असजग हम
हम अपने इन्हीं हाथों से
चुनते हैं दीवारें
और फिर कैद कर लेते हैं खुद को !
खोदते हैं गड्ढे बड़ी मेहनत से
फिर आँख मूंदकर चलते हैं
ताकि हो सकें दफन उनकी गहराइयों में !
स्वयं लगाते हैं काँटों की बाड़
विषैले फलों वाले वृक्ष
ताकि फटें हमारे दामन उनमें उलझ
रुंधे हमारे गले उन्हें खाकर !
हम खुद ही बनाते हैं घर
ऊँचे पहाड़ों पर
भटकते हैं फिर तूफानों में
पनाह पाने तक !
पथरीले पथ गढ़ते हैं
इन्हीं हाथों से
करने लहुलुहान खुद को
होता है यह सब हमसे
क्यों कि बेहोश हैं हम !
अनिता निहालानी
५ जनवरी २०११