तुम
मैंने जान लिया है कि
दीपक की लौ को तुमने
हाथों से ओट दी है
आँधियों की परवाह न करते हुए
मुझे उसमें तेल डालते रहना है !
हृदय को मुक्त रखना है भय से
क्योंकि एक अदृश्य घेरा
बनाया है तुमने चारों ओर !
भीतर बाहर मुझे एक सा होना है
क्योंकि तुम कभी गहरे उतर
जाते हो
तकने लगते हो आकर सम्मुख
कभी अचानक !