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शुक्रवार, जुलाई 31

मन के पार

मन के पार 


मन के पार जाना ही होगा 

यदि शुद्ध प्रेम का स्वाद लेना है 

मन दो पर टिका है 

यहाँ घृणा चली आती प्रेम के साथ

शांति के पीछे अशांति 

संत के पीछे असंत 

और हर अपराधी के पीछे 

एक निर्दोष भाव भी !


मन एकांगी नहीं है 

यहाँ द्वैत है 

या कहें द्वैत ही मन है

बह ही नहीं सकती 

दो तटों के बिना नदी मन की ! 


उसके पार केवल एक 

एक अनंत का विस्तार 

जहाँ चीजें बँटी नहीं 

 विशुद्ध प्रेम

और शांति भी भरपूर 

वहाँ दो की छाया भी नहीं 

वहाँ परम स्वीकार है !


मन टुकड़ों में बाँटता है 

टुकड़ा-टुकड़ा प्रेम 

नहीं दिया जाता ईश को 

यहाँ तो पूरा का पूरा ही 

देना होता है स्वयं को ! 

 

गुरुवार, जुलाई 23

भय केवल मन की छाया है

भय केवल मन की छाया है


अनजाने रस्तों पर चलते 

भय का कंपन भीतर उठता, 

किंतु उसे रोक नहीं पाये  

जो मन आगे-आगे बढ़ता !


हो अपार गगन जहाँ सम्मुख 

मार्ग स्वयं ही खुलता जाता, 

भय बनकर तो मात्र ह्रदय का 

अंधकार ही जलता जाता ! 


हो भयभीत न पीछे मुड़ना 

सदा स्वर्ण को तपना पड़ता, 

हर इक लपट निखारे जाती 

 अंतर ओज ही साहस बनता !


भय केवल मन की छाया है 

तोड़ सके कब संबल उर का, 

सच पल भर को ढक भी जाये 

संग अनंत जागरण नभ सा !


माना सच का मार्ग संकरा 

अनजाना औ' ऊँचा-नीचा, 

एक-एक पग आगे धरते   

भय के पार चले ही जाना ! 


भय मात्र आवरण बन सकता  

किंतु नहीं दीवार बन सके, 

कँपते कदमों से भी पथ पर 

पा लेता हर लक्ष्य, जो चले !

 

शनिवार, जुलाई 18

मन का शावक थिर हो जाता

मन का शावक थिर हो जाता


भर श्रद्धा-विश्वास ह्रदय में 

भीतर कदम बढ़ाना होगा, 

पूर्ण समर्पण उस अनाम में 

प्रेम विशुद्ध जगाना होगा !


वह भी भीतर राह देखता 

बाधाएँ कभी पथ न रोकें, 

जीवन का कोई भी अनुभव 

अंतर की यह प्यास न सोखे ! 


श्वासें ही रस्ता दिखलायें 

जब भी कोई भीतर जाता, 

भीतर की गुंजन को सुनकर 

मन का शावक थिर हो जाता !


हर भ्रम एक द्वार बन जाता 

हर दुविधा आगे ले जाती, 

दुख भी यहाँ सहायक होते 

सुख चाहत ऊर्जा दे जाती !

 

बुधवार, जुलाई 15

अथ योगानुशासनम्

अथ योगानुशासनम् 



अनुशासन यदि नहीं सधा तो 

सब संकल्प हवा ही होंगे,  

संदेहों को दूर करे यह 

धैर्य और साहस पनपेंगे !


हर गति इक दर्पण बन जाती 

हर श्वास झलकती है उसमें, 

तन का आसन मन में ढलता 

मन ही भाग्य विधाता जग में !


बाहर का अनुशासन भीतर 

तालमेल बन कर मिलता है, 

खुले नयन से जग को देखें 

ध्यान ज्ञान बन कर खिलता है !


हर श्वास में भरा हो साहस

हर निःश्वास हरे संदेह, 

अग्नि जलेगी तीव्र तभी जब 

 होंगी विशुद्ध श्वासें व देह !


इड़ा, पिंगला में जब बहती

 हो अबाधित श्वास की धारा, 

 सुषुम्ना स्वत: जाग ही जाती 

  संग बढ़ती ज्ञान की धारा ! 


स्थिरता से ऊर्जा बढ़ जाये 

संघर्षों से कम हो जाती,

 झुकते नहीं युद्ध में योद्धा

संतुलन से शक्ति ही बढ़ती ! 


 देह जितनी लचीली होगी 

मन भी उतनी शीघ्र झुकेगा, 

किया समर्पण जब दोनों ने 

भीतर का सामर्थ्य बढ़ेगा !


देह, श्वास, मन तीनों मिलकर 

 देवालय ह्रदय में बनाते 

शुद्ध हुए वे निज प्रयत्न से 

आत्मा को उसमें बैठाते !


सोमवार, जुलाई 13

मौन

मौन 


देह करे अवशोषण भोजन का

इतना ही तो पर्याप्त नहीं 

हर विचार, भावना और हर अनुभव को 

आत्मसात करे मन भी !

जीना है हर पल को शिद्दत से 

न रहे कोई कटु स्मृति 

न भीतर रह जाये 

कोई अधपका विचार  

संतुलन ही वह अग्नि है 

जो भीतर जगानी है 

देह और श्वास हों जब संतुलित

प्राण बहते हैं भीतर अबाधित 

साहस जगता है वैसे ही 

जैसे रात के बाद दिन 

संतुलन केवल मौन नहीं है 

वहाँ प्राणों की धारा बहती है 

और ह्रदय ज्ञान से जगमगा उठता है !


 

सोमवार, दिसंबर 1

शांति सरवर मन बने

शांति सरवर मन बने



शांत मन ही ध्यान है 

ईश का वरदान है, 

सिंधु की गहराइयाँ 

अनंत की उड़ान है !


आत्मा के द्वार पर 

ध्यान का हीरा जड़ें,

ईश चरणों  में रखी  

भाग्य रेखा ख़ुद पढ़ें !


 जले भीतर ज्ञान अग्नि

 शांति सरवर मन बने,

अवधान उपज प्रेम से, 

कर्म को नव दिशा दे !


लौट आये उर सदन 

ऊर्ध्वगामी गति मिले,  

टूट जायें सब हदें 

फूल अनहद के खिलें !  


गुरुवार, अक्टूबर 30

वही थाम लेता राहों में

वही थाम लेता राहों में 


कोई लिखवा जाता है ज्यों 

जहाँ कलम, कागज सम्मुख है, 

अक्षर भरते से जाते हैं 

मौन सदा, जो जगत प्रमुख है !


वही शब्द है वही अर्थ भी 

वही गीत प्राणों में भरता, 

वही श्वास बन आता जाता 

वही स्वयं से जोड़े रखता !


जिसके होने से ही हम हैं 

एक पुलक बन तन में दौड़े, 

वही थाम लेता राहों में 

व्यर्थ कहीं जब मन यह दौड़े ! 


 होकर भी ना होना जाने 

उसके ही हैं हम दीवाने, 

 जिसे भुला के जग रोता है 

याद करें हम लिखें तराने !


जो भी उसकी याद दिलाये 

वही गुरू सम पूजा जाये, 

सपनों की अब कौन सुने? जब 

नींदों को ही हर ले जाये !


मंगलवार, सितंबर 16

सत्य

सत्य 


मन ख़ाली है 

और इसे ख़ाली रखना 

अस्तित्त्व का काम है 

किसी ने इसे ख़ाली रखा है 

बातें आती हैं 

कहीं बाहर से 

और कोई भी इसे देख सकता है !


जो अनासक्त है 

वही ख़ाली है  

जो निर्दोष है 

उसे ही चुना जाता है 

जो ख़ाली है 

वही समस्या से मुक्त है !


इस दुनिया में चाहने योग्य 

क्या कुछ भी नहीं ? 

सत्य क्या है 

कोई नहीं जानता 

जब मन मौन होता है 

वह स्वयं के साथ होता है 

सत्य के साथ होता है !




बुधवार, अगस्त 6

दुनिया तो बस इक दर्पण है

दुनिया तो बस इक दर्पण है


फूलों की सुवास बिखरायें 

या फिर तीखे बाण चलायें,

शब्द हमारे, हम ही सर्जक 

हमने ही तो वे उपजाए !


चेहरा भी व तन का हर कण 

रचना सदा हमारी अपनी, 

 अस्वस्थ हो तन या निरोगी 

ज़िम्मेदारी ख़ुद ही लेनी ! 


डर लगता है, गर्हित  दुनिया 

हम ही भीतर कहते आये,

अपने ही हाथों क़िस्मत में 

दुख के जंगल बोते आये !


कभी लोभवश, कभी द्वेषवश

कभी क्रोध के वश हो जाते, 

मन के इस सुंदर उपवन को 

पल भर में रौंद चले जाते !


कोई नहीं है शत्रु बाहर 

ख़ुद ही काफ़ी हैं इस ख़ातिर, 

दुनिया तो बस इक दर्पण है 

‘वही’ हो रहा इसमें ज़ाहिर !


मंगलवार, मार्च 25

जो है


जो है 

जो है 

उसे देख नहीं सकते 

वह देखने वाला है !


जो दिखता है 

वह है नहीं 

क्योंकि वह 

पल-पल बदल रहा है !


जो है 

वह सदा है 

पर अनजाना ही 

रह जाता है !


जो नहीं है 

उसी को पकड़ने में 

मन ऊर्जा गँवाता है !


जीवन इसी विरोधाभास 

का दूसरा नाम है !


जो है 

उसी को कहते राम हैं 

जिसमें ठहर कर 

मन पाता विश्राम है !


शुक्रवार, फ़रवरी 21

मन

मन 


नींदों के पनघट पे 

यादों को बुनता है, 

ख़्वाबों के झुरमुट में 

शब्द पुष्प चुनता है !


भावों की माला रच 

ताल में पिरोता है, 

अर्पित कर चरणों में 

अश्रु में भिगोता है !


जाने क्या पाएगा 

गीत रोज़ गाता है, 

तारों से बात करे 

चंदा संग जगता है !


किसकी वह राह तके 

किसको पुकारे सदा, 

शब्दों की नाव बना 

मन, सागर तिरता है !


गुरुवार, जनवरी 23

साधना

साधना 


वह, जो है 

वह, जो अनाम है 


पाया जा सकता है 

उसका पता, उससे

 वह, जो नहीं है 


जो नहीं है 

पर होने का भ्रम जगाता है 


स्वीकार कर लेता है जब 

न होने को अपने 

तब झलक जाता है वह, जो है 


और तब जो नहीं है 

बन जाता है वह जो है 


कुछ नहीं से 

सब कुछ बन जाना ही 

साधना है  


देह व मन को भी 

यही भेद जानना है 


कि वे नहीं हैं अपने आप में कुछ 

और तब वे जुड़ जाते हैं विराट से 


एक विशाल मन ही 

चलाता है सारे मनों को 


पंचभूत चलाते हैं 

सारी देहों को !