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गुरुवार, अक्टूबर 29

मधुर याद बनकर रह जाते


मधुर याद बनकर रह जाते 


महाशून्य में जो खो जाते 

मधुर याद बनकर रह जाते !


जीवन रण में विजय मिली, पर

हो आहत जो बाट जोहते, 

कालदेव अंतिम पीड़ा हर 

हर बंधन से मुक्ति दिलाते !


छोड़ जगत यह वापस जाते 

मधुर याद बनकर रह जाते !


जग मेले में आकर मिलते 

सँग-सँग खुशियां सोग बांटते, 

इक दूजे का स्नेह पात्र बन 

बढ़ते, पलते, और पनपते !


इक झटके में गुम हो जाते 

मधुर याद बनकर रह जाते !


दुनिया एक सराय अनोखी 

अनगिन आते, अनगिन जाते, 

आते-जाते ही रिश्तों की 

सरस डोर से क्यों बँध जाते !


नीड़ त्याग नव नीड़ सजाते ?

मधुर याद बनकर रह जाते !


या फिर कारगार है दुनिया 

सजा काटने ही हम आते, 

जब जिसकी सजा पूरी हुई 

कारावास से मुक्ति पाते !


तोड़ें बंधन फिर उड़ जाते 

मधुर याद बनकर रह जाते !


 

रविवार, अक्टूबर 18

मृत्यु के उस अंधकार से

मृत्यु के उस अंधकार से

 जो सृष्टि की मूल प्रकृति हैं 

तीनों गुणों को करें सक्रिय, 

घोर विनाश की महारात्रि 

भीषण, उग्र ज्यों अंतिम प्रलय !


काल नहीं ठहरता उनमें 

मृत्यु की भी मृत्यु हैं देवी, 

कालरात्रि अतीव घोरा हैं 

 शुभंकरी कहलातीं देवी !


पीड़ाएँ, दुख रहते जग में 

देवी उन पर शासन करतीं,  

दुख दरिद्रता, रोग, शोक हर 

मंगलमय, शुभ प्रियता भरतीं !


कठिन समय जीवन में आये 

ऐसा भी कुछ साधन करतीं, 

दो-दो हाथ करें हम, क्योंकि 

संघर्षों की आग तपाती !


‘मैं’ ‘मेरा’ के चक्रव्यूह से 

उग्र रूप माँ का ही निकाले, 

मृत्यु के उस अंधकार से 

 गुजर अहम् नव जीवन पा ले ! 


अहंकार को भस्मित करके 

अभय और वरदान लुटातीं, 

ज्वालाएँ नेत्रों से प्रकटे 

विघ्नों को जो सहज हटातीं !


पग-पग पर यह काल डस रहा 

मृत्यु रूप में माँ ही आतीं, 

एक गहन विश्राम दिलाकर 

नव जीवन की ओर बढ़ातीं !


परम रहस्य, गोपनीय छाया 

दिव्य प्रकाश छिपाये भीतर, 

करें सामना भय का यदि हम 

 पार ले चलें अभय दिलाकर !


शुक्रवार, सितंबर 25

ॐ शांति ! शांति !! शांति !!!


ॐ शांति ! शांति !! शांति !!!


 भीतर साधें शांति, संतुलन   

हो गतिमय बाहर का जीवन,

  ज्यों शिव शांत रहें अंतर में 

बाहर करते तांडव नर्तन !


ज्यों वृक्ष टिका भीतर भू के 

लिए शांत जड़ों का आधार, 

बाहर झूम रहीं शाखाएँ

नित लेकर हवाओं का साथ !


शांत जिस तरह तल नदिया का

जिस पर दौड़ लगाती जाती, 

अविचल, अनथक शताब्दियों से 

लहरें गीत विजय के गातीं ! 


ऐसे रहे शांत अंतर्मन 

हाथ कर्म में लगें निरन्तर

मीलों की दूरियाँ नाप लें  

लेकिन हो अचलता भीतर ! 


जिह्वा से वाणी का प्रयोग  

 देखें नैन सौंदर्य जग का, 

टूटे नहीं शांति भीतर की 

क्या हम नहीं चाहते ऐसा ?


प्रभु से हर प्रार्थना में नित्य 

 पूर्ण शांति क्या नहीं माँगते ?

 जो हीरे जैसी अकाट्य हो

ऐसी समता नहीं चाहते !


मंगलवार, सितंबर 1

जीवन क्षण भंगुर है

जीवन क्षण भंगुर है 


प्रमाण है इसका 
नेपाल की त्रासदी
पल भर पहले जो जीवित थे 
पल भर बाद ही 
मिट गया उनका निशान 
खो गये उनके प्राण ! 

न जाने कितनी बार दोहराई जाएगी 
कुदरत की विनाश लीला 
मानव की आशाओं, आकांक्षाओं 
के सिर पर पैर रखकर 
उसे उसकी सही पहचान बतायी जाएगी !

कुछ भी तो नहीं है वह 
इस अनंत सृष्टि के आगे 
क्यों खोया है सपनों में 
अब तो जागे ! 

नदियों पर बाँध बनाता है 
जगत में महल उठाता है 
खोद देता पर्वतों में सुरंगें
 और रेगिस्तान में कमल 
खिलाता है
पर बेबस है धरा के 
प्रकोप के आगे 
अभी भी ज्वालामुखी है 
जिसके भीतर 
जो करवट बदलती है तो 
पर्वत भी हिल जाते हैं 
मानव के सारे प्रयास 
ताश के पत्तों की तरह 
बिखर जाते हैं !

बुधवार, अगस्त 26

श्वासों की समिधा को

श्वासों की समिधा को 


श्वासों की समिधा को
अंतर की हवि कर दें,
पल-पल में जी लें फिर
सुंदर की छवि भर लें !

उर के घट पावन में
प्रियतम जो बसता है,
अर्पण कर भाव सभी
मन मयूर तकता है !

पावक है शीतल सी
छुवन बड़ी कोमल सी,
हर पल का साक्षी वह
स्मृतियाँ अति श्यामल सी !

श्वासों की माला को
हर पल ही याद रखें,
उसको ही कर अर्पित
मुक्ति का स्वाद चखें !

अर्थहीन सा जीवन
क्रीड़ा इक बन भाए,
कृत्यों का करना ही
उनका फल बन जाये !

जैसे वह बाँट रहा
दोनों ही हाथों से,
भर झोली बिखराएं
हम कुछ सौगातों से !

दाता वह दानी बन
ज्ञाता वह ज्ञानी बन,
उसकी ही थाती को
चरणों पर कर अर्पण !

उसकी महाशक्ति को
जगकर हम पहचानें,
उसकी महाभक्ति को
जीवन का फल मानें !

भीतर जो रहता है
युग-युग का है साथी,
मौनी जब होता मन
झलकाता शुभ ज्योति!

सोमवार, अगस्त 10

सलोनी की कहानी

सलोनी की कहानी 


सलोनी का नाम पुकारा गया तो वह धीरे-धीरे सीढ़ियाँ चढ़ती हुई मंच पर गई। पूरा हॉल तालियों से गूंज उठा। महिलाओं की अर्ध मैराथन दौड़ में उसे एक और पुरस्कार मिला था। न जाने कितने ही मैडल और ट्रॉफ़ियाँ उसके बड़े से सुंदर घर की दीवार पर बनी आलमारी में सजा कर रखी गई थीं। वह अपनी सीट पर लौटी तो साथ बैठी उसकी सहकर्मी अलका ने मुसकाते हुए बधाई दी। कार्यक्रम के बाद चाय-नाश्ते का भी प्रबंध था। वे दोनों अपनी-अपनी प्लेट्स लेकर बाहर बरामदे में आकर बैठ गयीं। सलोनी की सहकर्मी विशेष रूप से इस कार्यक्रम में उसके साथ आयी थी। उसे अपने दफ़्तर में आयी इस नयी महिला के प्रति सहज ही जुड़ाव महसूस होने लगा था। वह अपने काम में तो दक्ष थी ही, समय की पाबंद भी थी और सदा चुस्त-दुरस्त रहती थी। उसके आस-पास एक सकारात्मक ऊर्जा डोलती रहती थी, किंतु इसके बावजूद कोई बात थी जो कभी-कभी उसके चेहरे ओर एक छाया सी बन कर छा जाती थी और तब वह अपने आसपास के वातावरण से कहीं दूर चली जाती थी। उसने एक-दो बार उसके बारे में कुछ पूछना चाहा पर कभी समय इतना कम था कि सामान्य शिष्टाचार में ही समाप्त हो गया, या कभी उसने किसी तरह टाल दिया और बातों का रुख़ कहीं और मोड़ दिया। आज उनके पास बहुत समय था, वह तय करके आयी थी कि उसके पूर्व जीवन के बारे में अवश्य ही कुछ पूछेगी।  


सलोनी ने अल्पाहार समाप्त किया तो उठ खड़ी हुई, अलका ने हाथ पकड़ कर उसे बैठा दिया । सलोनी, हम कितने दिनों से एक-दूसरे को जानते हैं, पर तुमने कभी अपने बारे में कुछ नहीं बताया। तुम यहाँ की तो नहीं हो, इस शहर में कब आयीं? जरा बताओ न, तुम्हारे इस जोश भरे जीवन का राज क्या है ? सलोनी उसकी ओर देखकर मुस्कुरा दी, पर एक पल के लिए उसकी आँखों में नमी छलक आयी। झट उसने रूमाल निकल कर आँखें पोंछी और बोली तू सुनना चाहती है ? तो सुन तुझे शुरू से ही बताती हूँ।


मार्गेरिटा का नाम तो तूने सुना होगा, जी हाँ, जिसे असम की कोयला रानी भी कहा जाता है। वहीं मेरा जन्म हुआ। 


अलका ने कभी इस शहर का नाम नहीं सुना था, उसने पूछा “यह कहाँ है’? 


तिनसुकिया ज़िले में दिहिंग नदी के किनारे बसा यह एक सुंदर औद्योगिक शहर है। हरे-भरे चाय के बाग़ानों से घिरा है यह शहर। तुझे जानकर आश्चर्य होगा कि इस शहर का नाम इटली की रानी ‘मार्गेरिटा ऑफ़ सेवॉय’ के नाम पर रखा गया था। 


अलका ने उसे टोका, “पर तुम लोग तो मारवाड़ी हो न, असम में कैसे पहुँच गये’ ? 

सलोनी ने कुछ इतिहास की किताबों में पढ़ा था और कुछ अपने दादाजी से सुना था।उसने बताया, असम में मारवाड़ी समुदाय का आगमन तो अहोम राजवंश के काल में ही हो गया था। ईस्ट इंडिया कंपनी के शासनकाल में मारवाड़ी लोग चाय बाग़ानों और दूरदराज़ के क्षेत्रों में बस गये। इन इलाक़ों में आवश्यक वस्तुएँ उपलब्ध कराने और नक़द अर्थव्यवस्था को मज़बूत करने में लग गये। 

अलका ने रस लेते हुए अच्छा ! कहा तो सलोनी और भी उत्साह से बताने लगी। 

“तुझे पता है, गोहाटी में सौ साल से भी पुराना मारवाड़ी अस्पताल है और असम में कई शिक्षा संस्थाएँ भी मारवाड़ियों ने बनवायी हैं। मारवाड़ी परिवार अब पूरी तरह से स्थानीय संस्कृति में घुल-मिल गये हैं। असमिया भाषा बोलते हैं। कितने ही लोग साहित्य और शिक्षा के क्षेत्र में सक्रिय हैं।पूरे असम में शायद ही कोई हो जिसने ज्योतिप्रसाद अग्रवाला का नाम नहीं सुना होगा? 

तेरे दादाजी और पिताजी क्या करते हैं ?

“दादा जी अब नहीं रहे, पिताजी एक व्यापारी हैं, जो अब भी बहुत व्यस्त रहते हैं। जब हम भाई-बहन छोटे थे तब तो उनकी व्यस्तता बहुत अधिक थी।” 

माँ-पिता जी दोनों अब वृद्धावस्था की दहलीज़ पर खड़े हैं। माँ परंपरागत मारवाड़ी समाज की एक गृहणी हैं, जिनका अधिकतर समय घर में ही बीता। हम दोनों भाई-बहन लाड़-प्यार से पले, मेरे माँ-पिता ने हमारे पालन-पोषण में कभी कोई भेद नहीं किया।मैं स्कूल की क्रिकेट टीम में थी और बहुत तेज साइकिल चलाती थी। जब भी घर में दादी या माँ किसी बात पर मुझे टोकतीं, तो मैं साइकिल लेकर निकल जाती।  

अलका बहुत ध्यान से उसकी बातें सुन रही थी, उसने पूछा, कॉलेज की पढ़ाई तूने कहाँ से की ?

मैंने स्थानीय कॉलेज से बीकॉम किया। छोटे भाई को पढ़ने के लिए बाहर भेजा गया। ग्रेजुएशन की डिग्री मिलते ही मेरे विवाह की बात शुरू हो गई। 

क्या ? अलका ने आश्चर्य व्यक्त किया तो सलोनी ने बताया, स्कूल व कॉलेज की मेरी सखियाँ आगे की पढ़ाई के लिए फ़ार्म भर रही थीं, पर मुझे लड़के वाले देखने आ रहे थे। आख़िर बड़े-बूढ़ों की राय से मध्यप्रदेश के मारवाड़ी परिवार के एक लड़के महेश के साथ बात पक्की हो गई। सबसे अच्छी बात थी कि होने वाले पति या ससुराल वालों को मेरी आगे की पढ़ाई से कोई एतराज नहीं था।लड़का बड़े शहर में काम करता था और देखने-सुनने में भी अच्छा था। मैं उससे पहली बार तब मिली जब वे लोग मुझे देखने आये। थोड़ी देर के लिए हमें एक-दूसरे से बात करने के लिए अकेले छोड़ दिया गया, पर मेरा मन जो पहले ही विद्रोह कर रहा था, शांत होकर किसी भी निर्णय पर पहुँचने की स्थिति में नहीं था। मैंने माँ से कहा, एक बार और मुझे मिल लेने दो। माँ ने जब मेरी दृढ़ता देखी तो इस बात के लिए पिताजी को मना लिया। हम विवाह से पूर्व एक बार और मिले, हमारे मध्य सामान्य बातें हुईं। घर लौटी तो माँ मेरे चेहरे पर आश्वस्ति के भाव देखकर संतुष्ट हो गयीं।कमाऊ और सुशील लड़का भला छोड़ा भी कैसे जा सकता था, ‘चट मँगनी और पट ब्याह’ हो जाने के बाद मैं भी उस बड़े से शहर में रहने आ गई। लड़का किराए के एक बड़े से फ़्लैट में रहता था, उसका जीवनस्तर भी अच्छा था, किसी सुविधा की कोई कमी नहीं थी। 

लेकिन दिन भर घर पर बैठे रहकर तू क्या करती थी ? क्या तूने आगे की पढ़ाई के लिए दाख़िला लिया ?

हाँ, कुछ दिन घर पर रहने के बाद मैंने अपनी रुचि के अनुसार गृह सज्जा का एक कोर्स कर लिया। पहले किसी कंपनी में नौकरी की, फिर अनुभव हो जाने के बाद अपना ख़ुद का काम शुरू कर दिया। काम चल निकला, नये बने घरों में मुझे लकड़ी का काम करवाना होता था। घर की सजावट करना मेरा शौक़ था और काम के प्रति लगन बचपन से ही घर में काम करते-करते आ गई थी। 

क्या तेरे पति को तेरे काम करने से कभी कोई एतराज नहीं हुआ ? अलका के प्रश्न में छिपी आशंका को सलोनी ने भाँप लिया था।उसने मन ही मन सोचा, वह शायद यही चाहते थे कि मैं अधिक से अधिक व्यस्त रहूँ ताकि उनके मामलों में न पड़ूँ। उसने कहना शुरू  किया। 

“मेरे भूतपूर्व पति एक ऐसी कंपनी में नौकरी करते थे, जो लोगों का धन निवेश करवाने में सहायता करती थी। पति का स्वभाव बहुत अच्छा था, वह मेरा ध्यान रखता था और घर के काम में सहायता भी करता था। यहाँ तक कि प्याज़ काटते समय मेरी आँखों में आये आँसू देखकर उसने मुझे प्याज़ काटने से मना कर दिया, स्वयं काट देता नहीं तो बिना प्याज़ के भोजन बनाने को कहता।तब मुझे लगता विवाह के समय सभी ने सच कहा था, भगवान ने तुम दोनों की कितनी सुंदर जोड़ी बनायी है, तुम बहुत भाग्यशाली हो। यह कहते हुए पल भर को सलोनी रुकी, जैसे उन दिनों को याद करके उसे अचरज हो रहा हो। क्या यह सब उसके साथ घटा था? 

अलका ने उसे स्नेह भरी नज़रों से देखा और उसके आगे बोलने की प्रतीक्षा करने लगी।सलोनी ने आगे कहा-  

“मैं जब अपने काम में ज़्यादा व्यस्त हो गई, तो खाना बनाने के लिए एक सहायिका को रख लिया।हम दोनों सुबह काम पर निकल जाते तो शाम को ही लौटते, लंच साथ ले जाते और रात का खाना घर आकर खाते। एक-दूसरे के जीवन में गहराई से झाँकने का न तो हमारे पास समय ही था और न ही हमारे स्वभावों में ऐसा था। कभी-कभी हमारे मध्य नोकझोंक भी होती, पर थोड़ी बहुत ग़लतफ़हमी तो हर रिश्ते में कभी न कभी हो जाती है। एकाध दिन में सब ठीक हो जाता और गृहस्थी की गाड़ी आगे बढ़ने लगती। सलोनी फिर जैसे अतीत में खो गई थी। 

अलका ने उसे जगाते हुए कहा, “हाँ, कुछ न कुछ शिकायत की गुंजाइश तो हर रिश्ते में रहती है, पर ऐसा क्या हुआ कि ?

सलोनी संभल कर बैठ गई और कुछ इस तरह बताने लगी जैसे किसी और की बात कह रही हो। 

‘देखते-देखते चार वर्ष बीत गये, ऊपर-ऊपर से देखें तो सब कुछ अच्छा ही चल रहा था कि एक दिन मैं इस सपने जैसी सुंदर ज़िंदगी से जाग गई। मुझे एक विवाह में जाना था। मैंने महेश से कहा, क्या तुम बैंक से मेरे गहने ला दोगे? वह ‘हाँ’ कहकर गया पर शाम को लौटा तो गहने नहीं लाया था। पूछने पर अधिक काम होने का बहाना करके टाल गया। दूसरे दिन भी यही हुआ तो मैंने स्वयं ही जाने का फ़ैसला किया, पर लॉकर में एक-दो छोटे गहनों को छोड़कर कुछ भी नहीं था। मेरा माथा ठनका। घर आते ही मैंने अपनी आलमारी खोली, जहाँ मैं नक़द धन रखती थी जो सामान ख़रीदने के लिए ग्राहकों से मिलता था। मैंने कभी अलमारी में ताला बंद नहीं किया था। वहाँ भी कुछ रक़म ग़ायब थी। दिन भर मेरा मन काम में नहीं लगा, मुझे पति पर संदेह हो रहा था, पर उसकी पुष्टि कैसे करूँ, इसका कोई उपाय नहीं सूझ रहा था। मेरा इतना ध्यान रखने वाला पति मेरे साथ छल करेगा, यह बात मैं सोच भी नहीं सकती थी। 

संयोग से उसी दिन मेरे मौसा-मौसी मिलने आये, मुझे परेशान देखकर मौसा ने कारण पूछा तो मैंने उन्हें सब बता दिया। उन्होंने मुझसे कहा, तुम फ़ौरन पति के दफ़्तर में एक इमेल भेजो और उसे घर आते समय एक प्रिंट आउट लाने को कहो। उसने ऐसा ही किया पर पता चला, वहाँ उसका कोई ईमेल एकाउंट नहीं था। शाम को रोज़ की तरह महेश घर आया, चाय आदि देकर मैंने पूछा, “एक प्रिंट आउट के लिए मेल किया था, लाए हो? वह सकपका गया, फिर बोला, “दफ़्तर का प्रिंटर ख़राब है, लाओ, बाज़ार से करवा लाता हूँ।” तब तक चुप बैठे चाचा ने उसे कड़ी नज़र से देखा और सब कुछ साफ़-साफ़ बताने को कहा। वह सीधा होकर बैठ गया और धीरे-धीरे सारी बात बतायी।तीन महीने पहले दफ़्तर में उसने किसी ग्राहक का बहुत सारा धन ग़लत जगह निवेश करवा दिया था।कहीं से उधार लेकर उसका हिसाब तो पूरा किया पर जिनसे उधार लिया था, वे लोग पीछे पड़ गये, इसलिए पत्नी के गहने भी गिरवी रखने पड़े। उसे नौकरी से निकाल दिया गया है। 

मैं उसका मुँह देखती रह गई। वह बड़े आराम से सारी बातें बता रहा था। आलमारी से कितना धन उसने लिया था, इसका कोई जवाब उसके पास नहीं था। पिछले कई महीनों से वह बेरोज़गार था।जाने सारा दिन कहाँ बिताता था और पहले की तरह शाम को मुस्काता हुआ मेरा स्वागत करता था। उसने एक बार भी अपनी परेशानी में मुझे शामिल नहीं किया, शायद उसे अपनी नौकरी जाने का भी कोई ग़म नहीं था। उसी तरह मुझे बाहर ले जाता, महँगे होटलों में खाना खिलाता और उपहार भी ख़रीद कर देता रहा। दिवाली आयी तो हज़ारों के पटाखे भी वह लाया था। 

उस दिन वे सारी बातें याद करके मेरा दिल जोड़ों से धड़कने लगा था, ऐसे व्यक्ति के ऊपर भरोसा करके जैसे मैं आँखें मूँदे हुए चल रही थी। मौसा-मौसी मुझे हिम्मत रखने को कहकर चले गये। मुझे कुछ समझ नहीं आ रहा था। महेश ने एकाध बार कुछ कहा, पर मेरे कानों में उसका एक भी शब्द नहीं जा रहा था। मेरे साथ विश्वासघात हुआ था और जिसने किया था वह कितना निर्लिप्त था, जैसे उसे भरोसा था कि उसकी हर भूल क्षमा के योग्य है। रात भर मैं सोयी नहीं, अगले दिन माँ को सारी बात बतायी। मेरे पैरों के नीचे से जैसे ज़मीन ही खिसक गई थी। मेरे मन में पति पर आ रहे क्रोध के साथ अपने पर भी क्रोध आ रहा था, मैं इस तरह बेख़बर कैसे बनी रही? क्या मैंने एक लापरवाह, ग़ैर ज़िम्मेदार व्यक्ति को अपने जीवन के अनमोल चार वर्ष दे दिये थे, जिसे अपने कृत्यों पर जरा भी अफ़सोस नहीं था, जिसने मुझे अँधेरे में रखा और मेरे विश्वास का ग़लत लाभ उठाया। यह कहते हुए सलोनी के चेहरे पर वही छाया उभर आयी थी, जिसे पहले भी अलका ने देखा था। उसने सलोनी का हाथ अपने हाथ में लिए और कुछ न कहकर केवल उसकी आँखों में झाँका। वह कुछ आश्वस्त होकर कहने लगी।

दो दिन बाद ही हमारा सारा परिवार आ गया। जिन लोगों ने विवाह करवाया था, उन्होंने लड़के वालों को भी बुला लिया। दोनों तरफ़ के बड़ों ने तय किया कि लड़के वाले गहनों को छुड़ाकर मुझे लौटायें, और तलाक़ के लिए कार्यवाही शुरू करें।मेरी माँ का रोते-रोते बुरा हाल था। मेरे बचपन की एक सखी मुझसे मिलने आयी थी, जिसने माँ को सँभाला। माँ बार-बार यही कह रहीं थीं, क्यों हमने इतनी जल्दी में विवाह कर दिया, काश ! तुझे आगे पढ़ने ही भेज देते। 

इस बीच महेश ने कई बार मुझसे संपर्क करने का प्रयत्न किया, मेरी एक स्कूल मित्र के माध्यम से उसने संदेश भी भिजवाया, पर मैं अब उस पर किसी भी हालत में विश्वास नहीं कर सकती थी।माता-पिता कुछ दिन मेरे साथ रहे और फिर उन्हें वापस जाना ही था। उन्होंने मुझे भी अपने साथ वापस घर लौटने को कहा, पर मैंने इंटीरियर डेकोरेशन का अपना बचा हुआ काम पूरा किया और एक नौकरी के लिए आवेदन पत्र भेज दिया। अब मुझे इतनी भाग-दौड़ वाले काम में कोई रुचि नहीं रह गयी थी। इस काम में अपने लिए समय निकालना बहुत कठिन था, पहले महेश भी घर देख लेता था, अब मुझे अकेले ही सब कुछ सँभालना था।लेकिन मैं टूटी नहीं, नयी नौकरी में ख़ुद को व्यस्त कर लिया। कहते हुए सलोनी ने पुनः एक गहरी श्वास ली और इस बार एक मुस्कान के साथ कहा - 

“जब स्कूल में थी तभी से मुझे खेलों में भाग लेने का शौक़ था, मैंने फिर से जिम जॉइन कर लिया। शरीर को स्वस्थ बनाना था और मन को बलवान। मैंने शहर में होने वाली मैराथन दौड़ों में भाग लेना शुरू कर दिया। ‘स्वस्थ शरीर में ही स्वस्थ मन का निवास होता है’ इस सूत्र को मैंने अपने जीवन का मंत्र बना लिया। 

वाह ! अलका के मुँह से यह शब्द सुनकर सलोनी हँसने लगी। पर तुझे पहाड़ों ने कैसे आकर्षित किया ! उसने पूछा। 

मैराथन के दौरान ही मेरे कुछ मित्र बने जो ट्रैकिंग के लिए आसपास के छोटे पर्वतों पर जाते  रहते थे।दो वर्षों तक इस तरह की छोटी-छोटी चढ़ाई करके मैं हिमालय पर चढ़ने के लिए ट्रेनिंग लेने गई। उन्हीं दिनों एक और स्वप्न भी मेरे  भीतर करवटें लेने लगा, एवरेस्ट के बेस कैंप तक चढ़ाई का स्वप्न! 

अलका ने आश्चर्य से कहा, इसमें तो बहुत ख़तरा है न, क्या तुझे डर नहीं लगता था ?

सलोनी ने इसके उत्तर में जो कहा, शायद अलका को उसकी उम्मीद नहीं थी। उसने कहा, “जीवन ने जो झटका मुझे दिया है उसके बाद कोई भी बात मेरे लिए किसी डर या दुख का कारण नहीं बन सकती। पर मेरे इस सपने को पूरा होने से पहले और भी कुछ झेलना शेष था।” 

ऐसा क्या हो गया ? क्या तुझे स्वीकृति नहीं मिली? अलका ने पूछा तो सलोनी का हाथ अपने पेट पर चला गया। चढ़ाई पर जाने से एक महीना पहले अचानक मेरे पेट में भयानक दर्द हुआ। फ़ौरन अस्पताल जाना पड़ा, पता चला किडनी में एक बड़ी सी पथरी  है। शीघ्र आपरेशन करना पड़ेगा, एक हफ़्ता इसी में निकल गया पर  इस कारण मैंने अपना अभियान रोका नहीं। मैं मानसिक दर्द से पार पा चुकी थी, यह शारीरिक दर्द मुझे कैसे रोक सकता था। माँ-पिता जी मुझसे मिलने आये, कुछ दिन मेरे साथ रहे। मेरे दफ़्तर में भी सब इस अभियान के बारे में जानते थे, मुझे शुभकामनाएँ देकर विदा किया।सफलता पूर्वक यह अभियान समाप्त कर जब मैं वापस आयी तो माँ-पिताजी घर पर मेरी प्रतीक्षा करते हुए मिले। उस दिन मैंने उनकी आँखों में ख़ुशी और  संतुष्टि का एक अनोखा भाव देखा। वह अपनी पुत्री की इस कामयाबी पर जैसे ख़ुद को बधाई देना चाहते थे। 

अलका ने ख़ुशी से सलोनी का हाथ थाम लिया, “वाक़ई इतने बड़े दुख के बाद ख़ुशी के ये पल उनके लिए बहुत अनमोल रहे होंगे। अब तो वे लोग तेरी तरफ़ से पूरी तरह निश्चिंत हो गये होंगे।”

काश ! ऐसा हो पाता, माँ का दिल कैसा होता है, क्या तुझे नहीं पता, उन्हें अब भी मेरे भविष्य की चिंता लगी रहती है। किसी तरह मेरा घर फिर से बस जाये इसकी मन्नत माँगती हैं । सलोनी ने कुछ हँसते हुए कहा।

हाँ, यह तो स्वाभाविक है, वे लोग सोचते होंगे, तेरे सामने सारा जीवन पड़ा है, अलका ने धीरे से कहा, फिर तुमने क्या कहा?

मैं हँसकर उनकी बातों को टालती रही पर एक दिन माँ ने सुबह उठते ही कहा, रात को सपने में उन्होंने सलोनी को विवाह मंडप में देखा है, क्यों नहीं वह दूसरे विवाह के लिए प्रयत्न करती। बार-बार माँ के तक़ाज़ों को सुनकर मैंने एक बार विवाह की एक वेबसाइट पर अपना बायोडाटा व चित्र अपलोड कर दिया। एक बार एक लड़के की तरफ़ से जवाब आया, बात कुछ आगे बढ़ी। 

अलका ने उत्सुकता से उसकी ओर देखा, अच्छा ! फिर क्या हुआ ? 

बताती हूँ, थोड़ा सा सब्र कर, सलोनी की हँसी फूटने को थी। 

लड़का मुझे एक होटल में मिलने आने वाला था।हम एक दूसरे की तस्वीरें देख चुके थे और सामान्य जानकारी भी फ़ोन पर ले चुके थे। मैं दफ़्तर से आकर तैयार हुई और नियत समय पर होटल पहुँची। कुछ देर बाद वह आया, सामान्य शिष्टाचार के बाद अचानक उस लड़के ने अपना फ़ोन उठाया, उसमें कुछ देखा, फिर कहा, मैं अभी एक मिनट में आता हूँ, इसके बाद वह लौट कर आया ही नहीं। मैंने किसी तरह आधा घंटा प्रतीक्षा की फिर घर लौट आयी। उस दिन तो मुझे बहुत बुरा लगा था पर बाद में जब उसका संदेश मिला, जिसमें लिखा था, फ़ोटो में जिसे देखा था, वह कोई दूसरी ही लड़की थी। तब मैं ठहाका मारकर हँस पड़ी। जो लड़का इस तरह होटल से बिना कुछ कहे भाग सकता है, वह जीवन में उसका साथ कैसे निभाएगा। 

यह सुनकर अलका का मुख आश्चर्य से खुला का खुला रहा गया।

‘जो हुआ, अच्छा हुआ’ कहकर मैंने माँ को सारी बात बतायी और कहा, अब आप मेरे  विवाह की चिंता न करें। सलोनी ने अलका के सामने खड़ी होकर एक प्यारी सी मुस्कान के साथ देखा। आज मैं हर तरह से सबल हूँ, मैंने अपने भीतर के हर भय का सामना किया है।अब कभी किसी भी बाधा से घबराने वाली नहीं हूँ। मेरे जीवन में कई उतार-चढ़ाव आये पर मैं सदा डटकर खड़ी रही और अपने आप से भी ऊपर उठकर उनका सामना किया है।

अलका ने आगे बढ़कर उसे गले से लगा लिया, आज उसे अपनी इस सखी पर गर्व हो रहा था !


शनिवार, जुलाई 18

मन का शावक थिर हो जाता

मन का शावक थिर हो जाता


भर श्रद्धा-विश्वास ह्रदय में 

भीतर कदम बढ़ाना होगा, 

पूर्ण समर्पण उस अनाम में 

प्रेम विशुद्ध जगाना होगा !


वह भी भीतर राह देखता 

बाधाएँ कभी पथ न रोकें, 

जीवन का कोई भी अनुभव 

अंतर की यह प्यास न सोखे ! 


श्वासें ही रस्ता दिखलायें 

जब भी कोई भीतर जाता, 

भीतर की गुंजन को सुनकर 

मन का शावक थिर हो जाता !


हर भ्रम एक द्वार बन जाता 

हर दुविधा आगे ले जाती, 

दुख भी यहाँ सहायक होते 

सुख चाहत ऊर्जा दे जाती !

 

बुधवार, जून 17

मंज़िल और रास्ते

मंज़िल और रास्ते

जिसने जाना, जो भी जाना 

वह कहा नहीं जा सकता 

जो कहा गया है 

वह मार्ग की खबर देता है 

मंज़िल की नहीं 

वहाँ तो ख़ुद ही जाना होता है 

कोई चल सकता है जिस मार्ग पर 

वही सौंपा जाता है 

अस्तित्त्व के द्वारा 

हरेक का मार्ग उसका अपना है 

भाग्य भी उसका साथ देता है 

जो चल पड़ा है 

उसका नहीं 

जो अभी सोच में ही पड़ा है 

या रास्ते पर ही खड़ा है 

औषधि है हर रोग की यहाँ 

इलाज हर किसी का होता है 

भगोड़ा बन गया जो जीवन से 

वह बार-बार उसे खोता है !

 

बुधवार, जून 3

सीधे सच्चे - कुछ दोहे



सीधे सच्चे - कुछ दोहे


जीवन इक पहेली है,  बूझ ले सो ज्ञानी

सपनों सा संसार है, आँख खुलते फानी

 

हवा, धूप, माटी, गगन,  या अनल की मूरत

अंतर में जो झांक ले, दिखती वही सूरत

 

चिंता, लालच, डाह, मोह, मन के ये विकार 

तज कर उस की शरण ले, उतरे सागर पार

 

बीता जो वह कब रहा, भावी से अनजान

जो पल अपने सामने, उसकी कीमत जान

 

यह जग एक सराय है, पक्का नहीं मुकाम

आना-जाना अटल है, रहने का ना काम

 

सूरज, धरती से मिला, रश्मि कर फैलाये

वसुधा कातर प्रेम से, अश्रु ओस बहाए 


शनिवार, अप्रैल 25

नई मंजिलें राह देखतीं

नई मंजिलें राह देखतीं

 

जाने कहाँ-कहाँ से आते 

मन दिन-रात गुना करता है,

कई विचारों के गालीचे

यह दिन-रात बुना करता है !

 

सोये-सोये जन्मों बीते ,

 अब तो जगे भाग्य जो खोया, 

वही मिलेगा इस जीवन में 

जो कुछ कल हमने था बोया!

 

रंग भरें सुकल्पनाओं में, 

जीवन का पथ सुंदर होगा

नित्य नया निखार आयेगा, 

पहले से सुंदर कल होगा !

 

ऋतु आने पर बीज पनपते 

भीतर कोई चेता देता,

शुभ संकल्प बीज के सम ही 

सही समय पर ही फल देता!

 

नई मंजिलें राह देखतीं, 

रस्ते कुछ नव बुला रहे हैं

कर्म सदा हों सबके हित में, 

गीत यही तो सुना रहे हैं!


गुरुवार, फ़रवरी 12

जीवन

जीवन 


जीवन एक मधुर सुवास सा 

चारों ओर बिखरा है 

मानव ने खोज ली हैं 

हजार तरकीबें उससे बचने की 

वह सरल है, सहज प्राप्य है 

आदमी जटिल बन गया है 

एवरेस्ट पर चढ़ना चाहता है 

पड़ोसी के घर का रास्ता उससे तय नहीं होता 

जहां सुंदर फूल खिलाए हैं जीवन ने 

वह बम बनाकर क्या सिद्ध करना चाहता है 

जीवन बिखरा है 

प्रकृति का हास बनकर

आदमी ने बंद कर लिए हैं अपने कान 

या भर लिए हैं मशीनों की आवाज़ों से 

अथवा तेज फूहड़ संगीत से 

वह होश खोना चाहता है 

जबकि परम होश ही परम आनंद है 

जीवन बिखरा है उजास बनकर  !