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बुधवार, मई 20

चंदा की आभा में कैसा यह हास जगा

चंदा की आभा में कैसा यह हास जगा

 

 

मानस की घाटी में, श्रद्धा का बीज गिरा

मनीषा  की डाली पर, शांति का पुष्प उगा,

अंतर की सुरभि से, जीवन का ढंग महका

रिस-रिस कर प्रेम बहा, अधरों से हास पगा !

 

कण-कण में आस जगी, नयन में उजास भरा

हुलसा है पोर-पोर, उर मनहर गीत जगा,

बाहर इक लय बिखरी, जीवन संगीत बहा

कदमों में थिरकन भर, गह्वर में नृत्य जगा !

 

मुस्काई हर धड़कन, लहराया जब यौवन

अपने ही आंगन में, प्रियतम का द्वार खुला,

लहरों सी बन पुलकन, उसकी ही बात कहे

बिन बोले सब कह दे, अद्भुत यह राग उठा !

 

हँसता है हर पल वह, सूरज की किरणों में

चंदा की आभा में, कैसा यह हास जगा,

पल-पल वह सँग अपने, सुंदर यह भाग जगा

देखो यह मस्ती का, भीतर है फाग जगा !

 

युग-युग से प्यासी थी, धरती का भाग उगा

सरसी बगिया मन की, जीवन में तोष जगा,

वह है, वह अपना है, रह-रह कहता कोई 

सोया था जो कब से, मंजर वह आज जगा !

 

मंगलवार, नवंबर 11

जीवन राग


जीवन राग 

मिट जाते हैं सारे द्वन्द्व 

झर जाता है हर विरोध 

ख़त्म हो जाता है सदा के लिए संघर्ष 

जब नत मस्तक होता है मन (तेरे सम्मुख)

खो जाती है हर चाह 

विलीन हो जाती है जगत की कामना 

तुष्टि, पुष्टि और संतुष्टि भी 

खिलौनों सी प्रतीत होती है 

तब कर्मबंधन नहीं बंधता 

जीवन राग बन जाता है ! 


पात्र 

ऋषि मंत्रों के द्रष्टा थे 

देखते थे, देख लेते थे 

अस्तित्त्व में छुपे विचारों को 

सारा ज्ञान सिंचित है कहीं 

बस उसे उजागर करना है 

जैसे जल बहुत है कूप में 

उसे पात्र में भरना है 

हम कब और कैसे पात्र बनें 

यही तय करना है ! 

गुरुवार, सितंबर 11

हर पल जीवन नया हो रहा

हर पल जीवन नया हो रहा 


साथ समय के चलना होगा

वरना ख़ुद को छलना होगा, 

शब्द उगें पन्ने पर, पहले

मन को भीतर गलना होगा!


छंद, ताल, लय, बिंब अनोखा 

हर युग में नव रचना होगा, 

ओढ़ पुरानी चादर कब तक 

इतिहासों को तकना होगा!


हर पल जीवन नया हो रहा 

नूतन ढब से सजना होगा, 

परिपाटी का रोना रोते 

आदर्शों से बचना होगा!


सच को सच औ' झूठ-झूठ को 

कहना,लिखना,पढ़ना होगा। 

कब तक आख़िर कर समझौते 

राग पुराना रटना  होगा!


बुधवार, जनवरी 3

कुसुमों में सुगंध के जैसा


कुसुमों में सुगंध के जैसा

राग नया हो ताल नयी हो 
कदमों में झंकार नयी हो, 
रुनझुन रिमझिम भी पायल की 
उर में  करुण पुकार नयी हो !

अभी जहाँ विश्राम मिला है  
बसे हैं उससे आगे राम, 
क्षितिजों तक उड़ान भर ले जो 
 हृदय को पंख लगें अभिराम !

अतल मौन से जो उपजा हो 
सृजित वही हो मधुर संवाद,
उथले-उथले घाट नहीं अब 
गहराई में पहुंचे याद !

नया ढंग अंदाज नया हो 
खुल जाएँ जो बंद हैं  द्वार ,
नये वर्ष में गीत नया हो
बरसे बरबस सरस उपहार !

अंजुरी भर-भर बहुत पी लिया  
अमृत घट वैसा का वैसा,
अब अंतर में भरना होगा 
कुसुमों में सुगंध के जैसा !

गुरुवार, अक्टूबर 19

अनजाने पथ पर वह सहचर

अनजाने पथ पर वह सहचर

नव सृजन घटे नव द्वार खुलें

 कदम पड़ेगा जब अनंत का,

नूतन राग जगेंगे,  जैसे 

 शीश उठाये कोमल दूर्वा !


नव भाषा, नव छंद, शब्द नव 

है अपार उसका भंडारा,  

मिलकर जिससे जीवन जी ले 

मिले सदा के लिए सहारा !


पुष्प खिलेंगे जब श्रद्धा के 

 इक अभिनव मुस्कान उठेगी, 

हर लेगी हर तमस भाव वह 

शुभ्र ज्योत्सना छा जाएगी !


चहुँ दिशाओं में गुंजित सदा 

  तान नशीली प्रेम की अमर, 

हाथ पकड़ कर ले जाता है 

अनजाने पथ पर वह सहचर !


अंतर्यामी मन का वासी 

जो आह्लादित पल-पल रहता, 

अति निकटता के क्षण में कभी  

मौन मुखर उसका हो जाता !


 अपना वही नहीं जो सपना 

हाथ बढ़ाकर छूलें जिसको, 

जिसके होने से ही जग है 

कैसे भला बिसारें उसको !


बुधवार, अगस्त 9

कुछ दोहे


कुछ दोहे


वाणी से साथी बनें, वाणी अरि बनाये 

वाणी अगर कठोर है,मनस सुख ले जाये 


वाणी के सायक चलें, कुछ भी रहे न शेष 

अभी-अभी जो राग था, बन जाता है द्वेष 


वाणी का आदर करें, करें न इससे चोट 

अपने जन ही ग़ैर बन, व्यर्थ निकालें खोट 


वाणी जोड़े दिलों को, सुख का है आधार 

वाणी ही संबल बने, बन जाती है प्यार 


वाणी इक वरदान है, देवी की है देन

सम्मान इसका रखें, येन, केन, प्रकारेण


बुधवार, जुलाई 19

आत्मा का फूल


आत्मा का फूल 

जहां प्रमाद है वहाँ अहंकार है 

जहां अहंकार है वहाँ प्यार नहीं 

जहां प्यार नहीं वहाँ राग-द्वेष है 

अर्थात वे दो असुर 

जिन्होंने देवों का धरा वेश है 

राग प्रिय से बाँधता है 

द्वेष अप्रिय से बचना चाहता है 

पर हर बंधन दुःखदायी है 

और बचने की कामना ही 

और जोरों से बाँधती आयी है

जिसे पकड़ा है 

वह छूट जाता है 

जिसे छोड़ना चाहा 

वह बना रहता है मन में 

इन असुरों का अंत किए बिना 

प्रेम का राज्य नहीं मिलता 

और प्रेम के बिना 

आत्मा का फूल नहीं खिलता !  



शुक्रवार, सितंबर 30

पल दो पल की है यह माया

पल दो पल की है यह माया 


यह जो घट रहा मन से जुड़ा  

 हो  घनी धूप चाहे छाया,

व्यर्थ मिटाने का श्रम करता  

केवल पल दो पल की माया !


सत्य मानकर यदि चलेगा  

दुःख के सिवा न कुछ भी मिलता, 

जो बदल रहा पल-पल जग में 

सुख कैसे उससे खिल सकता !


राग-विराग के बिम्ब गढ़ लिए 

उनके प्रतिबिम्बों में खोया, 

उर यह जिस पल हँस सकता था

उन घड़ियों में भी वह रोया !


जो भी मिला वही है काफी 

जब तक न यह तोष जगेगा,

जग का माया जाल सदा ही 

अन्तर की समता हर लेगा !


शुक्रवार, सितंबर 16

शुभ दीपक एक जलाना है

शुभ दीपक एक जलाना है


छँट जाएगा घोर अँधेरा 

उहापोह, उलझन का डेरा, 

थोड़ा सा स्नेह जगाना है 

शुभ दीपक एक जलाना है !


एक से फिर अनेक जल सकते

ज्योति की आकर बन सकते,

अनथक पथ चलते जाना है 

मग दीपक एक जलाना है !


फूल खिलाये हैं जिसने नित 

नीरवता गूँजे जिसके मित,

उसका इक गीत सुनाना है 

यश दीपक एक जलाना है !


करुणा, प्रेम, तपस, प्रार्थना 

दिलों में सोयी मधुर भावना, 

हौले से  पुनः जगाना है 

जय दीपक एक जलाना है !


दीप जल रहे जो नयनों में 

सुहास झरे मृदुल बयनों में, 

ऐसा इक राग सुनाना है 

हित दीपक एक जलाना है !


वचन कभी जो शर से चुभते 

निज अंतर  का भी बल हरते,

ना ऐसा रुख अपनाना है 

 मधु दीपक एक जलाना है !



सोमवार, मई 23

बन जाओ गर राग प्रेम का

बन जाओ गर राग प्रेम का 


खुद से दूर हुआ है जो भी 

तुझसे दूर रहा करता है, 

प्रेमी ही यदि खोया हो तो 

प्रियतम कहाँ मिला करता है !


बजा रहा है कान्ह बाँसुरी 

गोपी जन को याद दिलाने, 

बन जाओ गर राग प्रेम का 

सुर उसका गूँजा करता है !


गुरुओं की बातें सच्ची हैं 

कोई हमसा भीतर रहता, 

हरदम कोई आँख गड़ाए 

सुबहो-शाम तका करता है !


जिससे ये श्वासें चलती हैं 

उससे ही अनजान रहा मन, 

उससे आँखें चार हुईँ कब 

सारा जग घूमा करता है !


नित नूतन है कान्ह सलोना 

बहता जैसे पावन पानी, 

हर लेता है पीर हिया की 

जो भी ग्वाल सखा बनता है !




शनिवार, जनवरी 22

यहाँ हवाएं भी गाती है


यहाँ हवाएं भी गाती है

सुनना है सुख,  पुण्य  प्रदायक
सुनने की महिमा है अनुपम, 
करे श्रवण जो बनता साधक 
मिल जाता इक दिन वह प्रियतम !

निज भाषा में सुनने का फल
 सहज ही हों सभी कर्म कुशल, 
अध्ययन वृत्ति, श्रवण है भक्ति
 मन की धारा बनती निर्मल !

राग सुनो, आलाप सुनो तुम 
मधुरिम तान सुनो कोकिल की,
यहाँ हवाएं भी गाती है
 सरिता बहती सुर सरगम की! 

कल-कल नदिया की भी सुनना 
बादल का तुम सुनना गर्जन,
गुनना पंछी की बोली को ,
सागर की लहरों का तर्जन !

पिउ पपीहा, केकी मोर की
सुनना भी है एक विज्ञान,  
गूँज मौन की सुन ले कोई 
हृदय गुह में जगता प्रज्ञान !

शनिवार, जुलाई 17

ध्यान


ध्यान 

जब हम बोलते हैं 

भीतर या बाहर

तो दूसरा रहता  है 

जब चुप रहते हैं 

तो कोई दूसरा नहीं होता 

एक हो जाती है सारी कायनात 

जब घटता है मौन

भीतर या बाहर

फिर जहाँ न राग रह  जाता है न द्वेष 

न सुख और न ही दुःख 

जहाँ खुद से मिलना होता है 

और मृत्यु का भय भी खो जाता है 

उस मौन को पा लेना ही ध्यान है 

यही स्रोत है जीवन का 

शायद यहीं रहते भगवान हैं !


बुधवार, सितंबर 30

दोनों के ही पार मिले वह

दोनों के ही पार मिले वह 


देखे राग-रंग दुनिया के 

मृग मरीचिका ही सब निकले, 

 निकट जरा जा  छूकर देखा 

जैसे इंद्रधनुष हो नभ में !


पीड़ाओं के बीज गिराए 

अनजाने या कभी जानकर, 

जिस पथ की मंजिल धूमिल है 

थके नहीं पग उसे नापकर !


हर मुस्कान छिपाए है कुछ 

भीतर कुछ है बाहर है कुछ,

दोनों के ही पार मिले वह 

कर देता हर सुख-दुख ना कुछ !  


 मिलना होगा महाकाल से 

केवल  बात यही है निश्चित,

शेष सभी स्वप्नों सा मिथ्या 

जग में जो भी मिलता सीमित  !

 

गुरुवार, फ़रवरी 1

कल जो चाहा आज मिला है

कल जो चाहा आज मिला है


भय खोने का, पाने का सुख
मन को डाँवाडोल करेगा,
अभय हृदय का, वैरागीपन
पंछियों में उड़ान भरेगा !

मंजिल की है चाह जिन्हें भी
कदमों को किसने रोका है,
बाधाएँ भी रची स्वयं ने
सिवा उसी के सब धोखा है !

कल जो चाहा आज मिला है
कौन शिकायत करता खुद की,
निज हाथों से पुल तोड़े हैं
नौका डूब रही अब मन की !

जीवन एक विमल दर्पण सा
जस का तस झलकाता जाता,
नयन मूंद ले कोई कितने
अंतर राग बरस ही जाता !

सोमवार, जून 5

राग मधुर भीतर जो बहता


राग मधुर भीतर जो बहता

क्या कहना अब क्या सुनना है
मौन हुए उसको गुनना है,
होकर भी जो नहीं हो रहा
उस हित भाव पुष्प चुनना है !

क्या चाहें किसको खोजें अब
अंतहीन तलाश हर निकली,
मिलकर भी जो नहीं मिला है
कदमों पर उसके झुकना है !

क्या पाना अब किसे सहेजें
किसका लोभ ? लाभ अब चाहें,
छूट रहा पल-पल यह जीवन
श्वासों का अंबर बुनना है !

राग मधुर भीतर जो बहता
जर्रा जर्रा जिसे समेटे,
हट जाना राहों से उसकी
अनायास उसको बहना है !

अंतर में जो दीप जल रहा
राह दिखाता वही अंत में,
रोशन कर दे कंटक सारे
एक-एक कर सब चुनना है !