शुक्रवार, नवंबर 20

प्रेम से कोई उर न खाली

 


प्रेम से कोई उर न खाली
 

एक बूंद ही प्रेम अमी की

जीवन को रसमय कर देती,

एक दृष्टि  आत्मीयता की

अंतस को सुख से भर देती !

 

प्रेम जीतता आया तबसे

जगती नजर नहीं आती थी,

एक तत्व ही था निजता में

किन्तु शून्यता ना भाती थी !

 

 स्वयं शिव से ही प्रकटी  शक्ति 

प्रीति बही थी दोनों ओर,

वह दिन और आज का दिन है

बाँधे कण-कण प्रेम की डोर !

 

हुए एक से दो थे जो तब

 एक पुन: वे  होना चाहते, 

दूरी नहीं सुहाती पल भर

प्रिय से कौन न मिलन मांगते !

 

खग, थलचर या कीट, पुष्प हों

प्रेम से कोई उर न खाली,

मानव के अंतर ने जाने

कितनी प्रेम सुधा पी डाली !

 

करूणा प्रेम स्नेह वात्सल्य

ढाई आखर सभी पढ़ रहे,  

अहंकार की क्या हस्ती फिर

प्रेमिल दरिया जहाँ बह रहे !   

गुरुवार, नवंबर 19

ढाई आखर प्रेम के

ढाई आखर प्रेम के


‘प’ से परस स्नेह भरा

आश्वस्त करता हुआ

भीतर की सारी शुभता को

प्रियतम में भरता हुआ

परख ले जो अंतर की अकुलाहट

पनपा दे अनायास ही मुस्कुराहट !

 

‘र’ से रमा हो कण-कण में अस्तित्व के

रमणीय हो उसके अपनेपन की आभा !

 

‘ए’ से एक की ही याद दिलाता

सारा द्वैत इक पल में मिट जाता !

 

‘म’ से माँ की तरह समेट ले विशाल हृदय में

मधुर बन पूर्ण करे हर अभाव प्रियस्पद का !

 

ऐसा निश्चछल प्रेम ही हर मन की आस है

जिसकी स्मृति ही भर देती जीवन में उजास है !

 

‘प’ से जब पाना ही होता है लक्ष्य

‘र’ बन जाता है रौरव

एषणायें जगाता

ममता की बेड़ियों में जकड़ा

प्रेम मुक्त नहीं करता

पीड़ा के फूल ही अंचल में भरता ! 

मंगलवार, नवंबर 17

खत

खत 

किसी सूनी शाम को 

हथेलियों पर ठोड़ी टिकाये 

लिखने वाली मेज पर बैठे 

कोई बात फड़फड़ायी होगी तुम्हारे मन में 

लिखो फिर काट दो 

तकते रहो  निरुद्देश्य दीवार को 

अपनी आवाज को 

सुनने का प्रयत्न करते 

आँखों से दो कतरे शबनम के ढुलक कर 

बैठ गए होंगे कापी पर

कैसा सम्बोधन  ! अनोखा भीगा सम्बोधन 

अभिवादन के लिए सारा शब्दकोश 

ढूंढ आया होगा तुम्हारा मस्तिष्क 

कि बाहर से अकेले पक्षी की 

हूक सिमट आयी होगी कमरे में 

.. उस कागज में 

और एक लिफाफा तैयार !  

 

सोमवार, नवंबर 16

परिचित जो अंतर पनघट से

परिचित जो अंतर पनघट से

जग जैसा है बस वैसा है

हर नजर बताती कैसा है

 

कोई इक बाजार समझता

कोई खालिस प्यार समझता

विकट किसी को सागर जैसा

कोई धारे गागर जैसा

 

जग तो अपनी राह चल रहा

नादां मन स्वयं को छल रहा

 

कोई फूलों को चुन लेता

दूजा काँटों को बुन लेता

ताज बनाकर सिर पर पहने

आँसू बहा तुष्टि भर लेता

 

जग में दानव रहते आए

देव बहिष्कृत होते आए

 

देवों को इक सबल बनाता

दूजा रह विरक्त छुप जाता

जगत किसी को बंधन जैसा 

कोई निशदिन गीत सुनाता

 

वही पार उतरा इस तट से

परिचित जो अंतर पनघट से

 

जग की चिंता कौन करे अब

जगपति की वह शरण गहे जब

न बदला है न बदलेगा यह

बुद्ध, कबीर, नानक कहें सब   

गुरुवार, नवंबर 12

लो फिर आयी विमल दीवाली

 लो फिर आयी विमल दीवाली 

जगमग दीप जले पंक्ति में 

बन्दनवार लगे हर द्वारे 

सजी दिवाली महके जन पथ 

तोरण सजे गली चौबारे 

उठी सुगन्ध गुजिया, मोदक की 

वस्त्र नए देहों पर सरसर

लगी झालरें जली बत्तियां 

थाल सजे पूजा के मनहर 

सजे विनयाक, धान्य लक्ष्मी 

राग जगाती सुख बरसाती 

लो फिर आयी विमल दीवाली 

स्वच्छ हुए सबके घर आंगन 

भर उमंग से चहके सब मन 

कोमल भाव भरे अंतर में 

निकले बाल, युवा, सजधज कर 

नहीं अभाव सताता कोई 

देने का संकल्प जगा है 

दूर हुआ अँधियारा सारा 

रससिक्त हर भाव पगा है 

सुख की लहर उठी सागर में 

पावन पवन देवता बहते

दिग-दिगन्त में करुणा बसती

सूर्यदेव भी सुखमय लगते 

ऋतु मोहक माह शरद कार्तिक 

हरा रोग आरोग्य सफल है 

भारत भू का पर्व अनोखा 

ज्योतिपर्व यह अति मंगल है !


बुधवार, नवंबर 11

कुछ ख्याल


कुछ ख्याल 


 हजार राहे हैं जिनसे गुजर के तू मिलता है 
किसी बाग में कमल कभी गुलाब बना खिलता है 

हरेक मुट्ठी में कैद है एक आसमां अपना 
जब जो ख्वाहिश करेगा चाँद उस पल निकलता है 

एक रस्ता पकड़ ले और चलता चले उसी पर 
क्यों निगाहों को बिखेरे दिलेदर्द पिघलता है 

हजार नदियां गुजर कर जहाँ भी पहुँचें
समंदर एक ही हरेक को मिलता है 

क्यों कशमकश में दिनों तक लम्हे गुजरते हैं 
वक्त के पार ही वह जांनिसार मिलता है 

थम जाये मन की दौड़ जिस पल किसी की कहीं
खुले वह द्वार जो उसके दर पे निकलता है 

गौर से देखा है कभी मन को समझा भी 
इन्हीं के पानियों में उसका कमल खिलता है 

मंगलवार, नवंबर 10

निकट समंदर बहता जाता

निकट समंदर बहता जाता


जाग-जाग कर फिर सो जाता

नींदों में मन स्वप्न दिखाता,

रंग-रूप-रस-गंध खान में 

निज आनंद छुपा रह जाता !

 

घूँट- घूँट भर तृप्त हो रहा

निकट समंदर बहता जाता,

मुक्त गगन की याद न आए

पिंजरे में ही दौड़ लगाता !

 

कैसा भूला भ्रम में खुद को

वंचित हुआ स्वर्ग के सुख से,

इंद्रधनुष को सत्य मानकर

चला उसे है धारण करने !

 

ज्यों सीप में चांदी का भ्रम

मृग मरीचिका मरुथल में है,

पानी मथने में नहीं सार

कहाँ कूप में गंगाजल है !

 

अनजाने दुख धूम्र उठाते

ज्योति ज्ञान की बुझ-बुझ जाती,

एक ही माँ के जाए दोनों

देख-देख कोई मुस्काता !

  

सोमवार, नवंबर 9

अस्तित्व


अस्तित्व

 


बदलियों में छुप गया

फिर आकाश में चाँद

जैसे छिप जाता है कोई

बच्चा खेल-खेल में

परदे के पीछे !

 

दूर वृक्ष की डाली पर

नीला एक फूल खिला

जैसे मुस्काया हो अस्तित्व

अपनी सृष्टि को निहार !

 

रात भर गूँजता है

संगीत झींगुरों का

अनथक वे गाते हैं

अचानक थम गया उनका गान

एक तेज आवाज से काँपी धरा !

 

शायद कहीं कोई विस्फोट हुआ

मानव की लालसा का

टूटा पुन: कोई पहाड़

समतल जमीन पाने हेतु !

 

आनंद सहज ही बरसता हो जहाँ

वहाँ आयोजन करने पड़ते हैं

लोगों को हँसाने के

यह विडंबना नहीं तो और क्या है ?  

रविवार, नवंबर 8

झलक उसकी बरस जाती


झलक उसकी बरस जाती


कल्पना के पंख ओढ़े

उर गगन में उड़  रहा है,

कभी शीतल चंद्रमा,घन

ताप से भी जुड़ रहा है !

 

जाग कर देखे घड़ी भर

रात-दिन यूं घट रहे हैं,

जो कभी उगता न डूबा 

पूर्व-पश्चिम छल रहा है !

 

सत नहीं जो मान उसको

व्यर्थ ही मन बोझ ढोता,

जो कभी आए नहीं भय 

उन दुखों का खोज लेता !

 

स्वयं मंजिल दूर रखकर

दौड़ उसकी फिर लगाता,

पूर्ण होकर "भरूँ  कैसे ?"

मंत्र का फिर जाप करता !

 

इक खलिश की आंच दिल में 

सुगबुगा धूआँ उठाती,

प्रखर ज्वाला बन जले यदि

झलक उसकी बरस जाती !


गुरुवार, नवंबर 5

समय या भ्रम

समय या भ्रम

 


समय जो निरंतर गतिमान है

क्या वाकई गति करता है?

या घटनाएं ही ऐसा प्रतीत कराती हैं

दिन और रात

माह और वर्ष

जन्म और मृत्यु

के मध्य समय बहता सा लगता है

 पर देखने वाला सदा एक सा रहता है !

रेत पर धँसे पाँव ज्यों

कहीं जाते से प्रतीत होते हैं

लहर आकर चली जाती है

वे वहीं के वहीं रहते हैं !

इतिहास बनता रहता है

व्यक्ति वही रहता है

कभी भयभीत, कभी निर्भीक,

कभी शोषक अथवा कभी शोषित

महामारी फिर-फिर दोहराती है

युद्ध भी लड़े जाते हैं बार-बार

जो भी बदलता है वह भ्रम ही सिद्ध होता है

एक पर्दा है जैसे जिस पर

घट रहा है सब कुछ

शायद गहराई में हर मन जानता है

यह एक दोहराया जाने वाला खेल है

 और वह इसमें व्यर्थ ही फंस गया है

सदा से है वह यहीं

वह कहीं गया ही नहीं

सारा भय ऊपर-ऊपर है

विचार में या भावना में

कुछ छूट जाने का भय

कुछ न कर पाने का भय

मारे जाने का भय

जो कंपता है वह प्रतिबिंब है

चाँद को कुछ नहीं होता

मछली के जाल में वह कभी फंसा ही नहीं

बस मान लिया है

सारा समय इस एक क्षण में समाया है

शेष सब..  कुछ छाया और कुछ माया है !

 


बुधवार, नवंबर 4

चेतना हर हल बनेगी

चेतना हर हल बनेगी

आग भीतर जो जलाती

पथ प्रदर्शक भी वही है,

अश्रु बनकर जल बहा जो

मनस शोधक भी वही है !

 

शोक पाहन सा चुभे जो 

पाँव की सीढ़ी  बनेगा,

घन विपत्ति का अंधेरा

एक दिन सूरज बनेगा !

 

गर कोई संघर्ष न हो

सुवर्ण न कुंदन बनेगा,

बिना मंथन सिंधु से भी

क्योंकर मधु अमृत झरेगा !

 

तप रही जो आज माटी

नीर कल धारण करेगी,

प्रश्न बनकर जो खड़ी है

चेतना हर हल बनेगी !