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मंगलवार, मार्च 9

नीलगगन सी विस्तृत काया

नीलगगन सी विस्तृत काया 


एक शून्य है सबके भीतर

एक शून्य चहुँ ओर व्यापता, 

जाग गया जो भी पहले में 

दूजे में भी रहे जागता !


शून्य नहीं वह अंधकार मय 

ज्योतिर्मयी प्रभा से मंडित, 

पूर्ण सजग हो रहता योगी 

निज आभा में होकर प्रमुदित !


 उसी शून्य का नाम सुंदरम्

प्रेम-ज्ञान की जो मूरत है, 

परम अनादि-अनंत तत्व शिव 

अति मनहर धारे सूरत है !


रखता तीन गुणों को वश में  

मन अल्प, चंद्रमा लघु धारे, 

मेधा बहती गंगधार में 

भस्म काया पर, सर्प धारे !


नीलगगन सी विस्तृत काया 

व्यापक धरती-अंतरिक्ष में,  

शिव की महिमा शिव ही जाने 

शक्ति है अर्धांग  में जिसको !