पवन लेबलों वाले संदेश दिखाए जा रहे हैं. सभी संदेश दिखाएं
पवन लेबलों वाले संदेश दिखाए जा रहे हैं. सभी संदेश दिखाएं

सोमवार, सितंबर 28

मौसम का उल्लास समेटे

मौसम का उल्लास समेटे

घन घन घन घन मेघ गरजते
टिप टिप टिप टिप झरतीं बूँदें,
पारिजात, कंचन, कनेर मिल
भीग रहे सरसाएं झूमें !

गगन सलेटी, पवन नशीली
भीगी गलियाँ, सड़कें काली,
गर्जन तर्जन सुनकर निकले
दादुर, मोर, कोकिला बाली !

छू जाती शीतल फुहार जब
जैसे मादक सुरभि बिखरी,
सिर पर बोझ उठा अचानक
मजदूरिन इक वहाँ से गुजरी !

श्रम सीकर मिलकर बूँदों से
मुखड़ा उसका स्वच्छ कर रहे,
हवा,प्रकाश, धरती, आकाश
आह्लाद अंतर में भर रहे !

कदमों में इक ताल भरी थी
ख़ाली पथ पर दौड़े जाती,
मौसम का उल्लास समेटे
हर अकुलाहट छोड़े जाती !

इक जन छाता लेकर निकला
मानो गल जाएगा जल से,
कोई घर बैठे ही डरता
वर्षा के इस कोलाहल से !

जीवन को पूरा स्वीकारे
कवि का अंतर है आह्लादित,
कुदरत का वह प्रिय सहचर है
मन अंतर सुख से आच्छादित !


बुधवार, जनवरी 10

एक लपट मृदु ताप भरे जो

एक लपट मृदु ताप भरे जो 



बैंगनी फूलों की डाल से

फूल झर रहे झर-झर ऐसे, 

लहरा कर इक पवन झकोरा 

सहलाये ज्यों निज आँचल से !


याद घेर लेती है जिसकी 

बनकर अनंत शुभ नील गगन, 

कभी गूंजने लगता उर में 

अनहद गुंजन आलाप सघन ! 


एक लपट मृदु ताप भरे जो 

हर लेती हृदय का संताप, 

सुधियाँ किसी अरूप तत्व की 

बनी रहतीं फिर भी अनजान ! 


सागर-लहर, गगन-मेघा सा 

नाता उस असीम से उर का, 

कौन समाया किस पल क़िसमें  

ज्योति अगन या गंध सुमन में !



शनिवार, अप्रैल 24

वासन्ती प्रभात

 वासन्ती प्रभात 

जन्म और मृत्यु के मध्य 

बाँध लेते हैं हम कुछ बंधन

जो खींचते हैं पुनः इस भू पर 

भूमिपुत्र बनकर न जाने कितनी बार बंधे हैं 

अब पंच तत्वों के घेरे से बाहर निकलना है 

पहले निर्मल जल सा बहाना है मन को 

फिर अग्नि में तपना है 

होकर पवन के साथ एकाकार 

घुल जाना है निरभ्र आकाश में 

फिर आकाश से भी परे 

उस परम आलोक में जगना है 

जहां कभी दिन होता न रात 

सदा ही रहता है वासन्ती प्रभात 

जहाँ द्रष्टा और दर्शन में भेद नहीं 

जहाँ दर्शन और दृश्य में अभेद है 

आनंद के उस लोक में 

जहां आलोक बसता है 

वाणी का उदय होता है 

मौन के उस अनंत साम्राज्य में 

जहाँ चेतना निःशंक विचरती है 

अहर्निश कोई नाम धुन गूँजती है 

शायद वही कृष्ण का परम धाम है 

जहाँ मन को मिलता विश्राम है !


शुक्रवार, जनवरी 29

बहा करो उन्मुक्त पवन सम

बहा करो उन्मुक्त पवन सम 



अनल, अनिल, वसुधा, पानी से 

जीवन का संगीत उपजता, 

मिले-जुले सब तत्व दे रहे 

संसृति को अनुपम समरसता !


हर कलुष मिटाती कर पावन

चलती फिरती आग बनो तुम, 

अपनेपन की गर्माहट भर 

कोमल ज्योतिर राग बनो तुम !


बहा करो उन्मुक्त पवन सम 

सूक्ष्म भाव अनंत के धारे,  

सारे जग को मीत  बनाओ 

शुभ सुवास के बन फौवारे ! 


ग्रहण करे उर साम्य-विषमता 

वसुंधरा सा पोषण देकर, 

प्रेम उजास बहे अंतर से 

इस जग का सहयोगी बनकर !


नई दृष्टि  से जग को देखो 

सहज ऊर्जा को बहने दो, 

मनस  बने अब धार नीर की 

कर साकार मधुर स्वप्नों को !


जितना दिया अधिक मिलता है 

सुख से जीवन भरपूर करो, 

खुले हृदय से ग्रहण करो फिर 

हो गुजर स्वयं से दूर करो !


रात-दिवस यह कहने आया 

विश्व नागरिक बन जीना है, 

अब सीमा आकाश ही बने 

जब घर धरती का सीना है !


 

मंगलवार, जनवरी 12

सब कुछ उसमें वह सबमें है

सब कुछ उसमें वह सबमें है
झर-झर बरस रहा है बादल 
भर ले कोई खोले आँचल, 
सिक्त हुआ आलम जब सारा 
क्यों प्यासा है मन यह पागल !

सर-सर बहता पवन सुहाना 
जैसे गाये मधुर तराना, 
लहराते अरण्य प्रांतर जब
 पढ़ता क्यों दिल गमे फ़साना !

चमक दामिनी दमके अंबर
प्रकटा क्षण में भीतर-बाहर, 
हुआ दीप्त जब कण-कण भू का 
अंधकार में क्यों डूबा उर !

मह-मह गन्ध लुटाता उपवन 
सुख-सौरभ से भर जाता वन, 
हुई सुवासित सभी दिशाएं 
कुम्हलाया सा क्यों व्याकुल बन !

जर्रे-जर्रे बसा आकाश 
दूर नहीं वह हृदय के पास, 
सब कुछ उसमें वह सबमें है 
फिर क्यों कहे मिल जाये काश ! 
 

बुधवार, सितंबर 23

पुलक बना वह ही बह निकले

पुलक बना वह ही बह निकले 


घन गरजे, गरजे पवना भी  

बीहड़ वन ज्यों अंधड़ चलते, 

सिंधु में लहरों के थपेड़े 

अंतर्मन में द्वंद्व घुमड़ते !


बहना चाहे हुलस-हुलस कर 

कौन रौकता पाहन बनकर ? 

हृदय उमगता ठाठें मारे 

टकराता पर कहीं रसातल !


कोष एक से एक छिपे हैं  

सागर तल व वसुधा गर्भ में, 

प्रकटे कैसे, निज हाथों से 

आड़ लगायी सदा गर्व में !


पुलक बना वह ही बह निकले 

अनजाने सभी तोड़े  बंध,

‘मैं’ का कंटक गड़ा पाँव में 

 पूर्ण कैसे होगा अनुबन्ध !



 

मंगलवार, अगस्त 25

बैठ हवा के पंखों पर ही

 बैठ हवा के पंखों पर ही 

सर-सर मर्मर पवन बह रही  

ठंड अति कभी ताप सह रही,

शीतलहर में ठिठुराती तन

स्वेद बहे यदि तप्त हो गयी !

 

कभी धूलि का उठे बवंडर 

छूकर आती कभी समुन्दर, 

चलती कभी पवन पुरवाई 

मंद झँकोरा अति सुखदायी !

 

हवा जलाती, हवा बुझाती

हवा उड़ाती, हवा सुखाती, 

प्राणों का आधार हवा है 

जीवन का भी द्वार हवा है !

 

प्रातः समीरण अति सुखदायी

हौले से सहलाने आती, 

बेला, चंपा की सुवास भर 

रजनी गंधा को महकाती !

 

झूम रहे जब खेत बाग वन 

दृश्य अति लगते वे मनोहर, 

हवा डुलाती हौले-हौले 

झूमें लहरें झील, नदी पर ! 

 

बासों से हो  हवा गुजरती 

सांय-सांय का गीत गूँजता,

छम-छम पत्तों का भी नर्तन 

संग पवन तृण गगन चूमता !

 

संग पवन के उड़ते-उड़ते 

बीज सुदूर यात्रा करते, 

बैठ हवा के पंखों पर ही 

यहाँ-वहाँ गिर भू पर उगते !

 

पंच प्राण प्राणी के भीतर 

गतियां सब संचालित करते, 

वायु बिना सब स्थिर हो जाये 

वायुदेव ही जीवन भरते !

 

हवा बदलियों को  ले जाती 

जीवन का आधार बनी है, 

कोमल शीतल परस पवन का 

महादेव का  महाभूत है !

 

अति सूक्ष्म तत्व प्रवाह रूपी 

भूमंडल को घेरे रहती, 

जैसे अपने आँचल में ले 

शिशु को माँ संभाले रहती !

 


बुधवार, मई 27

लहरों से थपकी देता है

लहरों से थपकी देता है 


कोई सुख का सागर बनकर 
लहरों से थपकी देता है, 
हौले-हौले से नौका को 
मंजिल की झलकी देता है !

बरसे जाता दिवस रात्रि वह 
मेघा लेकिन नजर न आये, 
टप टप टिप टिप के मद्धिम स्वर 
मानो दूर कहीं गुंजाये !

कोई ओढ़ा देता कोमल 
प्रज्ज्वलित आभा का आवरण, 
सुमिरन अपना आप दिलाता 
पलकों में भर दे सुजागरण !

सूक्ष्म पवन से और गगन से 
नहीं पकड़ में समाता भाव, 
होकर भी ज्यों नहीं हुआ है 
हरे लेता है सभी अभाव !

जाने कैसी कला जानता
भावों से मन माटी भीगे, 
धड़कन उर की राग सुनाये 
भरे श्वास में सुरभि कहीं से !

शुक्रवार, मई 8

भोर में


भोर में 


जब कूकती है कोकिल अमराई में 
तो मन का कमल खिलने लगता है, 
शीतल मन्द पवन की छुअन 
सहला जाती है हौले से 
हाँ, शायद उस स्पर्श  के द्वारा 
वही कोई सन्देश भेजता है ! 
दूर नारंगी रग का वृत्त 
जब रंग  रहा होता है 
 क्षितिज को 
तो मन के सागर में  
मानो नृत्य कर रही हों 
लहरों का आंदोलन यूँ लगता है !
हर सुबह कितनी अलग होती है 
जो कण-कण को प्रतिदिन 
 जीने के लिए अमृत से भर देती है 
तभी कहते हैं इसे अमृत बेला  !
अगर भोर की मासूमियत नहीं देखी तो 
दोपहर की चिलचिलाती धूप से 
सीधा वास्ता पड़ेगा 
और सहना कठिन होगा, बन्धु ! उसे 
मोर की केयाँ और 
मंदिरों से आती घण्टियों के स्वर 
सजा देते हैं भोर को कुछ और !

गुरुवार, सितंबर 27

उर से ऐसे ही बहे छंद



उर से ऐसे ही बहे छंद


मुक्त गगन है मुक्त पवन है
मुक्त फिजायें गीत सुनातीं,
मुक्त रहे मन चाह यही तो
कदम-कदम पर है उलझाती !

सदा मुक्त जो कैद देह में 
चाहों की जंजीरें बाँधी,
नयन खुले से लगते भर हैं
कहाँ नींद से नजरें जागी !

भावों की हाला पी पीकर
होश गँवाए ठोकर खायी,
व्यर्थ किया पोषण उस 'मैं' का
बुनियाद जिसकी नहीं पायी !

हो निर्भार उड़ा अम्बर में
उस प्रियतम की थाह ना मिली,
छोड़ दिया तिरने को खग सा
विश्रांति हित डाल ना खिली !

तिरने में ही उसे पा लिया
उड़ेंं बादल ज्यों हो निर्बंध,
बरस गये करने जी हल्का
उर से ऐसे ही बहे छंद !

बुधवार, फ़रवरी 21

फागुन झोली भरे आ रहा




फागुन झोली भरे आ रहा


सुनो ! गान पंछी मिल गाते
मदिर पवन डोला करती है,
फागुन झोली भरे आ रहा
कुदरत खिल इंगित करती है !

सुर्ख पलाश गुलाबी कंचन
बौराये से आम्र कुञ्ज हैं,
कलरव निशदिन गूँजा करता
फूलों पर तितली के दल हैं !

टूटा मौन शिशिर का जैसे
एक रागिनी सी हर उर में,
मदमाता मौसम छाया है
सुरभि उड़ी सी भू अम्बर में !

नव ऊर्जित भू कण-कण दमके
हलचल, कम्पन हुआ गगन में,
पवन चले फगुनाई सस्वर
मधुरनाद गुंजित तन-मन में !

भीनी-भीनी गंध नशीली
नासापुट में महक भर रही,
रंगबिरंगे कुसुमों से नित
वसुंधरा नित राग रच रही !