शुक्रवार, अप्रैल 30

घड़ी विचित्र यह दौर अनोखा

घड़ी विचित्र यह दौर अनोखा


जूझ रहा है देश आजकल 

जिस विपदा से वह है भारी,

तुच्छ हुई है सम्मुख उसके 

जो कुछ भी की थी तैयारी !


हैं प्रकृति के नियम अनजाने 

मानव जान, जान न जाने, 

घड़ी विचित्र यह दौर अनोखा 

कभी न पहले ऐसा देखा !


कोटि-कोटि जन होते पीड़ित 

उतनी हम सांत्वना बहायें,

भय आशंका के हों बादल 

श्रद्धा का तब सूर्य जलाएं !


पृथ्वी का जब जन्म हुआ था 

अनगिन बार बनी यह बिगड़ी,  

प्रलय भी झेली, युद्ध अनेक

 महामारियों की विपदा भी !


किन्तु सदा सामर्थ्यवान हो 

विजयी बन वसुधा उभरी है 

इसकी संतानों की बलि भी 

व्यर्थ नहीं कभी भी हुई है 


सब जन मिलकर करें सामना 

इक दिन तो यह दौर थमेगा, 

मृत्यु-तांडव, विनाशी-लीला  

देख-देख मनुज संभलेगा !


जीतेगी मानवता इसमें 

लोभी मन की हार सुनिश्चित, 

जीवन में फिर धर्म जगेगा 

मुस्काएगी पृथ्वी प्रमुदित !


 

15 टिप्‍पणियां:

  1. जी नमस्ते ,
    आपकी इस प्रविष्टि् के लिंक की चर्चा कल शनिवार (०१-०५ -२०२१) को 'सुधरेंगे फिर हाल'(चर्चा अंक-४०५३) पर भी होगी।
    आप भी सादर आमंत्रित है।
    सादर

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  2. निराशा के इस समय में आशा का दीप प्रज्वलित करने हेतु आपका आभार एवं अभिनंदन।

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  3. जीतेगी मानवता इसमें

    लोभी मन की हार सुनिश्चित,

    जीवन में फिर धर्म जगेगा

    मुस्काएगी पृथ्वी प्रमुदित !

    बहुत खूब,मन को संजीवनी देती आपकी इस रचना के लिए नमन आपको अनीता जी

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  4. जीतेगी मानवता इसमें

    लोभी मन की हार सुनिश्चित,

    जीवन में फिर धर्म जगेगा

    मुस्काएगी पृथ्वी प्रमुदित !

    इसी आस पर मन टिका है ।।सुंदर

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  5. आज हर हृदय की आर्त्त पुकार यही है । ॐ शांति! शांति! शांति!

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  6. जीतेगी मानवता इसमें
    लोभी मन की हार सुनिश्चित,
    जीवन में फिर धर्म जगेगा
    मुस्काएगी पृथ्वी प्रमुदित !
    .....सुन्दर रचना।।।।। बहुत-बहुत शुभकामनाएँ आदरणीया अनीता जी

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  7. बेहतरीन रचना आदरणीया

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  8. आशा का संचार करती प्रभावी अभिव्यक्ति!

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  9. सब जल्दी से सब कुछ ठीक हो जाये

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