नीलगगन सी विस्तृत काया
एक शून्य है सबके भीतर
एक शून्य चहुँ ओर व्यापता,
जाग गया जो भी पहले में
दूजे में भी रहे जागता !
शून्य नहीं वह अंधकार मय
ज्योतिर्मयी प्रभा से मंडित,
पूर्ण सजग हो रहता योगी
निज आभा में होकर प्रमुदित !
उसी शून्य का नाम सुंदरम्
प्रेम-ज्ञान की जो मूरत है,
परम अनादि-अनंत तत्व शिव
अति मनहर धारे सूरत है !
रखता तीन गुणों को वश में
मन अल्प, चंद्रमा लघु धारे,
मेधा बहती गंगधार में
भस्म काया पर, सर्प धारे !
नीलगगन सी विस्तृत काया
व्यापक धरती-अंतरिक्ष में,
शिव की महिमा शिव ही जाने
शक्ति है अर्धांग में जिसको !