बुधवार, मार्च 25

प्रेम रहेगा कैसे मन में

प्रेम रहेगा कैसे मन में


जब ना कोई घर में रहता 

 तब चुपके से कान्हा आता, 

नवनीत चुरा मटका तोड़े 

गोपी का हर दुख मिट जाता !


द्वार खुला ही छोड़ गई थी 

निशदिन उसकी राह देखती, 

उसका होना ही बाधा था 

कैसे वह यह बात बूझती !


वह रहती या रहता कान्हा 

दोनों नहीं समाते घर में, 

नील गगन सा जो विशाल है 

प्रेम रहेगा कैसे मन में !


अलग कहाँ थी वह कान्हा से 

जैसे दिल के भीतर झाँका, 

वही प्रीत-संगीत, नृत्य था 

ग्वाल-बाल बना वही बाँका !




 

13 टिप्‍पणियां:

  1. वाह,! सही कहा,
    उसका होना ही बाधा था

    कैसे वह यह बात बूझती !
    बहुत सुंदर🙏🙏

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  2. इस टिप्पणी को एक ब्लॉग व्यवस्थापक द्वारा हटा दिया गया है.

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  3. सच में आपकी ये कविता पढ़कर एकदम अलग ही सुकून मिला। आपने कान्हा और प्रेम को जिस तरह जोड़ा, वो बहुत सहज और गहरा लगा। मुझे सबसे ज्यादा वो लाइन छू गई जहाँ आपने कहा कि दोनों एक साथ घर में नहीं समाते, क्योंकि वही बात अंदर तक उतरती है। आपने भक्ति को बोझ नहीं बनाया बल्कि उसे प्यार और अनुभव की तरह रखा, और यही इसे खास बनाता है।

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    1. कविता के मर्म को समझते हुए सुंदर प्रतिक्रिया हेतु आभार!

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  4. आपकी लिखी रचना "पांच लिंकों के आनन्द में गुरुवार 26 मार्च, 2026 को लिंक की जाएगी .... http://halchalwith5links.blogspot.in पर आप भी आइएगा ... धन्यवाद!

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  5. वाह !!!!
    अत्यंत मनभावन सृजन ।
    उसका होना ही बाधा था

    कैसे वह यह बात बूझती
    चिंतनपरक...

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  6. बहुत अच्छी और सुंदर रचना
    बधाई

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