सोमवार, मार्च 10

नीलमणि सा कोई भीतर

नीलमणि सा कोई भीतर



कितने दर्द छिपाए भीतर
 ऊपर-ऊपर से हँसता है,
 कितनी परतें चढ़ी हैं मन पर
 बहुत दूर खुद से बसता है !

जरा उघेड़ें उन परतों को
 नीलमणि सा कोई भीतर,
जगमग चमचम दीप जल रहा
झलक दिखाने को आतुर !

कभी लुभाता जगत, यह जीवन
छूट न जाये भय सताता,
कभी मगन हो स्वप्न सजाये
भावी सुख के गीत बनाता !

इस पल में ही केवल सुख है
जिसने अब तक राज न जाना,
आशा ही बस उसे जिलाती
जिसने खुद को न पहचाना !

जीना जिसने सीख लिया है
कुछ भी पाना न शेष रहा,
हर क्षण ही तब मुक्ति का है
लक्ष्य न कोई विशेष रहा !   

मंगलवार, मार्च 4

आना वसंत का

आना वसंत का

जब नहीं रह जाती शेष कोई आशा
 निराशा के भी पंख कट जाते हैं तत्क्ष्ण !
जब नहीं रह जाती ‘मैं’ की धूमिल सी छाया भी
उसकी झलक मिलने लगती है उसी क्षण
निर्भर, निर्मल वितान सा जब फ़ैल जाता है
मन का कैनवास
 प्रेम के रंग बिखेर जाता है कोई अदृश्य हाथ
माँ की तरह साया बन कर चेताती चलती है
छंद मयी हो जाती है कायनात !
छूट जाते हैं जब सारे आधार
तब ही भीतर कोई कली खिलती है
बज उठते हैं मृदंग और साज
जुड़ जाते हैं जाने किससे अंतर के तार !
जब पक जाता है ध्यान का फल भी
झर जाता है जन्मों का पतझड़
और उतर आता है चिर वसंत जीवन में !



शनिवार, मार्च 1

वर्षा को भी मची है जल्दी

वर्षा को भी मची है जल्दी


टिप-टिप बूंदें दूर गगन से
ले आतीं संदेश प्रीत के,
धरा हुलसती हरियाली पा
खिल हँसती ज्यों बोल गीत के !

शिशिर अभी तो गया नहीं है
 रुत वसंत आने को है,
मेघों का क्या काम अभी से
 फागुन माह चढ़ा भर है !

वर्षा को भी मची है जल्दी
उधर फूल खिलने को आतुर,
मोर शीत में खड़े कांपते
 अभी नहीं जगे हैं दादुर !

मानव का ही आमन्त्रण है
उथल-पथल जो मची गगन में,
बेमौसम ही शाक उगाता
बिन मौसम फल-फूल चमन में !


गुरुवार, फ़रवरी 27

शिवरात्रि के पावन अवसर पर आप सभी को हार्दिक शुभकामनायें


शम्भो शंकर हे महादेव



शूलपाणि, हे गंगाधर, हे महादेव, औघड़ दाता
हे त्रिपुरारी, शंकर शम्भो, हे जगनायक, जग के त्राता !

हे शिव, भोले, मृत्युंजय हे, तुम नीलकंठ, जटाधारी
हो आशुतोष, अनंत, अनादि, हे अडोल, नागधारी !

 हे अंशुमान, त्रिनेत्रधारी, अभयंकर, हे महाकाल
विश्वेश्वर, हे जगतपिता, हे सुंदर आनन, उच्च भाल !

कैलाशपति, हे गौरीनाथ, हे शक्तिमान, डमरू धारी
हे महारूद्र, काल भैरव, तुम भूतनाथ, गरल धारी ! 

हे शार्दूल, हो तेजपुंज, हे सर्वेश्वर, नन्दीश्वर हे
त्रयम्बक, पशुपतिनाथ, हे आदिदेव हर हर हर हे !

हे विरूपाक्ष, निराकार, हे महेश, चन्द्रशेखर
सदाशिवं, हे चिदानंद, विशम्भर, हे शैलेश्वर !

भस्म विभूषित, करुणाकर, प्रलयंकर, सुंदराक्ष
हे विश्वात्मा, तुम जगतबीज, ताण्डवकर्ता, हे नटराज ! 

महेश्वरा, त्रिभुवन पालक, काशीनाथ हे जगदीश्वर
नमोः नमः हे शम्भुनाथ, नमोः नमः हे सोमेश्वर !

तुम बहाते ज्ञान गंगा, मौनधारी तत्व हो तुम
हे अडोल पर्वत जैसे, कैलाश पति अमृत हो तुम !

विमल तुम्हारा मन अंतर, ज्यों शुभ्र श्वेत धवल हिम
अंतर्ज्योति से हो प्रज्जवलित, आकार है ब्रह्मांड सम !


बुधवार, फ़रवरी 26

मिल गयी चाबी

मिल गयी चाबी


रात अँधेरी और घनेरी 

घर का रस्ता भूल गया वह,

दूर कहीं आवाज़ भयानक, 

भटक रहा भयभीत हुआ वह !


टप टप बूँदें, पवन जोर से 

ठंड हड्डियों को कंपाती,

तभी अचानक बिजली चमकी

इक दरवाज़ा  पड़ा  दिखाई !


​​झटपट पहुँचा द्वार खोलने, 

ताला जिस पर लटक रहा था,

सारी जेबें ली टटोल पर

चाबी कहीं गुमा आया था !


खड़ा रुआँसा भीगा, भूखा, 

याद आ रही कोमल शैया,

निद्रा-क्षुधा दोनों सताती, 

लेकिन वह था मजबूर बड़ा !


आसमान को तक के बोला 

तुम्हीं सहायक अब बन सकते,

तभी हाथ कंधे पर आया,

मित्र पूछता, क्या दे सकते?


खुशी और अचरज से बोला 

खोल द्वार चाहे जो माँगो,

तुरत घुमाई उसने चाबी

ला भीतर बोला, अब जागो !


मन ही तो वह भटका राही, 

द्वार आत्मा पर जो आता

बोध सखा स्वरूप  में आकर, 

बस पल में भीतर ले जाता I


मन पाता विश्राम जहाँ पर,

घर अपना वह सुंदर कितना

मिल गयी चाबी पाया तोष, 

‘हो’ होना चाहे फिर जितना I




शुक्रवार, फ़रवरी 21

आदमी फिर भी भटकता है

आदमी फिर भी भटकता है

राहबर आये हजारों इस जहाँ में
आदमी फिर भी भटकता है !

जरा सी बात पर भौहें चढ़ाता यह
फिर शांति की राह तकता है !

आदतों के जाल में जकड़ा हुआ पर
मुक्तियों के गीत गढ़ता है !

खुद ही गढ़ता बुत उन्हीं ही मांगता
जाने कितने स्वांग भरता है !

इस हिमाकत पर न सदके जाये कौन
शांति के वास्ते युद्ध करता है !

उलटे-सीधे काम भी होते रहेंगे
 रात-दिन जब शंख बजता है !

मंगलवार, फ़रवरी 18

दिल में उसके हम रहते हैं

दिल में उसके हम रहते हैं



वह रहता है अपने दिल में
सुना था जाने कितनी बार,
झाँका जब भी भीतर अपने
पाया केवल यह संसार !

चाह भरी थीं सुख की अनगिन
नाम छोड़ कर जाने की धुन,
खुद के बल पर मिला न जो भी
रब से उसको पाने की धुन !

लेकिन हर ख्वाहिश के पीछे
मांग ख़ुशी की छिपी हुई थी,
कुछ कर के दिखलाने में भी
भीतर एक पुलक जगती थी !

हुई जो पूरी चाह कभी तो
नयी लालसा को जन्मा कर,
एक छलावा, सम्मोहन सा
घिरा रहा अंतर उपवन पर !

तभी किसी ने कहा कान में
शरण में आ जाओ तुम मेरी,
नयन मूंद कर अब जब झाँका
तृप्ति की थी राह सुनहरी !

मन में कौंध गया तब राज
दिल में उसके हम रहते हैं,
जहाँ अभाव कभी न कोई
सुमिरन के दरिया बहते हैं !




रविवार, फ़रवरी 16

इंतजार इक नयनों में पलने देना

इंतजार इक नयनों में पलने देना


कुछ करना कुछ ना करने की जिद करना
अच्छा है खुद से सब कुछ होने देना

करने में सीमा होगी श्रम भी होगा
अच्छा है बस उसको ही करने देना

जैसे कलियाँ फूल बनी इतराती हैं
किस्मत वाले बन सब कुछ घटने देना

क्या करना जब खबर नहीं कोई इसकी
इक मुस्कान न अधरों से हटने देना

खाली होकर कभी-कभी तो बैठ रहो
मिलजुल रहना रार नहीं तनने देना

हर दिन कुदरत एक चुनौती लाएगी  
दोनों बाहें फैला कर स्वागत करना

कितनी देर लगेगी उससे मिलने में
हौले से बस पलकों को खुलने देना

शुभ करने का दिल चाहे कर ही लेना
पछतावे से दिल का न आँगन भरना

खुला रहे हर पल ही दरवाजा मन का
भेद छिपा कर नहीं कभी उससे रखना

जीवन भर भी मिलने में है लग सकता
एक प्रतीक्षा अंतर में झरने देना






मंगलवार, फ़रवरी 11

कुछ बातें दिल से

कुछ बातें दिल से


शिकायतें कर लीं बहुत जमाने से
सिर कहीं अब तो झुकाया जाये

बोझ ढोयें अच्छाइयों का कब तक
चलो औरों को बेहतर बताया जाये

नेकियाँ कर के भी रोये बुराई कर के भी
आखिर इन्सान को किस तरह हंसाया जाये

उमगती ख्वाहिशें सताती दिलोजान को
  किसी के दर पे उनको चढ़ाया जाये

नेमतें सौंप दे तो बढ़ती ही जाएँगी
कर के अर्पण दुःख को भी घटाया जाये

मुगालता हो गया हासिल कुछ करने का
वरना क्या है जो रब को दिखाया जाये

न कुछ अपना न कुछ हस्ती है हमारी
जान इस सच को जरा मुस्कुराया जाये



शनिवार, फ़रवरी 8

बहने दो

बहने दो


बहने दो पावन रसधार, मत रोको !
झरने दो सजल अश्रुधार, मत टोको

माना मन परिचित है बंधन से
डरता है अनहद की गुंजन से

खिलने दो अन्तस् की डार, मत रोको !
भरने दो फागुनी बयार, मत टोको !

माना मन स्वप्नों में खोया है
अनजाने रस्तों पर रोया है

छाने दो सहज प्यार, मत रोको !
खुलने दो मनस द्वार, मत टोको !

सुनने दो कर्णों को प्रकृति की भाषा
गिर जाय जन्मों से बाँध रही आशा

कुछ न शेष रहने दो, मत रोको !
जीवन को कहने दो, मत टोको !




बुधवार, फ़रवरी 5

लो आ गया वसंत

लो आ गया वसंत


धूप रानी हो गयी
रुत सुहानी हो गयी
बाग में कलियाँ खिलाता
छा गया वसंत
लो आ गया वसंत !

खुशबुएँ तन पर लपेटे
रंग अनगिन भी समेटे
भू सजाता मुस्कुराता
भा गया वसंत
लो आ गया वसंत !

भ्रमर गूँजते विकल
तितलियों के उड़ें दल
कुम्हलाया मुरझाया मन
खा गया वसंत
लो आ गया वसंत !

मंजरी मदहोश हुई
मस्तियों की कोष हुई
आम्र वन में खिलखिलाता
सा गया वसंत
लो आ गया वसंत !
  


सोमवार, फ़रवरी 3

झर जाये हर चाह तो

झर जाये हर चाह तो


थम कर ठिठक जाता है
खाली हुआ मन !
रीझ-रीझ जाता है खुद पर ही
तकने लगता है निर्निमेष अंतहीन
निज साम्राज्य को....
मौन एक पसरा है
राग बज रहा हो फिर भी कोई जैसे
सन्नाटा गहन चहूँ ओर
धुन गूंज रही हो कोई जैसे
नजर न आता दूर तक
पर साथ चल रहा हो कोई
पर होता है हर कदम अहसास
दृष्टि हटते ही बाहर से
भीतर अनंत नजर आता है
नहीं दीवारें न कोई रास्ता
अंतहीन एक अस्तित्त्व
ढक लेता है रग-रग को
भर देता है तृप्ति भीतर
झरना ऐसा झरता है
हर लेता जो तृषा जन्मों की
जहाँ किया नहीं जाता कुछ भी
सब कुछ अपने आप घटता है
गूंजता है मानो कोई दिव्य आलाप
झर जाती है हर चाह
मन से जिस क्षण..