भीतर कोई राह देखता
ऊपर वाला खुला राज है
फिर भी राज न खुलने वाला,
देखा ! कैसा चमत्कार है
या फिर कोई गड़बड़ झाला !
कण-कण में वह व्याप रहा है
छिपा हुआ सा फिर भी लगता,
श्वास-श्वास में वास उसी का
दर्शन हित मीलों मनु चलता !
ढूँढ रहा जो गर थम जाये
जाये ठहर चाहने वाला,
भीतर कोई राह देखता
जग जाता गर सोने वाला !
देख लिया ? नहीं, देख रहा है !
इस पल के बाहर न मिलता,
पल-पल सृष्टि नवल हो रही
नित्य ही सब कुछ रचा जा रहा !
राज अनोखा जाना जिसने
वही ठगा सा खड़ा रह गया,
ख़ुद को देखे या अनंत को
भेद न कोई बड़ा रह गया !




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