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सोमवार, जुलाई 20

भीतर दीपक एक जला है

भीतर दीपक एक जला है 


बना रहे जागरण ह्रदय में 

धरा-गगन पावन बन जाते, 

दें दृष्टि सम्मान की भीतर 

ख़ुद ही सम्मुख नव पथ आते ! 


ध्यान जहाँ भी जाकर टिकता 

ऊर्जा उधर प्रवाहित होती,

धैर्य-शांति के संग रह प्रज्ञा 

 ऊर्जा स्रोत सहज पा लेती !


श्वासों के पुल पर ही मन का 

राही आगे बढ़ता जाता, 

 शक्ति से पूरित हुईं श्वासें 

भीतर रस्ता खुलता जाता 


देह एक देवालय जिसमें 

श्वास एक अर्चन सी चलती, 

भीतर दीपक एक जला है 

उस अनाम की पूजा होती ! 


श्वासें हैं वे तार अनोखे 

जो पूर्ण ब्रह्मांड को जोड़ें 

गूँज रहा अस्तित्त्व निरंतर

  श्वासों को सजग हुए छोड़ें !

 

शनिवार, अप्रैल 18

कितनी बार धरा पर आये


कितनी बार धरा पर आये

योग वशिष्ठ पर आधारित 

इस ब्रह्मांड में परम अनंत, एक बस रहा जानें इसको

राम ने छोटी सी आयु में, पहचाना इसी असलियत को !


मुक्त हुए थे अपने भीतर, राम स्वयं ही चिंतन करके 

गुरु वशिष्ठ ने ज्ञान दिया था, परम मोक्ष की व्याख्या करके ! 


जैसे किसी भी मरुभूमि में, कोई फसल नहीं उग सकती, 

ज्ञेय तत्व भी वहाँ न होता, जहाँ वैराग्य आग न जलती !


 प्राप्त हुए विश्रांति को राम, शोभा उनकी बहुत निखरती, 

ज्ञेय वस्तु मन में झलकेगी, जैसे दर्पण में छवि बनती ! 


जीव की बुद्धि में बढ़ता, जो हृदयकाश में कल्पित होता, 

बाद विनाश के परलोक की, जीव सदैव कल्पना करता !


पाँच भूत आदि सभी मिथ्या, किंतु उन्हें मन सत्य मानता, 

  महासागर यह अज्ञान का, अंतहीन प्रतीत है होता ! 


न जाने किस अनंत काल से, धार समय की बहती जाती, 

सृष्टि हुई, फिर प्रलय घटा है, बार-बार यही सृष्टि होती !


कितनी बार धरा पर आये, कितनी बार हँसे रोये हैं, 

जिसका यह अज्ञान मिटा है, उसने तृप्ति बीज बोए हैं !


सागर चाहे शांत हुआ हो, या उसमें तूफ़ान उठ रहे, 

दोनों में जल तो जल रहता, उसमें कोई भेद कब रहे?


देह सहित या देह बिना हो, अंतर एक जीव का रहता, 

हवा बह रही या प्रशांत हो, नाम उसका वायु ही रहता !


 विश्व में अनथक पुरुषार्थ से, प्राप्त हुआ करता है कुछ भी, 

मनसा, वाचा और कर्मणा, चाहोगे दृढ़ता से जो भी !


 क्या नहीं मिलता अभ्यास से, उद्योग सदा करना होगा 

शास्त्र वचनों के अनुसार ही, जीवन में श्रम करना होगा !

 

शनिवार, मार्च 14

टूट जाते हैं स्वप्न

टूट जाते हैं स्वप्न

स्वप्न देखा है मानव ने

 न जाने कितनी-कितनी बार

लायेगा चिर स्थायी शांति

इक दिन वह

स्वर्ग से धरा पर उतार

चैन की श्वास लेंगे जब जन

 बहेगी प्रीत की बयार.. 

नहीं चलेगा, मौत का सामान

बेचने वालों का कारोबार

चाहता रहा है यही दिल उसका

 देता रहा है यही पुकार

खत्म होगा वैर, साथ

होड़ भी हथियारों की

 सहज, सुंदर बढ़ेगा जीवन व्यापर

नहीं पनपेंगे षड्यंत्र सत्ताओं के लिए

न ही भेंट चढ़ेंगे हिंसा की, निर्बल

विजय होगी सौहार्द की 

जीतेंगे ज्ञान और बल !

बनेगा नव समाज श्रम से

नहीं होगा अभाव न भूखा कोई

खिलेंगी सभी प्रतिभाएं

 नहीं खो जाएँगी अभावों के मरुथल में

स्वप्न देखा है मानव ने

यह हजारों बार

पर टूट जाते हैं स्वप्न

और हकीकत

बहुत ज़ोर से तमाचा लगाती है 

मानवता मुँह बायें खड़ी देखती रह जाती है ! 


शुक्रवार, जुलाई 4

ऊपर-नीचे जग है क्रीड़ा

ऊपर-नीचे जग है क्रीड़ा


गहराई में जाकर देखें 

एक धरा से उपजे हैं सब, 

ऊँचाई पर बैठ निहारें 

सूक्ष्म हुए से खो जाते तब !


रहे धरा पर उसको  पीड़ा 

ऊपर-नीचे जग है क्रीड़ा, 

ज्यों निद्रा में सब खो जाये 

स्वप्नों में भी मन बहलाये ! 


लेकिन एक अवस्था चौथी 

जिसमें तीनों एक हुए हैं, 

जगना, सोना, स्वप्न देखना 

तीनों जहां विलीन हुए हैं !


वहीं ठिकाना मिला जिसे गर 

सदा तृप्त, हर्षित हो गाए, 

जुड़ अनंत ऊर्जा से निशदिन 

तीनों में वह आये-जाये !


शुक्रवार, जनवरी 3

आत्म सूर्य

आत्म  सूर्य 


तप में लीन है सूर्य 

किसी तापस सा 

अथवा 

एक यज्ञ चल रहा है अनवरत 

सूर्य की सतह पर !


ऊर्जाएँ बन रही हैं  

बदल रही हैं 

सारे ग्रह, धरा और चन्द्र 

जो कभी उसके अंश थे 

अब एक परिवार की तरह 

उसके अनुयायी हैं !


शीतल हैं 

चाँद की किरणें 

धरा को पोषित करतीं 

 जगा जाते हैं सूर्य के हाथ

भूमि की संतानों को !

    उसी ज्योति का प्रसाद 

पंछियों का कलरव    

और जल का कलकल भी 

सारे तत्व उसी की देन हैं !


आत्मा सूर्य है 

मन चंद्रमा, धरती देह 

आत्मा पोषित करती है 

देह को अदृश्य हाथों से 

मन का द्वन्द्व 

वहीं से आया है !

 तप करके 

 ही कर सकती है 

आत्मा उस विश्व का निर्माण 

जो न्यायपूर्ण हो !


बुधवार, नवंबर 27

ॐ

ॐ


जो आकाश है 

वही सूरज बन गया है 

जो सूरज है 

वही धरा बना 

जो धरा है वही चाँद 

और सभी निरंतर होना चाहते हैं 

वह, जो थे 

जाना चाहते हैं वहाँ 

जहाँ से आये थे !


आदमी में 

आकाश है परमात्मा 

सूरज - आत्मा 

चाँद - मन और 

धरा है देह 

मन, देह से और 

देह, आत्मा से जुड़ना चाहती है 

आत्मा की चाह है परमात्मा से जुड़ 

आकाश होना 

यही गति जीवन है 

अंततः सभी आकाश हैं 

विस्तीर्ण, अनंत, शून्य आकाश !


बुधवार, सितंबर 25

मिलन धरा का आज गगन से

मिलन धरा का आज गगन से



काले कजरारे मेघों का 

गर्जन-तर्जन सुन मन डोले,  

छम-छम बरसा नीर गगन से 

मलय पवन के सरस झकोले !


चहुँ दिशा से जलद घिर आये 

कितने शुभ संदेश छिपाए, 

आँखों में उतरे धीरे से 

कह डाला सब फिर बह जायें !


उड़ते पत्ते, पवन सुवासित 

धरती को छू-छू के आये, 

माटी की सुगंध लिए साथ 

हर पादप शाखा सहलायें !


ऊँचे, लंबे तने वृक्ष भी 

झूमें, काँपें, बिखरे पत्ते, 

छुवन नीर  की पाकर प्रमुदित 

मिलन धरा का आज गगन से !


ऊपरे नीचे जल ही जल है  

एक हुए धरती आकाश, 

खोयीं सभी दिशाएँ जैसे 

कुहरे में डूबा है प्रकाश !




बुधवार, सितंबर 13

दूर और पास

दूर और पास 


वे साथ रह सकते थे 

पर रहते नहीं थे 

क्योंकि उनके दिल साथ थे 

हो सकता है 

साथ रहने पर दूर हो जाते दिल से 

वे दू….र थे इसलिए.. निकट थे 

यदि आ जाते निकट 

तो शायद…..

क्योंकि यदि दिन के बाद 

रात कभी न भी आये 

तो भी हर रात के बाद 

दिन अवश्य आता है 

धरा से दूर है चंदा 

इसलिए उसके चक्कर लगाता है ! 


मंगलवार, मार्च 7

बादलों के पार


बादलों के पार
उठे धरा से छूने अम्बर
मेघपुंज के पार आ गए
छूटी पीछे दो की दुनिया
इक का ही आधार पा गए I

दूर कहीं है गंध धरा की
स्वर्णिम क्षण यह दृश्य अनोखा
ढका गया बादल से हर कण
दिखे कहीं न कोई झरोखा I

निर्मल नीले नभ की छाया
श्वेत मेघ तिरते झलकाते
मानो बिखरी शुभ्रा कपास 
या उड़तीं बगुलों की पातें I

हिमाच्छादित पर्वत माला
ज्यों मीलों दूर चली जाती
श्वेत बादलों की यह शैया
परीलोक की याद दिलाती I

मंगलवार, नवंबर 15

किंतु न जब तक आया मानव

 किंतु न जब तक आया मानव 

पग-पग पर बलिहारी अंतर 

कण-कण में छवि सरस समायी, 

जाने कब तू उतरा नभ से 

कैसे पावन धरा बनायी !


पाहन, धूलि, पठार जहाँ तक 

 निहारती हैं निगाहें दृश्य, 

पादप, पेड़, नदी, निर्झर में 

अन्तर्हित वह अनाम अदृश्य ! 


मीन, कीट, सरिसर्प अनोखे 

खग, मृग, हरि, शावक, सिंहनियाँ,  

भाँति-भाँति के कुसुम खिले हैं 

तितली, अलि, अलिंद, मधुकरियाँ !


किंतु न जब तक आया मानव 

सृष्टि अधूरी सी लगती थी, 

दिव्य चेतना रही तिरोहित 

मन, मेधा उसमें जगती थी !


मन से जन्म हुआ मानव का 

श्रेष्ठ बुद्धि का है अधिकारी 

किंतु डुबाता अहंकार जब

मानस  रहा नहीं अविकारी !

बुधवार, जनवरी 12

सूर्य देव राशि बदलेंगे

सूर्य देव राशि बदलेंगे


संधिकाल आया ऋतुओं का 

रुत शीत विदा लेने को है,  

खेतों में सरसों फूलेगी 

कुसुमाकर अब दूर नहीं है !


धरा घूमती निशदिन अनथक

सूर्य देव राशि बदलेंगे,

आम्र वाटिका महक उठेगी

तिल गुड़ के उपहार बँटेगे !


माना शीतल पवन अभी भी 

हाड़ कँपाती हुई बहेगी, 

किंतु आ रही आहट कोई 

सूर्य  रश्मियाँ यही कहेंगी !


खिचड़ी पोंगल की सुगंध से 

महक उठेंगे सब घर आँगन,  

रंग-बिरंगी कनकैया से 

 होगा सज्जित यह नीलगगन  !


लोहरी  की अग्नि ज्वाला में 

मन से हर इक  भेद मिटेगा, 

मकर संक्रांति पर एक हुआ 

भारत नई दिशा पकड़ेगा !


गुरुवार, जून 3

बिन मांगे, बिना किये मिला

 बिन मांगे, बिना किये मिला 

धरा मिली आकाश भी मिला 

 जन्म-मृत्यु वरदान में मिला, 

माता-पिता का दुलार मिला 

सब कुछ तो हमको यहीं मिला !


शिक्षा पायी, संस्कार मिला 

बचपन, तरुणाई सहज मिली, 

खुद ही आयी प्रौढ़ावस्था 

वृद्ध की फिर काया भी मिली !


क्षुधा जानी, तृष्णा भी मिली 

आँसूं बहे, मुस्कानें मिली,

रिश्ते पनपे, परिवार मिला 

क्या कहें अधिक स्वीकार मिला !


सब कुछ मिलता ही आया है 

हमने अपनी मुहर लगाई, 

अहंकार ही सदा बढ़ाया 

सिर पर गठरी और चढ़ाई !


हो कृतज्ञ बस हल्का हो मन 

शून्य से भरे तन का कण-कण,

जिसने श्वासों का दान दिया  

उस अनंत का पावन सुमिरन !