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बुधवार, जनवरी 5

असजग हम

असजग हम

हम अपने इन्हीं हाथों से
चुनते हैं दीवारें
और फिर कैद कर लेते हैं खुद को !

खोदते हैं गड्ढे बड़ी मेहनत से
फिर आँख मूंदकर चलते हैं
ताकि हो सकें दफन उनकी गहराइयों में !

स्वयं लगाते हैं काँटों की बाड़
विषैले फलों वाले वृक्ष
ताकि फटें हमारे दामन उनमें उलझ  
रुंधे हमारे गले उन्हें खाकर !

हम खुद ही बनाते हैं घर
ऊँचे पहाड़ों पर
भटकते हैं फिर तूफानों में
पनाह पाने तक !

पथरीले पथ गढ़ते हैं
इन्हीं हाथों से
करने लहुलुहान खुद को

होता है यह सब हमसे
क्यों कि बेहोश हैं हम !

अनिता निहालानी
५ जनवरी २०११