शुक्रवार, अप्रैल 4

भोर

भोर 


 

एक और सुबह 

लायी है अनंत संभावनाएँ 

उससे मिलने की 

अभीप्सा यदि तीव्र हो तो 

कृपा बरसती है अनायास 

खुल जाता है हर द्वार 

झरते हैं प्रकाश पुष्प हज़ार 

वही ज्योति बनेगी मार्गदर्शक 

जगमगा उठेगा कुछ ही देर में 

रवि किरणों से फ़लक 

जग जाएँगे वृक्ष, पर्वत, फूल सभी 

काली पड़ गई धूल सभी 

हर भोर उस सुबह की 

याद दिलाती है 

जिसमें जगकर आत्मा

 नयी हो जाती है !




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