त नहीं होता, अहंकार बढ़ जाता है, तब पुनः संत जन ही उस शक्ति के उपयोग का साधन बताते हैं. जिससे वास्तविक उत्सव का आयोजन होता है, सभी के जीवन में प्रसन्नता भर जाती है. जो दुःख अभी आए नहीं हैं उन्हें भी दूर करने के लिए साधक पुण्य एकत्र करते हैं, तीर्थों में स्नान करते हैं. जिससे मन के पूर्वाग्रह टूटते हैं, सुख-सुविधा का एक जो आकर्षण मानव को जड़ बना देता है, उससे छुटकारा मिलता है, प्रसन्नता की एक अनोखी धारा मन-प्राण को आप्लावित कर देती है.
मैत्री, करुणा, मुदिता और उपेक्षा प्रभु के मंदिर तक ले जाने वाले इन चारों मार्गों पर चलना सुगम हो जाता है. सारा समाज जब एक ही उद्देश्य के लिए आया है तब मित्रता की एक अनदेखी डोर में सब बंध ही गए, विदेशी यात्री स्नेह की एक मशाल लिए ही भारत आते हैं और भारत वासी उसमें स्नेह चुकने नहीं देते. करुणा की तो धाराएँ ही बहती हैं, जहां दिन-रात अन्नदान, वस्त्र दान, ज्ञान दान चल रहा हो वहाँ कठोर हृदय भी पिघल जाते हैं. सम्पन्न ही नहीं विपन्न भी अपनी सामर्थ्य के अनुसार तीर्थों में दान करते हैं. मुदिता तो हर एक के मुखड़े का आभूषण बन जाती है, अदृश्य सरस्वती की पावन धारा की तरह मानव मात्र की गहराई में जो आनंद कुम्भ छिपा है वह ऐसे आयोजनों में छलक ही जाता है. जो भी कमियां, अभाव या असुविधा होती है, जन उनकी उपेक्षा करना सीख जाते हैं. दृष्टि विशाल हो जाती है. मेले में ऐसे संतों का आगमन होता है जिनकी दृष्टि मात्र से भीतर के दोष जल जाते हैं, जो जीते जागते तीर्थ हैं, करुणा से भरे हैं. भारत की परम धरोहरों में से एक है यह कुंभ मेला इसकी गरिमा को बनाये रखना हर भारतीय का पुनीत कर्त्तव्य है.  

शनिवार, जनवरी 12

लौट लौट आते हैं मौसम


पौष का एक दिन

हुआ प्रातः, पर रात अड़ी है
जाने का यह नाम न लेती,
घना कोहरा, ढका गगन व
ठिठुरन तन को अकड़ा देती !

आज गगन का राजा भी तो
दुबका हुआ कहीं छुपा है,
बादल डाले डेरा नभ में
ठंड में दोहरा वार किया है !!

ऊपर से यह शीत लहर भी
जाने हवा कहाँ से आती,
निकट कहीं पर बर्फ गिरी है
उसके दे संदेशे जाती !

आग, धूप अब मित्र बनी हैं
गुड, रेवड़ियाँ बड़ी सोहतीं,
ठंडी शामें सिहरा जातीं
बस रजाई की बाट जोहतीं !

लिये कांगडी अगन तापते
कोई लाकड़ ढेर जलाते,
ढेरों कपड़े लादे तन पे
पूस की ठंड को दूर भगाते !

बुधवार, जनवरी 9

स्वयं में भी जीवन उगता है


स्वयं में भी जीवन उगता है


सबको खुश करते करते ही
हँसना हम स्वयं भूल गए,  
सबको अपने पास किया था
खुद से ही दूर निकल गए !

भय ही एक सूत्र में बांधे
प्रेम कहाँ दीखे जग में,
मिले अभय जब थामें खुद को
फूल झरा करते मग में !

जो स्वभाव में टिकना सीखे
वही खुशी को पा सकता है,
जिसने खुद को पाया खुद में
वही खुदा तक जा सकता है !

नजर हटे जब अन्यों से तो
स्वयं में भी जीवन उगता है,
भीतर एक उजाला भरता
निर्झर कोई झर-झरता है !

क़ुरबानी के नाम पे अक्सर
दर्द दिया खुद को हमने,
इसी दर्द को बांटा जग में
फिर क्यों उठे शिकायत मन में !

जो आनंद से भर जाता है
वही सुगंध बिखेरे जग में,
वही वृक्ष छाया दे सकता
जो भर जाता है खुद में !

पहले खुद को प्रेम से भर लें
शेष सहज ही सब घटता है,
न भीतर कुछ हानि होती
बल्कि हर सुख बढता है !