गुरुवार, अगस्त 14

स्वतन्त्रता दिवस पर हार्दिक शुभकामनायें

स्वतन्त्रता दिवस पर हार्दिक शुभकामनायें 

आजादी ! आजादी ! आजादी !
मांग है सबकी आजादी,
कीमत देनी पड़ती सबको
फिर भी चाहें आजादी !

नन्हा बालक कसमसाता
हो मुक्त बाँहों से जाने,
किशोर एक विद्रोह कर रहा
माता-पिता के हर नियम से !

नहीं किसी का रोब सहेंगे
तोड़-फोड़ कर यही दिखाते,
हड़तालों से और नारों से
अपनी जो आवाज सुनाते !

इस आजादी में खतरे हैं
बंधन की अपनी मर्यादा,
एक और आजादी भी है
जब बंधन में भी मुक्त सदा !

ऊपर का बंधन तो भ्रम है
मन अदृश्य जाल में कैदी,
उस जाल को न खोला तो
ऊपर की मुक्ति भी झूठी !

छोड़-छाड सब भाग गया जो
सन्यासी जो मुक्त हुआ है,
मन के हाथों बंधा है अब भी
उसको केवल भ्रम हुआ है !

 उस असीम की चाह बुलाती
मानव कैद का अनुभव करता,
निमित्त बनता बाहरी बंधन  
असल में उसका मन बांधता !

जिसका रूप अनंत हो व्यापक
कैसे वह फिर कैद रहे,
खुला समुन्दर जैसा है जो
क्योंकर सीमाओं में बहे !

मुक्ति का संदेश दे रहे
खुले व्योम में उड़ते पंछी,
मत बांधो पिंजर में मन को
गा गा गीत सुनाते पंछी ! 

जिसके लिये गगन भी कम है
उसे कैद करते हो तन में,
जो उन्मुक्त उड़ान चाहता
कैसे वह सिमटेगा मन में !

पीड़ा यही, यही दुःख साले
सारे बंधन तोड़ना चाहे,
लेकिन होती भूल यहाँ है
असली बंधन न पहचाने !


बुधवार, अगस्त 13

उसने भी कर दिया इशारा

उसने भी कर दिया इशारा

रंग हमारे हाथ लगे हैं
कैनवास है यह जग सारा,
रंगी इसे बना डालें अब
उसने भी कर दिया इशारा !

कोई गीत रचे जाता है
हम भी सुर अपने कुछ गा लें,
गूँजे स्वर्णिम स्वर लहरियाँ
उन संग आशाएं सजा लें !

रचा जा रहा पल-पल यह जग
सृजन हमारे हाथों कुछ हो,
कोई मौन सजाता निशदिन
मिलन हृदय का उससे भी हो !

बिन मांगे ही जो देता है
देख तृप्त होता है अंतर,
नजर जहाँ भी टिक जाती है
उसका ही तो दिखता मंजर !



मंगलवार, अगस्त 12

पढ़ पाते बूंदों की भाषा

पढ़ पाते बूंदों की भाषा



बरसे मेघा भीगा अंतर
कोंपल-कोंपल खिली हृदय की,
टिप-टिप रिमझिम बूंदों के स्वर
सुन लहरायी धड़कन दिल की !

जाने कौन लोक से लाये
मेघ संदेसा उस प्रियतम का,
झूम रहे हैं पादप, तरुवर
पढ़ पाते बूंदों की भाषा !

हैं सुकुमार पुष्प बेला के
सहज मार वारि की सहते,
नभचर छिपे घनी शाखा में
चकित हुए से अम्बर तकते !

दूर हैं जो प्रियजन निज घर से
स्मृति दिलाती झड़ी सुहानी,
शीतल, निर्मल सी इक आभा
पहुंचे उन तक अनकथ वाणी !

धरा उमगती खिलखिल हँसती
पाकर परस नेह का सजती,
खेली जाती एक नाटिका
तृप्त हो रही तृषा युगों की !

सोमवार, अगस्त 11

याद दिलाता सावन उसकी


याद दिलाता सावन उसकी



नीला नभ जब ढका मेघ से
घोर घटा बन छाया करता,
मधुर स्वरों में दे संदेसे
संग उड़ान पंछी के भरता !

घड़ी-घड़ी वह रब मिलता है
पल-पल हृदय कमल खिलता है,
कभी सिमट आता बूंदों में
बन खग डाल-डाल हिलता है !

बहे चले आता अम्बर से
तिरछी-सीधी जल चादर संग,
नैसर्गिक संगीत बज रहा
 घुंघरू ज्यों बांधे हो छमछम !

अंत न आता दीख रहा है
उस अनंत का कृत्य अनंत,
लाखों धाराएँ बहतीं जब
खो जाते हैं दिग-दिगंत !

हरी घास पर काली मैना
बिछे पुष्प कुछ झरे पवन संग,
याद दिलाता सावन उसकी
श्वेत, पीत फूलों के रंग !


रविवार, अगस्त 10

राखी


राखी



छुपाये है कितनी कोमल भावनाएं
रेशम के धागों से बनी
ये रंगीन राखियाँ !
गागर में सागर भरा हो जैसे
या बादलों में अमृत
अथवा तो फूलों में सुवास !
समेटे है अनगिनत स्मृतियाँ
अपने रंगीन नाजुक आकार में
 सजती है जब किसी कलाई पर
आलोड़ित हो जाता है उर
उग आते हैं
कितने सुमनों के उपवन
सूर्य और चन्द्रमाओं के समान
देदीप्यमान हो जैसे कोई राजा
और छाया हो उसका प्रताप चहूँ ओर...या
सुकोमल नवनीत सा पिघल जाता हो
हर स्पंदन
मुबारक हो बार-बार
राखी का यह त्योहार
यह रक्षा बंधन !


शनिवार, अगस्त 9

भीतर एक नदी बहती है



भीतर एक नदी बहती है

भीतर एक नदी बहती है
लेकर कितने भेद हृदय में,
अंतर को सिंचित करती है !

उद्गम कहाँ ? कौन जानता
अंत भी अनदेखा ही रहता,
निर्मलता उर में भरती है !

तट पर कितने दुर्ग बनाये
युद्ध लड़े हारे जितवाए,
अनथक वह गतिमय रहती है !

सुर सरिता है यूँ भासता
देवलोक से आई भू पर,
मृत अतीत संग ले जाती है !

भावों की हाला भर उर में
मृदु मद्धिम गाती इक सुर में,
मंथर गति से इतराती है !



शुक्रवार, अगस्त 8

स्वतंत्र हैं हम

स्वतंत्र हैं हम



यही सच है कि
अपने ही हाथों खोदे हैं
अपने मार्ग में हमने गड्ढे
गिर कर उनमें फिर पछताए हैं

हाँ, यही सच है
अपने ही कारण बार-बार
ठगे गये हैं हम जीवन के खेल में

जब हर तरफ ख़ुशी की
 बरसात हो रही थी
ओढ़ लिया था हमने ही मायूसी का छाता
जब परमात्मा सूर्य बनकर
चमचमा रहा था गगन में
हम छुप गये थे
गहन, गीली, संकरी कन्दराओं में
रेंगने को मजबूर  

जब हवाएं आकाश में डोलती फिरती थीं
हमने माटी के नीचे खोद ली थीं खंदके
और डर कर मौत से छुपते फिर रहे थे

हाँ, यह सच है
हम ही चूक गये हैं बार-बार
उस अनंत की यात्रा पर जाने से
हमने ही स्वर्ण पिंजरों में
चाह था कैद होना

जब पुकार लगाई जा रही थी
प्रातः समीरण के साथ मन्दिर
की घंटियों के संग आती
मधुर झंकार के रूप में
हम किसी गहरी नींद में सोये थे
उसी बेहोशी में शायद हमने ही
बीज बोये थे
अब जब नजर आते हैं
बबूल के जंगल अपने चारों ओर
तो याद आती हैं वह तंद्रालस से भरी सुबहें


यह भी सच है
अपने ही हाथों खड़े कर सकते हैं
हम सुवर्ण महल अपने चारों ओर
जहाँ सुनाई देता है दैवीय संगीत
और छाई है एक अपूर्व शांति की सुगंध
जहाँ से उठती हैं ऋचाएं और शंखनाद
जहाँ से बहती है प्रेम की अजस्र धारा
जहाँ मिलता है हर जीवन को
आश्रय आनंद पूर्ण
जहाँ से उगते हैं दिव्य कमल
जहाँ प्रीत है अतीव सुकोमल

सच दोनों हैं
चुनाव हमें करना है
अपने अन्तस् को हमें भरना है
जो चाहे कर लें
जो चाहे भर ले

स्वतंत्र हैं हम...

गुरुवार, अगस्त 7

नदी उजाले की

नदी उजाले की



जब खो जाती हैं सारी चाहें
मिट जाती हैं तब
 जन्मों की दुःख भरी आहें
पावन हो जाती है निगाहें
फूलों से भर जाती हैं राहें !
उस घड़ी में एक और राज खुलता है
जब हर अँधेरा उजाले की नदी में घुलता है
कि जो चाहो बन सकते हैं
अपनी किस्मत की रेखा बदल सकते हैं
गढ़ सकते हैं अपना कल
पर ऐसा होता है कि
खो चुकी होती है तब तक हर आस
बिखरी रहती है तृप्ति की गंध आस-पास
इस कदर कि उसमें से पार कर
कुछ और पहुँचता ही नहीं भीतर
इतनी पावनता को बींधकर
जगत रह जाता है बाहर
जब परमात्मा घटता है भीतर !


बुधवार, अगस्त 6

वह

वह


चहका कूक बनकर
महका फूल बनकर,
उमगा दूब सा वह
विहंसा धूप सा वह !

खिलता हर कली में
फिरता हर गली में,
रचता नीड़ सुंदर
बहता नीर बनकर !

जलता तारिका बन
उड़ता सारिका बन
गिरता निर्झरों सा
पलता नव शिशु सा !

भजता भक्त बनकर
रचता कवि बनकर
गढ़ता बुत नये नित
बढ़ता उषा संग नित !