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मंगलवार, अगस्त 18

जन-जन का मन भी प्रज्ज्वल हो

जन-जन का मन भी प्रज्ज्वल हो


नीले नभ में देख तिरंगा  

हर भारतवासी को गर्व है, 

वीरों के बलिदानों से ही 

आया आज़ादी का पर्व है !


भारत की मिट्टी चंदन, भरा

 ऋषियों के तप से कण-कण है, 

 सींचा श्रम की धाराओं से,

 श्रमिकों का भी हम पर ऋण है !


भारत का हर युवा व बालक

 सत्य और सेवा का पथ पर,

देशप्रेम अंतर में भर ले 

जाति, धर्म के भेद भुलाकर !


नदियाँ निर्मल, बढ़े वन भूमि

हर भारतीय शिक्षा पाये, 

सदा बढ़े नारी का गौरव

भारत जग को राह दिखाये !


केवल उत्सव नहीं यह दिवस

 ज़िम्मेदारी याद दिलाता, 

तज प्रमाद कर्त्तव्य निभाये 

वही देश का मान बढ़ाता ! 


मिलकर यह संकल्प करें हम 

 भारत का भविष्य उज्ज्वल हो,

 शान तिरंगे की नित ऊँची 

जन-जन का मन भी प्रज्ज्वल हो !

 

शुक्रवार, अक्टूबर 4

नारी भारत की


नवरात्रि के पावन अवसर पर नारी शक्ति को समर्पित


नारी भारत की

आँखों में निज ऊर्जा की पहचान लिए 

आगे बढ़ते जाने का अरमान लिए, 

अधरों पर नवल विजय की मुस्कान लिए 

नारी भारत की आशा की ख़ान लिए !


रोक सके ना कोई बाधा अब इसको 

वह सबला है जग कहता अबला जिसको, 

नहीं चाहिए अब गहनों का कारावास 

उसे चाहिए खुली धरा खुला आकाश !


न सुंदर वस्त्र न ही लुभाते राजमहल 

उतर पड़ी है करने हर कठिनाई हल, 

वह ख़ुद की ताक़त को पहचान चुकी है 

इस दुनिया की लघुता को जान चुकी है !


जो अब तक बस नीर बहाती है आयी 

बेवजह अपनी अस्मिता गँवाती आयी, 

जिसने सपनों को सदा बिलखते देखा 

वह अब उनको साकार बनाने आयी !


नहीं रुकेंगे इन कदमों को बढ़ने दो 

जग महकेगा, हाथों से  संवरने दो, 

उसे मान दो, उसे चाह सिर्फ़ स्नेह की 

हक़ है उसका समानता का अधिकार दो !





गुरुवार, मार्च 4

आने वाला है महिला दिवस

आने वाला है महिला दिवस 


मात्र नारी शक्ति का प्रतीक नहीं है 

बल्कि  याद दिलाता है यह दिवस कि 

अभी भी हो रहे हैं उनपर अत्याचार 

इक्कसवीं सदी में भी हो रहा है आए दिन ही 

उनके साथ दुर्व्यवहार 

अखबार के पन्नों पर तो कुछ ही खबरें आ पाती हैं 

मगर उन खबरों की हकीकत भीतर तक डरा जाती है 

महिलायें क्या-क्या कर रही  हैं 

यह तो जग जाहिर है 

मात्र उसे न दोहराएं 

बल्कि एक वंचित नारी के अधिकारों को याद कराएं !

आज के दिन प्रशंसा सुनकर अपनी 

स्वयं की पीठ न थपथपायें 

जो महिलायें अभी भी कुचली जाती हैं 

उनके दर्द को भी बाहर लाएं !

महिला दिवस कोई उपलब्धि नहीं है नारी के लिए 

एक चुनौती है 

नन्ही बच्चियों से लेकर बुजुर्ग माताएं तक 

होती हैं जहाँ  हिंसा व अपमान का शिकार 

हर उस बात को बाहर लाना है 

समाज को आईना दिखाना है !

जायदाद में अधिकार से वंचित रखा गया 

सदियों तक महिलाओं को 

नहीं था वोट देने का अधिकार 

न ही शिक्षा का 

 योगदान का जिक्र कहाँ होता है उस अनाम स्त्री  के

जो हर बार मिलती रही है एक सफल पुरुष के पीछे 

इस महिला दिवस पर यही मनाएं कि  

हर वर्ग की स्त्री समानता का अधिकार पाए !


सोमवार, सितंबर 7

अमर स्पर्श -3

अंतिम भाग

अमर स्पर्श

नारी के प्रति पन्त जी के हृदय में अत्यधिक सम्मान है. वह कहते हैं स्त्री का हृदय तिजोरी में बन्द है. उसपर समाज की बहुत बन्दिशें हैं. स्त्री का सबसे सुंदर हिस्सा उसकी भावना है. उसकी भावना का फूल अभी तक धरती पर खिल नहीं पाया है. वह उस समय की कल्पना करते हैं जब स्त्री स्वतन्त्र होकर धरती पर विचरण कर सकेगी, उसे कोई भय नहीं होगा.


'मुक्त करो नारी को मानव, 

चिर वन्दिनी नारी को। 

युग-युग की निर्मम कारा से, 

जननी सखि प्यारी को।'


श्री अरविन्द जी की पुस्तक ’भागवत जीवन’’ से वे इतने प्रभावित हुए कि उनके जीवन की दिशा ही बदल गई पन्त जी कहते हैं कि ’’इसमें सन्देह नहीं कि अरविन्द के दिव्य जीवन दर्शन से मैं अत्यन्त प्रभावित हूँ। श्री अरविन्द आश्रम के योगयुक्त अन्तःसंगठित वातावरण के प्रभाव से उर्ध्व  मान्यताओं सम्बन्धी मेरी अनेक शंकाएँ दूर हुई है।’’  इस युग की रचनाओं में पन्त जी ने मानव को उर्ध्वचेतन बनने की प्रेरणा दी है। पन्त जी आन्तरिक व मानसिक समता को अत्यन्त आवश्यक मानते है। इस काल की कविताओं में कवि ने चेतना को सर्वोपरि माना है। कवि ने ब्रह्म जीव और जगत तीनों को एक ही चेतना का रूप स्वीकार किया है। वह जड़ और चेतन में कोई भेद नहीं मानता।


वही तिरोहित जड़ में जो चेतन में विकसित।

वही फूल मधु सुरभि वही मधुलिह चिर गुंजित।।


पन्त कहते हैं, विज्ञान ने जड़ जगत की हर बाधा को मिटा दिया है. देश-विदेश एक दूसरे के निकट आ रहे हैं. किन्तु विज्ञान मनुष्य के भीतर का अंधकार नहीं मिटा सकता. वह सभ्य बना सकता है पर सुसंस्कृत नहीं बना सकता. इसके लिए तो भारत के प्राचीन दर्शन में निहित मूल्यों को ही ग्रहण करना होगा. इसलिए भौतिकता और अध्यात्म का समन्वय होना चाहिए. भगवान को यदि देखना है तो इसी जीवन में देखना होगा. आज विज्ञान और अध्यात्म को मिलकर काम करना है. वह मार्क्स से भी प्रभावित हुए, गाँधी जी से से भी, जिन्होंने भारतीय दर्शन को कर्मभूमि में उतार दिया. 


किन तत्वों से गढ़ जाओगे तुम भावी मानव को ?

किस प्रकाश से भर जाओगे इस समरोन्मुख भव को ?

सत्य अहिंसा से आलोकित होगा मानव का मन ?

अमर प्रेम का मधुर स्वर्ग बन जाएगा जग जीवन ?

आत्मा की महिमा से मंडित होगी नव मानवता ?

प्रेम शक्ति से चिर निरस्त हो जाएगी पाशवता ?


पन्त जी चाहते थे संसार से विषमता मिट जाये धरती फिर मानव के रहने योग्य बन जाये, ज्यादा मानवीय हो जाये. धरा पर स्वर्ग आये, स्वर्ग मानव के भीतर ही है, उसे बाहर उतारना है. यह युग परिवर्तन का युग है, जैसे बसन्त से पहले पतझड़ आता है, वैसे ही आज पुराने मूल्य विघटित हो रहे हैं, एक नवीन युग आ रहा है. उनकी कविता ‘आओ, हम अपना मन टोवें’  कविता में कवि मानव को मन की निर्धनता से मुक्त होने की बात कहता है, स्वार्थ रहित मन ही अपने व औरों के जीवन को सुंदर बना सकता है. 


आओ, अपने मन को टोवें!

व्यर्थ देह के सँग मन की भी

निर्धनता का बोझ न ढोवें।


जाति पाँतियों में बहु बट कर 

सामाजिक जीवन संकट वर,

स्वार्थ लिप्त रह, सर्व श्रेय के

पथ में हम मत काँटे बोवें!


अंत में कवि की अनुपम कृति कला और बूढा चाँद में प्रकाशित इस अनुपम रचना का आनंद लें, जिसमें प्रेम की इतनी सजीव परिभाषा दी गयी है. 

प्रेम

मैंने

गुलाब की

मौन शोभा को देखा ।


उससे विनती की

तुम अपनी

अनिमेष सुषमा की

शुभ्र गहराइयों का रहस्य

मेरे मन की आँखों में

खोलो ।


मैं अवाकू रह गया ।

वह सजीव प्रेम था ।


मैंने सूँघा,

वह उन्मुक्त प्रेम था ।

मेरा ह्रदय

असीम माधुर्य से भर गया ।


मैंने

गुलाब को

आठों से लगाया ।

उसका सौकुमार्य

शुभ्र अशरीरी प्रेम था ।


शुक्रवार, दिसंबर 21

जहाँ नारी का अपमान होता है....



जहाँ नारी का होता है अपमान

जैसे क्रूस पर चढ़ा हो कोई मसीहा
औरों के लिए..
माथे पर काँटों का मुकुट धारे
जिससे टपकती हो रक्त की धारा
हाथों-पैरों में चुभोये गए नश्तर...

व्यर्थ नहीं जायेगा उसका बलिदान भी
जूझ रही जो अस्पताल के कमरे में
बचायेगी हजारों मासूमों को
 उसकी यह पीड़ा
बहरों के कानों के लिए बनी बम
सोते हुओं को जगाने के लिए
काली की चीत्कार...
मांगती है इंसाफ
उसके लहू की हर बूंद
न सिर्फ खुद पर हुए जो अनाचार  
वरन हर वह पुकार  
जो घुट कर रह गयी होगी
दरिंदों के सामने..

बस अब और नहीं..
वह बनी है मिसाल
सहकर जख्म जिस्मोरूह पर..
चढ़ी है सूली पर
 ताकि चैन से जी सकें
भारत की नारियां...
वरना कहता ही रहेगा 
हर नारी का आत्म सम्मान
नहीं आना उस देश में
जहाँ नारी का होता है अपमान...






गुरुवार, जून 23

मेरे सपनों का भारत


मेरे सपनों का भारत

जो देश गुलाम बना था तब
अब जाग गया है, हुंकारे,
कोई लूट नहीं पायेगा
जन-जन देखो यही पुकारे !

जो गुजर गया फिर ना होगा
अब नई इबारत लिखनी है,
इस भारत की तस्वीर नयी
जग के नक्शे में भरनी है !

आदर्शों की ध्वजा, पताका
अब पुनः यहाँ लहराएगी,
सत्य, अहिंसा और प्रेम के
जनता गीत नए गायेगी !

भूखा ना कोई सोयेगा
हो निर्भय नारी निकलेगी,
शोषण, पीड़न अब न होगा
हर बच्ची कलिका सी खिलेगी !

भयमुक्त हो जन विचरेंगे
अपनेपन की प्रबल कामना,
डंडे का कोई काम न होगा
जब फैलेगी सद् भावना !

थाने भी निरापद होंगे
संसद में न धींगामुश्ती,
बाहुबली बस रंगमंच पर
केवल मैदानों में कुश्ती !

वेदों की ऋचाएँ फिर से
अधरों पर शोभित होंगी,
अपनी भाषा, अपनी बोली
जग में गौरवान्वित होगी !

ऐसा होगा देश हमारा
स्वप्न सभी भारतीयों का,
पूर्ण करेंगे मिलजुल कर हम
नव जोश जगा है हम सब का !

अनिता निहालानी
२३ जून २०११  



बुधवार, जून 22

तीन मुक्तक


तीन मुक्तक

सागर और लहरें
लहरों को सबने देखा है
सागर दिखता किसी एक को,
पार गया जो इन लहरों से  
सागर मिलता उसी नेक को !

खुद
बोझ उठाये है यह धरती
फिर भी तन है बोझ से हारा
मनन करे मन, बूझे बुद्धि
खुद को जाने किसने मारा ?

नारी
शक्ति की आकर जो धारे, सदा बहाए स्नेहिल धारे
शुभ ही झरता जिसके मन से, नारी जग को सदा संवारे,
नन्हीं थी तब स्मित फैलाया, हुई युवा संसार बसाया
माँ बन कर वह हुई प्रवाहित, स्वयं को एक आधार बनाया !


अनिता निहालानी
२२ जून २०११