शनिवार, मई 8

उसी मूल से मन आया है

उसी मूल से मन आया है

नीलगगन पर तिरते मेघा 

सूर्य-चन्द्र, तारागण अनुपम, 

धार अनूठी, नीर सुवासित 

कुदरत की यह महिमा मधुरिम !


अभिनव किसी स्रोत से उपजे 

उसी मूल से मन आया है, 

मधुराधिपति का भव अष्टधा  

मन से ही उपजी काया है ! 


वही चेतना सुंदर बनकर 

बिखर गयी कण-कण में जग के, 

सत्यम शिवम सुंदरम् की ही  

अभिव्यक्ति हो बस जीवन में ! 


हास्य मधुर हो, वाणी मीठी 

रसमय चितवन, याद अनूठी, 

शब्द-शब्द रस से भीगा हो 

एक खानि है भीतर रस की !


आत्मस्रोत चैन का उद्गम 

गंगा सा निर्मल बह जाए,  

सृजन घटे छाया है उसकी 

वही सदा अंतर को भाए !


8 टिप्‍पणियां:

  1. पूरी रचना प्राकृतिक सुंदरता तथा जीवन दर्शन के सुंदर रसों से भीगी हुई ।बहुत शुभकामनाएं आपको आदरणीय दीदी ।

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    1. स्वागत व आभार प्रिय जिज्ञासा जी !

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  2. वही चेतना सुंदर बनकर

    बिखर गयी कण-कण में जग के,

    सत्यम शिवम सुंदरम् की ही

    अभिव्यक्ति हो बस जीवन में !


    काश कहीं तो दिखे ये सत्यम शिवम् सुन्दरम

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    1. स्वागत व आभार संगीता जी, यह दिख रहा है कण-कण में, पर आपका इशारा आज के भीषण माहौल की तरफ है शायद, किन्तु प्रकृति आज भी हमें माँ की तरह पोषित कर रही है।

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  3. एकदम सटीक चित्रण,वही परम चेतना विभिन्न रूप धर कर अवतरित होती है.पंत ने यों वर्णित किया है -
    'वही प्रज्ञा का सत्य स्वरूप हृदय में बनता प्रणय अपार ,
    लोचनों में लावण्य अनूप ,लोक सेवा में शिव अविकार.'

    वही सौन्दर्य विभिन्न रूपों में जीवन को रमणीय बनाता है.
    सुन्दर सृजन !

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    1. कविता के मर्म को समझ कर आपने पंत की अनुपम पंक्ति को साझा किया है, हृदय से आभार प्रतिभा जी !

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