ढाई आखर सभी पढ़ रहे
प्रेम अमी की एक बूँद ही
जीवन को रसमय कर देती,
दृष्टि एक आत्मीयता की
अंतस को सुख से भर देती !
प्रेम जीतता आया तबसे
जगती नजर नहीं आती थी,
एक तत्व ही था निजता में
किन्तु शून्यता ना भाती थी !
स्वयं शिव से ही प्रकटी शक्ति
प्रीति बही थी दोनों ओर,
वह दिन और आज का दिन है
बाँधे कण-कण प्रेम की डोर !
हुए एक से दो थे जो तब
एक पुन: वे होना चाहते,
दूरी नहीं सुहाती पल भर
प्रिय से कौन न मिलन माँगते !
खग, थलचर या कीट, पुष्प हों
प्रेम से कोई उर न खाली,
मानव के अंतर ने जाने
कितनी प्रेम सुधा पी डाली !
करूणा प्रेम स्नेह वात्सल्य
ढाई आखर सभी पढ़ रहे
अहंकार की क्या हस्ती फिर,
प्रेमिल दरिया जहाँ बह रहे !
bahut hi sundar rachan - prem ki gehrai ko darshaati rahi
जवाब देंहटाएंस्वागत व आभार!
हटाएंसुन्दर
जवाब देंहटाएंस्वागत व आभार!
हटाएंआपकी लिखी रचना ब्लॉग "पांच लिंकों का आनन्द" पर गुरुवार 17 जुलाई 2025 को लिंक की जाएगी ....
जवाब देंहटाएंhttp://halchalwith5links.blogspot.in पर आप सादर आमंत्रित हैं, ज़रूर आइएगा... धन्यवाद!
!
बहुत बहुत आभार रवींद्र जी!
हटाएंबहुत सुंदर
जवाब देंहटाएंस्वागत व आभार!
हटाएंबहुत सुंदर सृजन
जवाब देंहटाएंस्वागत व आभार!
हटाएंउफ्फ....क्या गजब लिख डाला आपने कि ''खग, थलचर या कीट, पुष्प हों
जवाब देंहटाएंप्रेम से कोई उर न खाली,
मानव के अंतर ने जाने
कितनी प्रेम सुधा पी डाली''...वाह
स्वागत व आभार अलकनंदा जी !
हटाएंबहुत सुंदर
जवाब देंहटाएंस्वागत व आभार!
हटाएंसच है प्रेम के आगे अहंकार का क्या भाव ...
जवाब देंहटाएंसुन्दर अभिव्यक्ति ...
स्वागत व आभार!
हटाएंकरूणा प्रेम स्नेह वात्सल्य
जवाब देंहटाएंढाई आखर सभी पढ़ रहे
अहंकार की क्या हस्ती फिर,
प्रेमिल दरिया जहाँ बह रहे !
अति सुन्दर !! अद्भुत सृजन ।