बुधवार, जून 4
अपना सा दर्द
बुधवार, जनवरी 8
रविवार, जून 18
गर्मियों की शाम सुंदर
गर्मियों की शाम सुंदर
छू रही धरा को शीतल ग्रीष्म की महकी पवन
छा गए गगन पे देखो झूमते से श्याम घन !
दिवस की अंतिम किरण भी दूर सोने जा रही
सुरमई संध्या सुहानी कहीं कोकिल गा रही !
कुछ पलों पहले हरे थे वृक्ष काले अब लगें
बादलों के झुण्ड जाने क्या कथा खुद से कहें !
छू रही बालों को आके करती अठखेलियाँ
जाने किसे छू के आयी लिये रंगरेलियाँ !
चैन देता है परस प्यास अंतर में जगाता
दूर बैठा चितेरा कूंची नभ पर चलाता !
झूमते पादप हँसें कलियाँ हवा के संग तन
नाचते पीपल के पात खिलखिला गुड़हल मगन !
गर्मियों की शाम सुंदर प्रीत के सुर से सजी
घास कोमल हरी मानो रेशमी चादर बिछी !
है अँधेरा छा गया अब रात की आहट सुनो
दूर हो दिन की थकन अब नींद में सपने बुनो !
मंगलवार, नवंबर 17
खत
खत
किसी सूनी शाम को
हथेलियों पर ठोड़ी टिकाये
लिखने वाली मेज पर बैठे
कोई बात फड़फड़ायी होगी तुम्हारे मन में
लिखो फिर काट दो
तकते रहो निरुद्देश्य दीवार को
अपनी आवाज को
सुनने का प्रयत्न करते
आँखों से दो कतरे शबनम के ढुलक कर
बैठ गए होंगे कापी पर
कैसा सम्बोधन ! अनोखा भीगा सम्बोधन
अभिवादन के लिए सारा शब्दकोश
ढूंढ आया होगा तुम्हारा मस्तिष्क
कि बाहर से अकेले पक्षी की
हूक सिमट आयी होगी कमरे में
.. उस कागज में
और एक लिफाफा तैयार !
मंगलवार, अक्टूबर 8
एक पाती दुलियाजान के नाम
सोमवार, अप्रैल 15
सुरमई शाम ढली
मंगलवार, फ़रवरी 7
स्वाद हो या रास का सा
या धुंधलका शाम का सा,
एक ज्योति रक्त वर्णी
एक दीपक अनदिखा सा !
नाद अनहद गूँजता यूँ
गीत अनगाया हुआ सा,
सृष्टि का हो बीज जैसे
हर कहीं छाया हुआ सा !
एक झोंका प्रीत का हो
गंध ऐसी मदभरी सी,
एक अनजाने नगर से
भर संदेसे ला रही सी !
रस भरा महुआ टपकता
या मद मृदु रसाल का सा,
फूटी हो नवनीत गगरी
स्वाद हो या रास का सा !
एक अनछुआ परस हो
स्पर्श कोई हो परों सा,
पुलक कोई भर रहा हो
हाथ बन आशीष सा !




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