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रविवार, जुलाई 26

सबके दिल की गहराई में

सबके दिल की गहराई में 


इक भूमि की गोद में उगते 

नीम और आमों के तरुवर, 

दोनों जीवन को संजोये 

इक कटु, दूजा मृदु रस भरकर !


सबके दिल की गहराई में 

जीवन का इक अंश छिपा है, 

श्रम के कटु प्रयत्न से मिलता 

स्नेहिल मृदु आँच में पका है ! 


दिल की गहराई में दीपक 

बिन बाती बिन तेल जल रहा,

श्वासों में अहर्निशा जैसे 

सहज मंत्र अनवरत चल रहा !


सुनो ध्यान से, जरा धैर्य से 

 पल भर ठहरो, झाँको भीतर 

राह बनी जाती है ख़ुद ही 

 हौले-हौले चलना जिस पर !

 

सोमवार, जुलाई 20

भीतर दीपक एक जला है

भीतर दीपक एक जला है 


बना रहे जागरण ह्रदय में 

धरा-गगन पावन बन जाते, 

दें दृष्टि सम्मान की भीतर 

ख़ुद ही सम्मुख नव पथ आते ! 


ध्यान जहाँ भी जाकर टिकता 

ऊर्जा उधर प्रवाहित होती,

धैर्य-शांति के संग रह प्रज्ञा 

 ऊर्जा स्रोत सहज पा लेती !


श्वासों के पुल पर ही मन का 

राही आगे बढ़ता जाता, 

 शक्ति से पूरित हुईं श्वासें 

भीतर रस्ता खुलता जाता 


देह एक देवालय जिसमें 

श्वास एक अर्चन सी चलती, 

भीतर दीपक एक जला है 

उस अनाम की पूजा होती ! 


श्वासें हैं वे तार अनोखे 

जो पूर्ण ब्रह्मांड को जोड़ें 

गूँज रहा अस्तित्त्व निरंतर

  श्वासों को सजग हुए छोड़ें !

 

मंगलवार, अक्टूबर 17

अबकी बार नवरात्रों में

अबकी बार नवरात्रों में 


तंद्रा, प्रमाद सताते हैं 

देह को अथवा मन को  

आत्मा सदा ही सचेतन है !

पर जैसे काली हो जाये चिमनी

 तो प्रकाश नहीं आता 

प्रमादी हो जाये देह या मन तो 

आनंद आत्मा का बाहर नहीं आता !

देह-दीपक जब साफ़ नहीं रहता 

तो मन-स्नेह कैसे भरा जाएगा उसमें 

देह दीपक में स्नेहिल मन हो 

तभी न आत्मा की ज्योति जगमगायेगी 

और देख वह जोत, अबकी बार 

नवरात्रों में माँ हमारे घर आएगी 

योग से देह-दीपक सजाना है 

ध्यान से मन-स्नेह जलाना है 

तब प्रकटेगी वह अखंड ज्योति 

जो अभी सोयी है 

अंधकार में भटक रोयी है !


शुक्रवार, अगस्त 4

ख़ुद को ही

ख़ुद को ही 


कोई ओट दे देगा 

उढ़का देगा बाती 

या तेल भर देगा दीपक में 

पर जलना तो ख़ुद को ही पड़ता है !

 

कोई मार्ग दिखा देगा 

लक्ष्य की पहचान दे देगा 

या पाथेय भी दे देगा 

पर चलना तो ख़ुद को ही पड़ता है !


कोई और नहीं उठा सकता 

किसी के काँधे का बोझ 

न ही उतार सकता है 

क्योंकि गहन है कर्म की गति 

अदृश्य है वह भार 

स्वयं ही उतारना है 

हल्का होना है 

क्योंकि उड़ना तो ख़ुद को ही पड़ता है !


कोई पता बता देगा घर का 

यदि भूल गया है मन 

भटकते हुए इस चक्रव्यूह  में 

उसकी याद दिला देगा 

पर मुड़ना तो ख़ुद को ही पड़ता है !


गुरुवार, मार्च 30

एक आभा मय सवेरा



एक आभा मय सवेरा

नींद टूटे, जोश जागे 
हृदय से हर सोग भागे, 
याद में हो मन टिका जब 
टूटते हैं मोह धागे !

प्रेम का सूरज दमकता 
ज्योत्सना बन शांति छाए, 
एक आभा मय सवेरा 
तृप्ति की हर रात लाए !

मुक्त उर से गीत फूटे 
कर्म की ज़ंजीर बिखरे,
मिले जग को प्राप्य उसका 
रिक्त मन की गूंज उतरे !

आस का  दीपक न बुझता 
सहज सम्मुख मार्ग दिखता, 
नहीं मंज़िल दूर कोई 
हर घड़ी वह मीत मिलता !

हर कहीं मौजूद है वह
समय केवल एक भ्रम है, 
कल वही था आज भी है 
वहाँ था जो यहाँ भी है !

शुक्रवार, सितंबर 16

शुभ दीपक एक जलाना है

शुभ दीपक एक जलाना है


छँट जाएगा घोर अँधेरा 

उहापोह, उलझन का डेरा, 

थोड़ा सा स्नेह जगाना है 

शुभ दीपक एक जलाना है !


एक से फिर अनेक जल सकते

ज्योति की आकर बन सकते,

अनथक पथ चलते जाना है 

मग दीपक एक जलाना है !


फूल खिलाये हैं जिसने नित 

नीरवता गूँजे जिसके मित,

उसका इक गीत सुनाना है 

यश दीपक एक जलाना है !


करुणा, प्रेम, तपस, प्रार्थना 

दिलों में सोयी मधुर भावना, 

हौले से  पुनः जगाना है 

जय दीपक एक जलाना है !


दीप जल रहे जो नयनों में 

सुहास झरे मृदुल बयनों में, 

ऐसा इक राग सुनाना है 

हित दीपक एक जलाना है !


वचन कभी जो शर से चुभते 

निज अंतर  का भी बल हरते,

ना ऐसा रुख अपनाना है 

 मधु दीपक एक जलाना है !



गुरुवार, मार्च 3

हम अनंत तक को छू आते

हम अनंत तक को छू आते 

तन पिंजर में मन का पंछी  
पांच सीखचों में से ताके,
देह दीपक में ज्योति जिसकी 
दो नयनों से झिलमिल झाँके  ! 

पिंजर में सोना मढ़वाया 
पर पंछी प्यासा का प्यासा, 
 दीपक हीरे मोती वाला 
ज्योति पर छाया है धुआँ सा ! 

नीर प्रीत का सुख के दाने 
पाकर मन का पंछी चहके, 
पावन बाती, स्नेह ऊर्जा
ज्योति प्रज्ज्वलित होकर दहके !  

जग के सारे खेल-खिलौने 
पल दो पल का साथ निभाते, 
नेह ऊष्मा जब हो उर में 
हम अनंत तक को छू आते ! 

बाहर छोड़ें, भीतर मोड़ें
टुकड़ों में मन कभी न तोडें 
एक बार पा परम संपदा 
सारे जग से नाता जोड़ें ! 

बुधवार, दिसंबर 25

अंतरलोक



अंतरलोक

देश-काल से परे है जो
आधार है सृष्टि का 
उस जीवन से आँख मिलाकर ही 
कोई इस जीवन से हाथ मिला सकता है 
उस अदृश्य लोक से भरकर प्रकाश 
इस अंधकार में नन्हा सा ही सही 
एक दीपक जला सकता है 
बादल कहीं से तो भरते हैं खुद को 
बदल देते हैं मरुथलों को चारागाहों में 
सुवास लती हैं हवाएं उपवनों से गुजर 
अंतर शांति से भर लेता है जो मन 
निज आकाश को 
बना देता है मैत्री पल वही जगत में 
वैर से हल नहीं होते छोटे से मतभेद तक 
रक्त क्रांतियां छोड़ जाती हैं गहरे घाव 
इतिहास बनते हैं बुद्ध और महावीर की 
करुणा के फैलाव में 
जो आती है अंतर की गहराई से 
परे  है जो देश-काल से !

शनिवार, मई 12

मातृ दिवस पर


माँ

जीवन की धूप में
छाया बन चलती है,
दुविधा के तमस में
दीपक बन जलती है !

कहे बिना बूझ ले
अंतर के प्रश्नों को,
अंतरमन से सदा
प्रीत धार बहती है !

बनकर दूर द्रष्टा
बचाती हर विपद से,
कदम-कदम पर फूँक
हर आहट पढ़ती है !

छिपे हुए काल में
भविष्य को गढ़ती है,
माँ का हृदय विशाल 
सारा जग धरती है !



सोमवार, अक्टूबर 20

पर्वों का मेला दीवाली

पर्वों का मेला दीवाली



याद दिलाने सिया-राम की
भरने उर में रस उजास का,
जगमग करता घर चौराहे
आया उत्सव फिर प्रकाश का !

दीपों की ये दीर्घ कतारें
गगन उतर आया ज्यों भू पर,
तमस मिटाने अंतरतम् का
आया है दीपों का उत्सव !

कोना-कोना अपने घर का
स्वच्छ करें, चमचम चमकाते ,
रंगोली, तोरण, ध्वज, लड़ियाँ
भर उर में उल्लास सजाते  !

अंधकार में लख प्रकाश को
लक्ष्मी भूलोक पर आतीं,
देख उजाला जगमग राहें
यहीं अटक कर वह रह जातीं !  

धनतेरस दो दिन पहले है
पर्वों का मेला दीवाली,
एक आस्था युगों-युगों से
बन इक धारा बहती आती !

नरकासुर का अंत हुआ था  
नरसिंह रूप धरा विष्णु ने,
धनवंतरि भी जन्मे इस दिन
लक्ष्मी प्रकटी थीं सागर से !

एक दीप तुलसी के चौरे
याद उसी की कर रख आते,
मीलों तक वैभव हो शोभित,
द्वारे द्वारे दीप जलाते !

यम पूजा छोटी दीवाली
खील, बताशे, खाँड, मिठाई,
गुंजित होता नभ शुभ स्वर से
पूजित हों गणपति, लक्ष्मी !

काली थी जो रात अमावस
पूनम से भी ज्यादा रोशन,
याद कृष्ण की हमें दिलाये
अगले दिन पूजित गोवर्धन !

भाईदूज चला आता फिर
स्नेह बढ़ाता सहोदरों में
अंधकार की हुई पराजय
छा जाती उमंग हर दिल में !  





सोमवार, दिसंबर 9

तुम


तुम

मैंने जान लिया है कि
दीपक की लौ को तुमने
हाथों से ओट दी है
आँधियों की परवाह न करते हुए
मुझे उसमें तेल डालते रहना है !

हृदय को मुक्त रखना है भय से
क्योंकि एक अदृश्य घेरा
बनाया है तुमने चारों ओर !

भीतर बाहर मुझे एक सा होना है
 क्योंकि तुम कभी गहरे उतर जाते हो
तकने लगते हो आकर सम्मुख
कभी अचानक !

रविवार, अप्रैल 15

यदि हम गए होते सारनाथ



जब हम बनारस में थे एक बार सारनाथ जाने का कार्यक्रम बना पर किसी कारण वश सफल नहीं हो पाया तब मैंने यह कविता लिखी थी.

यदि हम गए होते सारनाथ

झड़ गया होता
मन का हल्का सा भी तनाव
हरे पेड़ों की छाँव में,

वह नीला गगन
याद दिलाता अनंत की
और कुलांचे भरते हिरण
कैसी पुलक न भर देते मन प्राणों में

वे ऊँचे स्तूप बने है जिसकी याद में
उसकी सौम्य मूर्ति
भीतर तक एक शांति और ठहराव को जन्म देती
कतारें दीपकों की
अंतर को सुवासित करतीं

यदि हम गए होते सारनाथ....

भूल जाते कुछ पल के लिये
ओढ़ी हुई उपाधियाँ
प्रकृति के सान्निध्य में
बच्चे न बन जाते....