सोमवार, सितंबर 28
मौसम का उल्लास समेटे
बुधवार, जनवरी 10
एक लपट मृदु ताप भरे जो
एक लपट मृदु ताप भरे जो
बैंगनी फूलों की डाल से
फूल झर रहे झर-झर ऐसे,
लहरा कर इक पवन झकोरा
सहलाये ज्यों निज आँचल से !
याद घेर लेती है जिसकी
बनकर अनंत शुभ नील गगन,
कभी गूंजने लगता उर में
अनहद गुंजन आलाप सघन !
एक लपट मृदु ताप भरे जो
हर लेती हृदय का संताप,
सुधियाँ किसी अरूप तत्व की
बनी रहतीं फिर भी अनजान !
सागर-लहर, गगन-मेघा सा
नाता उस असीम से उर का,
कौन समाया किस पल क़िसमें
ज्योति अगन या गंध सुमन में !
शनिवार, अप्रैल 24
वासन्ती प्रभात
वासन्ती प्रभात
जन्म और मृत्यु के मध्य
बाँध लेते हैं हम कुछ बंधन
जो खींचते हैं पुनः इस भू पर
भूमिपुत्र बनकर न जाने कितनी बार बंधे हैं
अब पंच तत्वों के घेरे से बाहर निकलना है
पहले निर्मल जल सा बहाना है मन को
फिर अग्नि में तपना है
होकर पवन के साथ एकाकार
घुल जाना है निरभ्र आकाश में
फिर आकाश से भी परे
उस परम आलोक में जगना है
जहां कभी दिन होता न रात
सदा ही रहता है वासन्ती प्रभात
जहाँ द्रष्टा और दर्शन में भेद नहीं
जहाँ दर्शन और दृश्य में अभेद है
आनंद के उस लोक में
जहां आलोक बसता है
वाणी का उदय होता है
मौन के उस अनंत साम्राज्य में
जहाँ चेतना निःशंक विचरती है
अहर्निश कोई नाम धुन गूँजती है
शायद वही कृष्ण का परम धाम है
जहाँ मन को मिलता विश्राम है !
शुक्रवार, जनवरी 29
बहा करो उन्मुक्त पवन सम
बहा करो उन्मुक्त पवन सम
अनल, अनिल, वसुधा, पानी से
जीवन का संगीत उपजता,
मिले-जुले सब तत्व दे रहे
संसृति को अनुपम समरसता !
हर कलुष मिटाती कर पावन
चलती फिरती आग बनो तुम,
अपनेपन की गर्माहट भर
कोमल ज्योतिर राग बनो तुम !
बहा करो उन्मुक्त पवन सम
सूक्ष्म भाव अनंत के धारे,
सारे जग को मीत बनाओ
शुभ सुवास के बन फौवारे !
ग्रहण करे उर साम्य-विषमता
वसुंधरा सा पोषण देकर,
प्रेम उजास बहे अंतर से
इस जग का सहयोगी बनकर !
नई दृष्टि से जग को देखो
सहज ऊर्जा को बहने दो,
मनस बने अब धार नीर की
कर साकार मधुर स्वप्नों को !
जितना दिया अधिक मिलता है
सुख से जीवन भरपूर करो,
खुले हृदय से ग्रहण करो फिर
हो गुजर स्वयं से दूर करो !
रात-दिवस यह कहने आया
विश्व नागरिक बन जीना है,
अब सीमा आकाश ही बने
जब घर धरती का सीना है !
मंगलवार, जनवरी 12
सब कुछ उसमें वह सबमें है
बुधवार, सितंबर 23
पुलक बना वह ही बह निकले
पुलक बना वह ही बह निकले
घन गरजे, गरजे पवना भी
बीहड़ वन ज्यों अंधड़ चलते,
सिंधु में लहरों के थपेड़े
अंतर्मन में द्वंद्व घुमड़ते !
बहना चाहे हुलस-हुलस कर
कौन रौकता पाहन बनकर ?
हृदय उमगता ठाठें मारे
टकराता पर कहीं रसातल !
कोष एक से एक छिपे हैं
सागर तल व वसुधा गर्भ में,
प्रकटे कैसे, निज हाथों से
आड़ लगायी सदा गर्व में !
पुलक बना वह ही बह निकले
अनजाने सभी तोड़े बंध,
‘मैं’ का कंटक गड़ा पाँव में
पूर्ण कैसे होगा अनुबन्ध !
मंगलवार, अगस्त 25
बैठ हवा के पंखों पर ही
बैठ हवा के पंखों पर ही
सर-सर मर्मर पवन बह रही
ठंड अति कभी ताप सह रही,
शीतलहर में ठिठुराती तन
स्वेद बहे यदि तप्त हो गयी !
कभी धूलि का उठे बवंडर
छूकर आती कभी समुन्दर,
चलती कभी पवन पुरवाई
मंद झँकोरा अति सुखदायी !
हवा जलाती, हवा बुझाती
हवा उड़ाती, हवा सुखाती,
प्राणों का आधार हवा है
जीवन का भी द्वार हवा है !
प्रातः समीरण अति सुखदायी
हौले से सहलाने आती,
बेला, चंपा की सुवास भर
रजनी गंधा को महकाती !
झूम रहे जब खेत बाग वन
दृश्य अति लगते वे मनोहर,
हवा डुलाती हौले-हौले
झूमें लहरें झील, नदी पर !
बासों से हो हवा गुजरती
सांय-सांय का गीत गूँजता,
छम-छम पत्तों का भी नर्तन
संग पवन तृण गगन चूमता !
संग पवन के उड़ते-उड़ते
बीज सुदूर यात्रा करते,
बैठ हवा के पंखों पर ही
यहाँ-वहाँ गिर भू पर उगते !
पंच प्राण प्राणी के भीतर
गतियां सब संचालित करते,
वायु बिना सब स्थिर हो जाये
वायुदेव ही जीवन भरते !
हवा बदलियों को ले जाती
जीवन का आधार बनी है,
कोमल शीतल परस पवन का
महादेव का महाभूत है !
अति सूक्ष्म तत्व प्रवाह रूपी
भूमंडल को घेरे रहती,
जैसे अपने आँचल में ले
शिशु को माँ संभाले रहती !










