अंतहीन सजगता
अपने में टिक रहना है योग
योग में बने रहना समाधि
सध जाये तो मुक्ति
मुक्ति ही ख़ुद से मिलना है
हृदय कमल का खिलना है
क्योंकि ख़ुद से मिलकर
उसे जान सकते हैं
‘स्व’ से शुरू हुई यात्रा इस तरह
‘पर’ में समाप्त होती
पर थमती वहाँ भी नहीं
जो अनंत है
अज्ञेय है
उसे जान
कुछ भी तो नहीं जानते
यही भान होता
अध्यात्म की यात्रा में
हर पल एक सोपान होता
हर पल चढ़ना है
सजग होके बढ़ना है
कहीं कोई लक्ष्य नहीं
कोई आश्रय भी नहीं
अंतहीन सजगता ही
अध्यात्म है
यही परम विश्राम है
यहीं वह, तू और मैं का
संगम है
यहीं मिट जाता
हर विभ्रम है !