बुधवार, फ़रवरी 13

तू महासूर्य मैं एक किरण




तू महासूर्य मैं एक किरण


तू महासूर्य मैं एक किरण
तू सिंधु अतल हूँ लहर एक,
मैं भ्रमर बना डोला करता
शुभ खिला हुआ तू कमल एक !

मैं श्वेत श्याम घन अम्बर का
तू विस्तारित नील आकाश,
मैं गगन तारिका जुगनू सम 
तू ज्योतिर्मया महा प्रकाश !

तू महा आरण्य चन्दनवट
मैं कोमल डाली इक वट की,
तू ज्वाला का इक महाकुंड
मैं लघु काया इक चिंगारी !

तू अन्तरिक्ष है अंतहीन
छोटा सा ग्रह मैं घूम रहा,
तू महाप्रलय सा दीर्घ पवन
मैं मंद समीरण बन बहता !

रविवार, फ़रवरी 10

जाने कितने पर्वत नापे


जाने कितने पर्वत नापे


अनगिन बार खिलाये उपवन,
कंटक अनगिन बार चुभे हैं,
जाने कितने पर्वत नापे
कितनी लहरों संग तिरे हैं !

मंजिल अनजानी ही रहती
द्वार न उसका खुलता दिखता,
एक चक्र में डोले जीवन
सार कहीं ना जिसका मिलता !

बार-बार इस जग में आकर
दांवपेंच लड़ाए होंगे,
अंधकार में ठोकर खाकर
फिर-फिर नैन गँवाए होंगे !

भय भीत पर खड़ा है जीवन
कैसे मन को विश्राम मिले,  
सत्य से आँख मिले न जब तक
क्योंकर अंतर में राम मिले !


शनिवार, फ़रवरी 9

सरहद पर बर्फीले पर्वत



सरहद पर बर्फीले पर्वत



कण-कण में भारत धरती के
बहता एक शाश्वत सँजीवन,
दूर पूर्वी अंचल में जब
उगती नभ में अरुणाभ, नमन !

सरहद पर बर्फीले पर्वत
कहीं सिंधु, रेतीले निर्जन
रक्षित करने को तत्पर है
सेनानी का तन मन अर्पण !

जयहिन्द मधुर नाद गूँजता
अंतर में हिलोर इक उठती,
नदिया, पर्वत, कानन, अम्बर
हर कोने को छू विहंसती !

पुण्य भूमि यह पुण्य शील है
राम, कृष्ण, बुद्धों की आभा,
गंगा, कावेरी, सतलज से
सिंचित है जन-जन की आशा !

आज नवल रवि दस्तक देता
कोटि-कोटि भाारतवासी को,
 पुरुषार्थ कर इसे संवारें
अवसर मिलता सौभागी को !



शुक्रवार, फ़रवरी 8

रस की धार निरंतर बहती



रस की धार निरंतर बहती

देह व मन के घाट अधूरे 
इन पर ही जो डाले डेरा, 
उस से कैसे नैन मिलेंगे 
स्वयं के घर न डाला फेरा !

एक पिपासा जगे न जब तक 
राह नहीं निज घर की मिलती, 
सूना सा घर-आँगन तन का 
 मन में कोई कली न खिलती ! 

रस की धार निरंतर बहती 
बाहर ढूँढ़ रहा जग सारा, 
कोई अपना हाथ पकड़ ले 
दिखला दे वह कूल किनारा ! 

बंटती तृप्ति बिन मोल जहाँ 
सहज सुखों का एक भंडार, 
गली-गली क्यों फिरता आखिर 
निज आँचल में बांधे प्यार ! 


मंगलवार, फ़रवरी 5

नव बसंत आया



नव बसंत आया

Image result for सरसों का खेत
सरसों फूली कूकी कोयल
पंछी चहके कुदरत चंचल,
नवल राग गाया जीवन ने
नव बसंत लाया कोलाहल !

भँवरे जैसे तम से जागे
फूल-फूल से मिलने भागे,
तितली दल नव वसन धरे है
मधुमास कहता बढ़ो आगे !

आम्र मंजरी बौराई सी
निज सुरभि कलश का पट खोले,
रात-बिरात का होश न रखे
जी चाहे जब कोकिल बोले !

कुसुमों में भी लगी होड़ है
धारे नूतन रूप विकसते,
हरी-भरी बगिया में जैसे
कण-कण भू का सजा हुलसते !

किसके आमन्त्रण पर आखिर
रंगों का अंबार लगा है,
पवन बसंती मदमाती सी
मनहर बन्दनवार सजा है !

शीत उठाये डेरा डंडा
चहूँ ओर भर गया उल्लास,
नई चेतना भरने आया
समाई जीवन में नव आस !


बुधवार, जनवरी 30

बापू के नाम एक पत्र


बापू के नाम एक पत्र


हुए डेढ़ सौ वर्ष आज, जब वसुंधरा पर तुम थे आए 
देवदूत बन घोर तिमिर में, बने प्रकाश पुंज मुस्काए !

जाने किस माटी के बने थे, सत्य की इक मशाल जलाई
कोटि-कोटि भारत वंशी हित, निज सुख-सपन की बलि चढ़ाई !

कोमल पुष्प सा अंतर किन्तु, फौलादी संकल्प जगाये
भारत की जनता को फिर से, मुक्त गगन के स्वप्न दिखाए !

देवभूमि भारत कैसा हो, इसकी नींव तुम्हीं ने रखी
दूर गाँव के सन्नाटे में, हर झोंपड़ी हो सजी हुई !

दीन-हीन दुर्बल न रहें वे, हों किसान अथवा मजदूर 
समुचित श्रम का प्रतिदान मिले, वे समर्थ बनें न कि मजबूर !

तन पर वस्त्र, आश्रय सुंदर, शिक्षा का सम अधिकार मिले
गाँव-शहर में हर व्यक्ति को, सहज ही राष्ट्र का प्यार मिले !

एक देश में रहने वाले, एक सूत्र में बंधे सभी हैं
संविधान की मूल आत्मा, समता और बन्धुता ही हैं !

बापू ! आज हम फख्र से कहते, भारत ने करवट ली है
उसी राह पर चला गर्व से, नींव जिसकी तुमने रखी है !

स्त्री-पुरुष वृद्ध-युवा सभी, भारतभू का निर्माण कर रहे
आदर्शों से प्रेरित नेता, उनमें नव उत्साह भर रहे !

आज गर्व से कह सकते हैं, बापू के सपनों का भारत
दुनिया जिसे निहार रही है, कदम बढ़ाता हँसता भारत !



शुक्रवार, जनवरी 25

‘मैं’ से ‘हम’ होने में सुख है



‘मैं’ से ‘हम’ होने में सुख है 


दिल में जोश गीत अधरों पर
लिए हाथ में हाथ डोलते,
इक दूजे के मित्र बने अब
अंतर्मन के राज खोलते !

जीवन एक यात्रा अभिनव
प्रियतम का यदि संग साथ हो,
‘मैं’ से ‘हम’ होने में सुख है 
धूप कड़ी या घन वर्षा हो !

दिवस महीने बरस दशक अब
संग-संग जीते बीते हैं,
नन्ही किलकारियाँ सी थीं जो
हुई युवा अब उड़ने को हैं !

सुंदर घर वर देख भाल कर
उन्हें नये बंधन में बाँधें,
यही स्वप्न अब मन में जगता
मात-पिता का धर्म निबाहें !

इसी तरह हँसते-मुस्काते
जीवन की मंजिल को पालो,
निज कौशल सामर्थ्य बढ़ाकर
इस जग के भी कुछ गम हर लो !

आज छोटी बहन व बहनोई के विवाह की सालगिरह है. 

शुक्रवार, जनवरी 18

द्वार खुलें बरबस अनंत में



द्वार खुलें बरबस अनंत में

कहाँ छुपा वह मन मतवाला
गीत गुने जिसने सावन के,
एक सघन सन्नाटा भीतर
नहीं चरण भी मन भावन के !

शून्य अतल पसरा मीलों तक
मदिर, मधुर सा कोई सपना,
कुछ भी नजर नहीं आता है
बेगाना ना कोई अपना !

क्या कोई बोले किससे अब
दूजा रहा न कोई जग में,
कदमों में राहें सिमटी हैं
द्वार खुलें बरबस अनंत में !


बुधवार, जनवरी 9

नया वर्ष


नया वर्ष


समय के अनंत प्रवाह में...
गुजर जाना एक वर्ष का, मानो
सागर में एक लहर का उठना
और खो जाना !
और इस दिन
लाखों की आतिशबाजी जलाना
उस दुनिया में ?
जहाँ लाखों घरों में अँधेरा है
एक दिये के लिए भी नहीं है तेल
नया वर्ष तो तब भी आएगा,
जब हम कान फोड़ पटाखे नहीं जलायेंगे
नहीं खोएंगे होश आधी रात को सडकों पर
अजीब रिवाज जन्म ले रहे हैं शहर की हवा में
नये साल के पहले दिन
इच्छाओं की सूची बहुत लम्बी होती है मनों में
तभी तो मन्दिरों के बाहर पंक्तियाँ भी
दोपहर तक खत्म होने को नहीं आतीं !

मंगलवार, जनवरी 8

नये वर्ष में




नये वर्ष में

यूँ तो हर घड़ी नयी है
हर पल घटता है पहली बार
हर क्षण जन्मता है समय की अनंत कोख में
प्रथम और अंतिम बार एक साथ
दोहराया नहीं जाता सृष्टि में कुछ भी
क्योंकि अनंत है सामर्थ्य इसका
नहीं आएगा बीता वर्ष दोबारा
इस महायज्ञ में होने शामिल
फिर भी हर आगत को नूतन गढ़ना है
यदि विकास के सोपान पर चढ़ना है
और अंतर में गहरे बढ़ना है
नया अंदाज हो बात को कहने का
सीखें गुर दरिया सा सदा बहने का !