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बुधवार, जून 4

अपना सा दर्द




अपना सा दर्द 

फिर वही झूला, वही ढलती हुई शाम है
कई दिनों बाद मिली दिल को फुर्सत, आया आराम है
आसमां चुप है सलेटी सी चादर ओढ़े
पेड़ खामोश है, हवा भी बंद, नहीं कोई धुन छेड़े
एक खलिश सी भीतर कोई अपना बीमार है
दुआ के सिवा दे न सकें कुछ ये हाथ लाचार हैं
लो एक कार की रफ्तार से पत्तों में हरकत आयी
हिल-हिल के जैसे भेज रहे उसे दवाई
जीवन है तभी तक दिल धड़कते हैं
रोते हैं, हँसते हैं साथ बड़े होते हैं
दो हैं कहाँ जो कोई असर हो दिल पे किसी की बात का
दो हैं कहाँ जो दूजा लगे, अपना सा दर्द है जज्बात का
दुःख कहने से जो भीतर कसक उठती है वह अहम है
या कोई आजमाया हुआ वहम है

बुधवार, जनवरी 8

पाथेय

पाथेय 


जीवन की शाम आये 

इससे पहले 

थोड़ी सी तो मुस्कान समो लें भीतर 

पाथेय पास हो अपने 

तो रास्ता सहज ही कट जाएगा 

राह का हर अँधेरा 

ख़ुद में ही सिमट जाएगा 

भरी दोपहरी में 

जीवन की 

यदि शिकायत ही करते रह गये 

तो ख़ाली हाथ जाना होगा 

फिर उस दीर्घ मार्ग पर 

कोई न ठिकाना होगा !


रविवार, जून 18

गर्मियों की शाम सुंदर


गर्मियों की शाम सुंदर


छू रही धरा को शीतल ग्रीष्म की महकी पवन

छा गए गगन पे देखो झूमते से श्याम घन !


दिवस की अंतिम किरण भी दूर सोने जा रही

सुरमई संध्या सुहानी कहीं कोकिल गा रही !


कुछ पलों पहले हरे थे वृक्ष काले अब लगें

बादलों के झुण्ड जाने क्या कथा खुद से कहें !


छू रही बालों को आके करती अठखेलियाँ

जाने किसे छू के आयी लिये रंगरेलियाँ !


चैन देता है परस प्यास अंतर में जगाता

दूर बैठा चितेरा कूंची नभ पर चलाता !


झूमते पादप हँसें कलियाँ हवा के संग तन

नाचते पीपल के पात खिलखिला गुड़हल मगन !


गर्मियों की शाम सुंदर प्रीत के सुर से सजी

घास कोमल हरी मानो रेशमी चादर बिछी !


है अँधेरा छा गया अब रात की आहट सुनो

दूर हो दिन की थकन अब नींद में सपने बुनो !


मंगलवार, नवंबर 17

खत

खत 

किसी सूनी शाम को 

हथेलियों पर ठोड़ी टिकाये 

लिखने वाली मेज पर बैठे 

कोई बात फड़फड़ायी होगी तुम्हारे मन में 

लिखो फिर काट दो 

तकते रहो  निरुद्देश्य दीवार को 

अपनी आवाज को 

सुनने का प्रयत्न करते 

आँखों से दो कतरे शबनम के ढुलक कर 

बैठ गए होंगे कापी पर

कैसा सम्बोधन  ! अनोखा भीगा सम्बोधन 

अभिवादन के लिए सारा शब्दकोश 

ढूंढ आया होगा तुम्हारा मस्तिष्क 

कि बाहर से अकेले पक्षी की 

हूक सिमट आयी होगी कमरे में 

.. उस कागज में 

और एक लिफाफा तैयार !  

 

मंगलवार, अक्टूबर 8

एक पाती दुलियाजान के नाम



एक पाती दुलियाजान के नाम

बरसों पहले एक भीगी शाम  
काली धुली सड़क पर आहिस्ता से कदम रखे
तेल के कुँओं को गंध कहीं दूर थी
पर.. बादलों को गुलाबी करती
आग की लपटें दूर से दिखाई दे रही थीं
 देखा फिर झरता हुआ आसमान देर रात तक
गेस्टहाउस के कमरे की खिड़की से
हरियाली का एक विशाल समुन्दर था सामने
जब अगली सुबह गोल्फ कोर्स तक नजर गयी
उस दिन से आज तक...कोई भोर ऐसी नहीं हुई
जब इस तेल नगरी की सड़कों को
हमारे कदमों ने न नापा हो
फूलों से लदे पेड़ों को न सराहा हो
आकाश पर रंग बिखेरते बादलों को न निहारा हो
गन्धराज की सुवास हो
या शेफाली की मदमस्त करने वाली ख़ुशबू
अमलतास के फूलों की स्वर्णिम झालरें हों
या सुर्ख लाल गुलमोहर से लदे पेड़
बैंगनी अजार हों या गुलाबी कंचन..
कदम्ब की डालियाँ हों या सुंदर उपवन
दुलियाजान की हर बात निराली है
यहाँ की हवा में कोई जादू है शायद
या फिर इसकी फितरत ही मतवाली है
जालोनी क्लब के गलियारे और पुस्तकालय
ऑडीटोरियम या तरणताल..याद आते ही खुल जाता है
भीतर स्मृतियों का एक संसार विशाल
लेडीज क्लब की मीटिंग्स और संगीत के भव्य आयोजन
न जाने कितने कलाकारों के हुए जहाँ दर्शन
विदाई समारोहों में नम हुईं आँखें
जीवन के चौंतीस बरस जहाँ बीते
उस जमीन के जर्रे-जर्रे को सलाम है
यहाँ की हर गली हर कूचे को प्रणाम है !

सोमवार, अप्रैल 15

सुरमई शाम ढली




सुरमई शाम ढली


खग लौट चले निज नीड़ों को
भरकर विश्वास सुबह होगी !

बरसेगा नभ से उजियारा
फिर गगन परों से तोलेंगे,
गुंजित होगा यह जग सारा
जब नाना स्वर में बोलेंगे !

इक रंगमंच जैसे दुनिया
हर पात्र यहाँ अभिनय करता,
पंछी, पादप, पशु, मानव भी
निज श्रम से रंग भरा करता !

किससे पूछें ? हैं राज कई
कब से ? कहाँ हो पटाक्षेप,
बस तकते रहते आयोजन
विस्मय से आँखें फाड़ देख !

अंतर में जिसने प्रश्न दिए
उत्तर भी शायद वहीं मिलें,
कभी नेत्र मूँद हो स्थिर बैठ
मन के सर्वर में कमल खिलें !

बस खो जाते हैं प्रश्न, नहीं
उत्तर कोई भी मिलता है,
इक मीठा-मीठा स्वाद जहाँ
इक दीप अनोखा जलता है !

बाहर उत्सव भीतर नीरव
कुछ कहना और नहीं कहना,
अंतर से मधुरिम धारा का
 धीमे-धीमे से बस बहना !


मंगलवार, फ़रवरी 7

स्वाद हो या रास का सा


स्वाद हो या रास का सा


एक शीतल सा धुआं है
या धुंधलका शाम का सा,
एक ज्योति रक्त वर्णी
एक दीपक अनदिखा सा  !

नाद अनहद गूँजता यूँ
गीत अनगाया हुआ सा,
सृष्टि का हो बीज जैसे
हर कहीं छाया हुआ सा !

एक झोंका प्रीत का हो
गंध ऐसी मदभरी सी,
एक अनजाने नगर से
भर संदेसे ला रही सी !

रस भरा महुआ टपकता
या मद मृदु रसाल का सा,
फूटी हो नवनीत गगरी
स्वाद हो या रास का सा !

एक अनछुआ परस हो
  स्पर्श कोई हो परों सा,
पुलक कोई भर रहा हो
हाथ बन आशीष सा !

शुक्रवार, नवंबर 21

कोई दूर खड़ा दे आमन्त्रण

कोई दूर खड़ा दे आमन्त्रण



हर मिलन अधूरा ही रहता
हर उत्सव फीका लगता है,
कितना ही भरना चाहा हो
तुझ बिन घट रीता लगता है !

ज्यों बरस-बरस खाली बादल
चुपचाप गगन में खो जाते,
कह-सुन जीवन भर हम मानव
इक गहन नींद में सो जाते !

कितनीं मनहर शामें देखीं
कितनी भोरों को मन चहके,
सूनापन घिर-घिर आता फिर
कितने हों वन –उपवन महके !

कोई दूर खड़ा दे आमन्त्रण
पर नजर नहीं वह आता है,
जाने किस लोक का वासी है
जाने किस सुर में गाता है !

पलकें हो जाती हैं भारी
नीदों में स्वप्न जगाते हैं,
इक भ्रम सा होता मिलने का
जब भोर जगे मुस्काते हैं !

   

मंगलवार, नवंबर 4

देखो ! शाम ढलती है

देखो ! शाम ढलती है



देखो ! शाम ढलती है
लौटते हैं नीड़ को खग
हुए सूने गाँव के मग
आस मिलन की पलती है !

जो खिले थे प्रातः बेला
खो गये झर पुष्प सहसा,
जो बहे थे सुर सुरीले
खो गये स्वर पंछियों के !

जल उठे हैं दीप घर-घर
बज उठे हैं आरती स्वर,
रात्रि का स्वागत करें अब
रात-रानी खिलती है !

गगन का भी ढंग बदला
विटप का भी रंग बदला,
रोशनी की थी जो माया
किस तरह छलती है !

कूकती है इक अकेली
कोकिला बिछुड़ी तरु से
राह भटका ज्यों मुसाफिर
भटकन ही खलती है !


बुधवार, सितंबर 25

मन

मन


मन जब चहकते पंछियों की तरह
 मुंडेर पर बैठ जाता है
निरुद्देश्य..
बादलों के बनते बिगड़ते रूप
 आँखों में भर जाते हैं
जाने कितने ख्वाब
 सूरज की आखिरी किरन भी जैसे
चुपचाप कोई संदेश दे
ले रही हो विदा..
किसी सुरमई शाम को
 पंखों की फड़फड़ाहट और बसंती बयार
की मद्धिम सी आवाज...
 क्यों मन मौसम बन जाता है तब
 बदलते मौसम के साथ
ऊदा, गहरा, लाल, पीला, नीला मन !

शुक्रवार, मार्च 29

शाम अब ढलने लगी है



शाम अब ढलने लगी है


आसमां से चाँद झांके
इक चमकती गेंद जैसे रोशनी की
नील अम्बर पर खिला हो
पीतवर्णी पुष्प कोई...
गुलमोहर की पत्तियों से
देखता है खिलखिलाकर
तक रही है इस धरा से
इक कमिलिनी मुस्कुरा कर !
मौन में संवाद घटता
प्रकृति से उल्लास झरता
शाम अब ढलने लगी है
पंछियों का झुण्ड लौटे
कूजते अंतिम स्वरों को
रात्रि की गरिमा लपेटे
तिमिर बढता जा रहा है
कालिमा के पंख खोले  
नीड़ में विश्राम पाकर
फिर जगेंगे कल सुबह वे
सिमट अपने शावकों संग
आँख मूंदे सो गए जो
चहचहाते गीत गाते
दिवस भर जो उड़ रहे थे !

सोमवार, अगस्त 1

वह आज भी प्रतीक्षा रत है..


वह आज भी प्रतीक्षा रत है..

लुकाछिपी खेलने वाले बच्चों में
एक जन छिप गया दूर सबकी नजरों से
ऐसी जगह, जहाँ ढूँढ न सका कोई भी उसे
कुछ देर वे ढूँढते रहे थे
फिर ढलती शाम देख
जाने लगे एक-एक कर
भूल ही गए अपने उस सखा को,
जो छिपा था दूर बड़े पाषाण के पीछे
गुल्म-लताएँ उग आयी थीं जिसके चहुँ ओर
मन ही मन था वह प्रतीक्षारत अपने साथियों का
जिनमें से एक व्यस्त था
पथ पर आते-जाते वाहनों को निहारने में
दूसरा खिलौनेवाले की बंसी की धुन में खो गया था
एक स्वादिष्ट व्यंजन की तलाश में खिंचा चला गया
खोमचेवालों की तरफ
और किसी को उसकी माँ सहलाते हुए ले गयी
कोई मित्र से झगड़ने में हो गया मशगूल
यानि की हर कोई गया भूल
 उस साथी को
जो शाम ढलने तक करता रहा था प्रतीक्षा
और शायद हर रोज करता रहेगा....
.......
.......
क्यों न हम ही उसे ढूँढें !