लगन एक की भीतर गहरी
काँव-काँव कौवे की दिन भर
मगर कोकिला सुबह साँझ ही,
बगुले बन बन डोला करते
राजहंस तिरते कैलास ही !
सारहीन से भरा है यह जग
सार छिपा ढूंढे से मिलता,
सीप हजारों हैं सागर में
किसी किसी में मोती खिलता !
दिल की दौलत वाले हैं कम
लाखों निर्धन रोया करते,
जीवन का जो असली धन है
पल पल उसको खोया करते !
है अरूप भी छिपा रूप में
सत्य वही शेष छाया है,
हाथ न आयेगा अनाम वह
भरमाती जब तक माया है !
राह पकड़ लें यदि एक हम
मंजिल स्वयं घर तक आयेगी,
लगन एक की भीतर गहरी
उसका पता बता जायेगी !
अनिता निहालानी
३ जनवरी २०११