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मंगलवार, मई 19

नींदें हैं सदियों की



नींदें हैं सदियों की

छोटे से जीवन में
भरना है आकाश,
नन्ही सी बगिया में
पलना है पलाश !

कुछ ही तो पल होंगे
जीवन मुस्काएगा,
पलकों में पल भर ही
सपना भर पायेगा !

नींदें हैं सदियों की
क्षण भर में टूटेंगी,
मंजिल को पाने की
हसरत भी छूटेगी !


बुधवार, मई 25

संध्या राग


संध्या राग

मसूर की दाल के से
गुलाबी बार्डर वाले
 सुरमई बादल
मानो संध्या ने पहनी हो नई साड़ी
 कुहू-कुहू की तान गुंजाती ध्वनि  
और यह मंद पवन
जाने किस-किस बगिया के
फूलों की गंध लिये
आती है,
ऐसे में लिखी गयी यह पाती
किसके नाम है
क्या तुम नहीं जानते ?
तुम जो भर जाते हो अन्जानी सी पुलक
शिराओं में सिहरन और उर में एक कसक
विरह और मिलन एक साथ घटित होते हैं जैसे
आकाश में एक ओर ढलता है सूरज
तो दूसरी ओर उगता है चाँद !
हरीतिमा में झांकता है तुम्हारा ही अक्स
हे ईश्वर !या तो तुम हो.. या तुम्हारी याद.....

अनिता निहालानी
२५ मई २०११