बुधवार, अप्रैल 14

वह मन को ख्वाब दे

वह मन को ख्वाब दे 


खोया हुआ सा लगता  

खोया नहीं है जो, 

जिसे पाने की तमन्ना 

पाया हुआ है वो ! 


वही श्वास बना तन में 

जीवन को आंच दे,

वही दौड़ता लहू संग  

वह मन को ख्वाब दे ! 


जो अभी-अभी यहीं था 

फिर ढक लिया किसी ने, 

जैसे छुप गयी किरण हो 

बदलियों के पीछे !


उसे ढूंढने न जाना 

जरा थमे रहना  

धीरे से उसके आगे 

दिले-पुकार रखना !


वह सुन ही लेता चाहे 

मद्धिम हो स्वर बहुत,  

सच्ची हो दिल की चाहत 

बस एक यही शर्त !


 

11 टिप्‍पणियां:

  1. जो अभी-अभी यहीं था

    फिर ढक लिया किसी ने,

    जैसे छुप गयी किरण हो

    बदलियों के पीछे !

    न जाने हम क्या ढूँढते फिरते हैं ..... सुन्दर भावों से सजी सुन्दर रचना ...

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  2. आपकी इस प्रस्तुति का लिंक 14-04-2021 को चर्चा – 4037 में दिया गया है।
    आपकी उपस्थिति मंच की शोभा बढ़ाएगी।
    धन्यवाद सहित
    दिलबागसिंह विर्क

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  3. सुन्दर रचना। ।।।। पाया हुआ कुछ खोया सा। ।।।।

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  4. सच्ची हो दिल की चाहत, बस एक यही शर्त। आपकी बात ठीक ही लगती है माननीया अनीता जी। वैसे चोट भी तभी गहरी लगती है जब दिल की वह सच्ची चाहत पूरी न हो। प्रशंसनीय सृजन हेतु अभिनंदन आपका।

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  5. बहुत ही खूबसूरत रचना, भा गई मन को, हार्दिक शुभकामनाएं अनीता जी

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  6. आप सभी विद्वजनों का स्वागत व आभार !

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