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शुक्रवार, नवंबर 22

प्रेम

प्रेम 


याद 

हवा की तरह आती है 

और छू कर चली जाती है 

किसी झील की शांत सतह पर 

उड़ते हुए पंछी के पंखों में 

क्योंकि अंततः सब एक है 

प्रेम बरसता है छंद बनकर 

किसी कवि की कविता से 

या चाँदनी बनकर सुनहरे चाँद से 

नहीं होता उस पर किसी का एकाधिकार 

वह तो सबके लिए है 

नदियों, सागरों, मरुथलों 

और बियाबानों तक के लिए 

जिनसे मिलने जाते हैं 

युगों से यात्री 

सितारों के बताये रास्तों से गुजर 

ऐसा प्रेम 

जिसका कोई नाम नहीं है 

वही बच रहता है 

संगीत बनकर 

हर दिल की धड़कन में ! 






बुधवार, नवंबर 13

ऋण

ऋण 


पिता आकाश है, माँ धरा 

जो अपने अंश से 

पोषण करती है संतान का 

पिता सूरज है, माँ चंद्रमा 

जो शीतल किरणों से 

हर दर्द पर लेप लगाता है 

पिता पवन है, माँ अग्नि 

जो नेह की उष्मा से 

जीवन में रंग भरती है 

पिता सागर है, माँ नदिया 

जो मीठे जल से प्यास बुझाती है 

पिता है, तो माँ है 

आकाश के बिना धरा कहाँ होगी 

अंततः सूरज से ही उपजा है चाँद 

वाष्पित सागर ही नदी है 

दोनों पूरक हैं इकदूजे के 

और इस तरह हर कोई 

ऋणी है माँ-पिता का ! 


बुधवार, नवंबर 29

पथ दिखाता चाँद नभ में

पथ दिखाता चाँद नभ में 


एक ज़रिया है कलम यह

हाथ भी थामे इसे जो, 

कौन जो लिखवा रहा है 

लिख रहा जो कौन है वो !


भाव बनकर जो उमड़ता 

बादलों सा कभी उर में, 

लहलहाती है फसल फिर 

अक्षरों की तब मनस में !

 

कभी सूखा मरुथलों सा 

ज्यों शब्द भी गुम हो गये,

हाथ में अपने कहाँ कुछ 

थाम ली  जब डोर  उसने !


चाह फिर क्योंकर जगायें 

हो रहा जो वही शुभ है, 

पथ दिखाता चाँद नभ में 

सूर्य  उतरा धरा पर है !


बुधवार, मई 17

किताब ज़िंदगी की

किताब ज़िंदगी की 


मुस्कुराओ कि अभी ज़िंदा हो 

आख़िर किस बात पर शर्मिंदा हो 

हाथ थामा है जब उसने 

आगे बढ़कर, 

परवाज़ लगाओ

 मानो कोई परिंदा हो 

रूह तो क़ैद नहीं, उसकी सुनो 

अमन औ” चैन के नये ख़्वाब बुनो !

ज़िंदगी किताब कोरी सी 

हर रात हो जाती,  

हर सुबह नया इक नाम चुनो !

ओढ़ रखा है क्यों मायूसी का

 लबादा सिर पर 

जब डोर बांधी है जन्नतों से दिल की 

कोई सागर पास ही उफनता है 

नाच सकते हो जिसकी लहरों पर 

चाँद छूने का बस इक इरादा ही काफ़ी  

दिल की गहराइयों से जो निकला हो 

श्वासें न खर्च हों समेटते उदासियों को

जबकि हाथ कोई प्यार से सिर पर रखे  ! 


सोमवार, अप्रैल 18

चाँद बनकर

 चाँद बनकर 

मैंने चाँद बनकर धरा को देखा 

लहू से सराबोर 

लोगों को झूमते गाते देखा 

संग बहते हुए हवाओं के 

इक बूँद श्वास के लिए तरसते देखा 

अनंत रिक्तता में छा गया था वजूद मेरा 

चंद चीजों के लिए बिलखते देखा 

वह जो उड़ सकता था पल में  

जमीं से फलक तक 

धीमे-धीमे से उसे सरकते देखा 

मैं ही मालिक था चाँद तारों का 

चंद सिक्कों के लिए झगड़ते देखा 

जला सूरज सा कोई दिन-रात सदा 

भय से अंधेरों में किसी को सिसकते देखा !


सोमवार, नवंबर 9

अस्तित्व


अस्तित्व

 


बदलियों में छुप गया

फिर आकाश में चाँद

जैसे छिप जाता है कोई

बच्चा खेल-खेल में

परदे के पीछे !

 

दूर वृक्ष की डाली पर

नीला एक फूल खिला

जैसे मुस्काया हो अस्तित्व

अपनी सृष्टि को निहार !

 

रात भर गूँजता है

संगीत झींगुरों का

अनथक वे गाते हैं

अचानक थम गया उनका गान

एक तेज आवाज से काँपी धरा !

 

शायद कहीं कोई विस्फोट हुआ

मानव की लालसा का

टूटा पुन: कोई पहाड़

समतल जमीन पाने हेतु !

 

आनंद सहज ही बरसता हो जहाँ

वहाँ आयोजन करने पड़ते हैं

लोगों को हँसाने के

यह विडंबना नहीं तो और क्या है ?  

बुधवार, जुलाई 22

भोर

भोर 

बजती हैं चाइम की मधुर घण्टियाँ
प्रातःसमीरण में झूमकर 
पारिजात के फूलों को 
छूकर बहती चली आती है जब वह ! 
लिए आती है संदेश उदित होते नव प्रभात का 
पंछियों के स्वर गान का 
जो अब बस खोलने ही वाले अपने नेत्र 
भोर में प्रकृति कितनी पावन लगती है 
गगन पर बदलियों के पीछे झाँक रहा है 
अभी भी पूनो का चाँद 
पर नजर नहीं आते तारागण 
वह पूनम का चाँद ही तो है खिला-खिला   
वही अपना है जंगल में जैसे 
कोई बिछड़ा मीत मिला 
जानना नहीं है उसे 
अज्ञेय है वह 
पाना भी नहीं है 
कभी खोया ही नहीं वह 
जागना है 
, भूल गया है जो मन उसे याद भर दिलाना है 
अस्तव्यस्तता छायी है जो जीवन में 
उसे सँवारना है 
मिलता है वह भोर और संध्या काल में  

बुधवार, जुलाई 1

सूरज और चाँद

सूरज और चाँद 

‘वह’ सूरज है... 
भरी दोपहरी का 
 तपता  सूरज !
हमें चाँद की शीतल उजास ही सुहाती है  
 मुख फेर लेते हैं हम
उजाले से 
या हमारी आँखें मुंद जाती हैं !

तज प्रखर ज्योति  
 तज विस्तीर्ण गगन  
घूमता रहता मन अपनी ही गलियों में
मद्धिम ज्योत्स्ना 
ही मन को लुभाती है !

वहाँ कोई दूसरा नहीं 
यहाँ पूरा जगत है, 
वहाँ निस्तब्धता है 
यहाँ कोलाहल है !

कोई-कोई ही ‘उसका’
चाहने वाला 
मन का तो हर कोई रखवाला 
‘उसकी’ ही रौशनी प्रतिबिंबित करता  
फिर भी ‘उसके’ निकट जाने से डरता  
सूरज के उगते ही छिप जाता चाँद 
खो जाते  तारिकाओं के समूह 
वह एकक्षत्र स्वामी है नभ का 
नींद में छिप जाता है लेकिन 
 मन स्वप्न तो बुनता ही रहता  
‘उसका’ बल वहाँ नहीं चलता ! 



शुक्रवार, नवंबर 29

निशदिन बँटता जाता है वह



निशदिन बँटता जाता है वह



चाँद, सितारे, सूरज मांगे
वही बने हकदार ज्योति के,
काली रातें आँसू चाहे
कैसे  बिछें उजाले पथ में !

निशदिन बँटता जाता है वह
खुद ही तो जड़-चेतन होकर,
अनगिन बार मिला है सब कुछ
फिर-फिर द्वार खड़े सब खोकर !

कितनी बार ख़ुशी छलकी थी
अंतर प्रेम जगाया  सुंदर,
कितने मीत बनाए जग में
कितने गीत रचे थे मनहर !

जितना पाया वह क्या कम था
तुष्टि पुष्प खिला नहीं अब तक,
हो कृतज्ञ कहाँ छलके अश्रु
फिर भी देते जाता है रब !

जो भी जिसने माँगा जग में
अकसर वही वही पाया है,
जितना बड़ा किसीका दामन
उतना उसी में समाया है !


बुधवार, जून 10

आषाढ़ की एक रात



आषाढ़ की एक रात


बरस बरस दिन भर
पल भर विश्राम लेते बादल
ठिठक गये हैं अम्बर पर
अँधियारा छाया है नीचे ऊपर
बेचैन होंगे चाँद, तारे भी
झांक लें धरा
गा रहे जो गीत झींगुर, सुनने
उसे जरा
युगलबंदी मेढकों की
जुगनुओं की सुप्रभा
रातरानी की महक
जो उड़ रही है हर कहीं
रात अंधियारी लुभाती
नम हुई हर श्वास भी !

मंगलवार, मई 27

रास रचाएं संग वनमाली

रास रचाएं संग वनमाली



चलो झटक दें हर वह पीड़ा
जो उससे मिलने में बाधक,
सभी कामना अर्पण कर दें
बन जाएँ अर्जुन से साधक !

चलो उगा दें चाँद प्रीत का
उससे ही करें प्रतिस्पर्धा,
या फिर अंजुरी भर-भर दें दें
भीतर उमग रही जो श्रद्धा !

चलो गिरा दें सभी आवरण
गोपी से हो जाएँ खाली,
उर के भेद सब ही खोल दें
रास रचाएं संग वनमाली !

शुक्रवार, मार्च 29

शाम अब ढलने लगी है



शाम अब ढलने लगी है


आसमां से चाँद झांके
इक चमकती गेंद जैसे रोशनी की
नील अम्बर पर खिला हो
पीतवर्णी पुष्प कोई...
गुलमोहर की पत्तियों से
देखता है खिलखिलाकर
तक रही है इस धरा से
इक कमिलिनी मुस्कुरा कर !
मौन में संवाद घटता
प्रकृति से उल्लास झरता
शाम अब ढलने लगी है
पंछियों का झुण्ड लौटे
कूजते अंतिम स्वरों को
रात्रि की गरिमा लपेटे
तिमिर बढता जा रहा है
कालिमा के पंख खोले  
नीड़ में विश्राम पाकर
फिर जगेंगे कल सुबह वे
सिमट अपने शावकों संग
आँख मूंदे सो गए जो
चहचहाते गीत गाते
दिवस भर जो उड़ रहे थे !

मंगलवार, मार्च 5

मन बहता हुआ इक धारा था जब


मन बहता हुआ इक धारा था जब


डोलने लगे थे पात पीपल के
जरा नजर भर के निहारा था जब,
तरल हो गया था आलम सारा
निःशब्द होकर उसे पुकारा था जब !

है भी जो, नहीं भी, नजर आया था
दूर सागर का किनारा था जब,
झील का चाँद किसी की खबर लाया
पार उतरने को शिकारा था जब !

मिलीं ढेर नसीहतें, संग उसके
दिल को बस यही न गवारा था जब,
बहा ले गया गम, खुशियाँ सारी
मन बहता हुआ इक धारा था जब ! 

गुरुवार, अगस्त 30

चंदा ज्यों गागर से ढलका



चंदा ज्यों गागर से ढलका

खाली है मन बिल्कुल खाली
एक हाथ से बजती ताली,
चेहरा जन्म पूर्व का जैसे
झलक मृत्यु बाद की जैसे !

ठहरा है मन बिल्कुल ठहरा
मीलों तक ज्यों फैला सेहरा,
हवा भी डरती हो बहने से
श्वासों पर लगा है पहरा !

हल्का है मन बिल्कुल हल्का
नीलगगन ज्यों उसमें झलका,
जो दिखता है किन्तु नहीं है
चंदा ज्यों गागर से ढलका !

है अबूझ सब जान रहा है
कहना मुश्किल, मान रहा है,
पार हुआ जो जिजीविषा से
खेल मृत्यु से ठान रहा है !