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रविवार, नवंबर 1

फार्म हाउस में एक दिन

फार्म हाउस में एक दिन

भोर पूर्व आरंभ हुई थी, एक यात्रा सृष्टि फ़ार्म की 

उडुपी ग्रैंड में किया नाश्ता, शिवगंगे की ओर दृष्टि थी 


चट्टानों में गुँथी हुई थी, जहाँ पुरातन गाथा महान 

चढ़ना कठिन, सहज उतरना, रह नहीं गया था समय का भान 


गुफा में इक मंदिर प्राचीन, पुण्यवान जहाँ छूते जल  

नंदी की विशाल मूरत थी, देखा वानरों को चंचल


अगली मंज़िल सृष्टि फ़ार्म, दोपहर होते-होते पहुँचे

   श्वेत और भूरे कई श्वान, बिछड़े हुए, स्वागत में कूदे 

 

खरगोश, कबूतर, टर्की का, ज्यों एक छोटा सा परिवार 

 रंगबिरंगे मुर्ग़े, बत्तख़ें,  करते दिन भर वहाँ विहार 

 

नीला घर था बाँह पसारे, बैठक खुली-खुली सी सुंदर

  चारों ओर बने थे कमरे, भरा-पूरा था रसोईघर 

 

ड्रैगन फ़्रूट, आम, चीकू थे, नींबू, सहजन और नारियल 

 कटहल और अमरूद के पेड़, दिये कुदरत ने ढेरों फल 


 बगिया में दोपहर बिता, संध्या घाटी सुब्रह्मण्यम में 

 नाग की स्वयंभू मूर्ति, नरसिंह भगवान की भी संग में 


  हो भक्तों को पावन दर्शन, है एक दर्पण गर्भगृह में

रात्रि भोजन भी विशेष था, मिलजुल कर बनाया था सबने 


जल्दी उठकर सुबह, चले फिर,  किया पड़ाव एमटीआर में

पुलकित ह्रदय लिए लौटे,  मधुर यादों को दिल में समेटे !


मंगलवार, मई 19

नींदें हैं सदियों की



नींदें हैं सदियों की

छोटे से जीवन में
भरना है आकाश,
नन्ही सी बगिया में
पलना है पलाश !

कुछ ही तो पल होंगे
जीवन मुस्काएगा,
पलकों में पल भर ही
सपना भर पायेगा !

नींदें हैं सदियों की
क्षण भर में टूटेंगी,
मंजिल को पाने की
हसरत भी छूटेगी !


बुधवार, मई 25

संध्या राग


संध्या राग

मसूर की दाल के से
गुलाबी बार्डर वाले
 सुरमई बादल
मानो संध्या ने पहनी हो नई साड़ी
 कुहू-कुहू की तान गुंजाती ध्वनि  
और यह मंद पवन
जाने किस-किस बगिया के
फूलों की गंध लिये
आती है,
ऐसे में लिखी गयी यह पाती
किसके नाम है
क्या तुम नहीं जानते ?
तुम जो भर जाते हो अन्जानी सी पुलक
शिराओं में सिहरन और उर में एक कसक
विरह और मिलन एक साथ घटित होते हैं जैसे
आकाश में एक ओर ढलता है सूरज
तो दूसरी ओर उगता है चाँद !
हरीतिमा में झांकता है तुम्हारा ही अक्स
हे ईश्वर !या तो तुम हो.. या तुम्हारी याद.....

अनिता निहालानी
२५ मई २०११