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शनिवार, जून 6

चिंगारी प्रेम की

 चिंगारी प्रेम की 

प्रेम कविताएँ और कहानियाँ 

पढ़ी जाती हैं, रची जाती हैं, सुनायी जाती हैं 

क्योंकि प्रेम की जो नन्हीं सी चिंगारी 

छिपी है हरेक मन में 

उसे हवा देकर पल भर को सुलगाती हैं 

या कोई मन छिपाये हो भीतर

 प्यार की सुवास 

वह बिखर जाती है

 किसी अनजान पल में 

जब वह सचेत नहीं है 

रक्षा नहीं कर रहा है 

पहरे पर नहीं खड़ी है बुद्धि 

प्रेम कहो, सुनो या पढ़ो 

यदि रच नहीं सकते 

निज जीवन में भी प्रेम का बसंत छायेगा 

इन्हीं नयनों से इंतज़ार किया था 

सपनों से भरा था मन का आँगन 

वह पुन: नज़र आएगा 

प्रेम पावन है 

क्योंकि प्रेम दान है 

पूजा है अर्पण है ! 

 

शनिवार, मार्च 21

कविता दिल की भाषा जाने

कविता दिल की भाषा जाने

 

वाणी अटकी, बोल न फूटे

 अंतर का चैन कोई लूटे,

कविता दिल की भाषा जाने

कितने कूल-किनारे छूटे !

 

रागी मन बनता अनुरागी

भीतर कैसी पीड़ा जागी,

पलकों में पुतली सा सहेजे

भीतर लपट लगन की लागी !

 

उर में प्रीत भरे वह करुणा

डबडब नयना करें मनुहार,

छलक-छलक जाये ज्यों जल हो

गहराई में छिपा था प्यार !

 

सरल, तरल बहता मन सरि सा

घन बन के जो जम ना जाये,

अंतर उठी हिलोर उलीचे

नियति लुटाना, कवि कह जाये !

 

 

शुक्रवार, सितंबर 20

कविता

कविता 

सुना आपने

अब कविता पढ़ना मुझे नहीं भाता 

अक्सर मैं कविता का पेज ही खोल कर नहीं देखती 

टिकने ही नहीं देती आँखों को शीर्षक पर

 एक क्षण के लिए भी 

शायद भय है अंतर्मन में 

पुराना प्रेम जाग न उठे 

न लगने लगें कविताएँ अपनी-अपनी 

सो दूर से ही नमन करती हूँ 

नहीं तौलती शब्दों को 

भावों को अनुभूति में नहीं लाती

विचारती हूँ, परखती हूँ 

पर नहीं देखती, न छूती  

वृक्षों, पत्तियों और फूलों को 

मैं बिगड़ गई हूँ 

एक कली ने कल राह चलते कहा था 

मैंने अनसुना कर दिया 

कान नहीं दिये 

क्योंकि अब मैं वह नहीं रही 

मुझे अभाव नहीं है कोई 

 सभी कुछ है 

अब फूलों को अपना दुख सुनाने को रहा ही नहीं 

हवा का संगीत सुनने का वक्त नहीं 

फिर क्यों कविता पढ़ूँ 

क्यों अफ़सोस करूँ 

भ्रष्टाचार पर, असमानता पर, बेरोज़गारी पर 

क्यों नाराज़ रहूँ भ्रष्ट सत्ता से 

अब मैं स्वतंत्र हूँ 

अपने पैरों पर हूँ 

अब सब ठीक चल रहा है 

पेड़ कहीं कटते होंगे 

मुझे आवाज़ सुनायी नहीं देती 

नारे लगते होंगे, जुलूस निकलते होंगे 

पर वे बेमतलब हैं 

पहाड़ों पर आग लगती होगी शायद 

पर मैंने खिड़की कहाँ खोली है 

बंद हैं आँखें मेरी 

सपनों में नहीं 

अब तो ज़िंदगी चलने लगी है 

मैंने इसकी सेहत का जाम पिया था 

नये वर्ष पर 

शुभकामना भी दी थी 

अब मुझे कविता ज़रूरी नहीं लगती 

कि अच्छे-भले शब्दों को 

साथ-साथ रख दिया जाये यूँही 

मन बहलाव के लिए 

सुना आपने कविता अब 

ऊपर की या नीचे की शै हो गई है 

दूसरी श्रेणी की !


बुधवार, मार्च 6

अपना-अपना स्वप्न देखते

अपना-अपना स्वप्न देखते 


एक चक्र सम सारा जीवन 

जन्म-मरण पर जो अवलंबित,

एक ऊर्जा अवनरत  स्पंदित 

अविचल, निर्मल सदा अखंडित ! 


एक बिंदु से शुरू हुआ था 

वहीं लौट कर फिर जाता है, 

किन्तु पुनः पाकर नव जीवन

नए कलेवर में आता है ! 


पंछी, मौसम, जीव सभी तो 

इसी चक्र से बँधे हुए हैं , 

अपना-अपना स्वप्न देखते 

नयन सभी के मुँदे  हुए हैं !


हुई शाम तो लगीं अजानें  

घंटनाद कहीं जलता धूप  ,

कहीं आरती, वन्दन, अर्चन 

कहीं सजा महा सुंदर रूप !


एक दिवस अब खो जायेगा 

समा काल के भीषण मुख में, 

कभी लौट कर न आयेगा 

बीता चाहे सुख में दुःख में ! 


एक रात्रि होगी अन्तिम भी 

तन का दीपक बुझा जा रहा, 

यही गगन तब भी तो होगा 

पल-पल करते समय जा रहा !


बुधवार, सितंबर 13

दूर और पास

दूर और पास 


वे साथ रह सकते थे 

पर रहते नहीं थे 

क्योंकि उनके दिल साथ थे 

हो सकता है 

साथ रहने पर दूर हो जाते दिल से 

वे दू….र थे इसलिए.. निकट थे 

यदि आ जाते निकट 

तो शायद…..

क्योंकि यदि दिन के बाद 

रात कभी न भी आये 

तो भी हर रात के बाद 

दिन अवश्य आता है 

धरा से दूर है चंदा 

इसलिए उसके चक्कर लगाता है ! 


सोमवार, सितंबर 11

धारा इक विश्वास की बहे

धारा इक विश्वास की बहे

बुना हुआ है दो धागों से  

ताना-बाना इस जीवन का, 

इक आनंद-प्रेम का वाहक 

दूजा, जंगल है यादों का !


दोनों हैं दिन-रात की तरह 

 पुष्प गुच्छ हों गुँथे हुए ज्यों, 

किसके हो लें, किससे पोषित 

यह चुनाव करना है दिल को !


तज दे सारे दुख, भय, विभ्रम 

मुक्त गगन में विहरे खग सा, 

मन को यह निर्णय करना है 

जंजीरों से बंधा रहे या ! 


जहाँ न कोई दूजा, केवल 

धारा इक विश्वास की बहे,

सुरति निरंतर वहीं हृदय की 

कल-कल स्वर में सहज ही कहे !


वही ज्ञेय है, लक्ष्य भी वही 

जहाँ हो रहा नित्य ही मिलन,

प्रीति-सुख से मिले प्रज्ञा जब 

शिव-गिरिजा का होता नर्तन !


बुधवार, अगस्त 23

चन्द्रयान तीन

चन्द्रयान तीन 

चन्द्रयान ने जोड़ दिया है 

भारत को फिर एक बार 

मंदिर-मंदिर और घर घर 

चढ़ा रहे हैं लोग भगवान को माला-हार 

इस बार विक्रम को सफलता मिले 

इसकी माँग रहे हैं मन्नतें 

वैज्ञानिकों ने वर्षों तक बहाया है स्वेद 

और खोयी है रातों की नींद 

उसका उन्हें फल मिले 

यह यान भारत के मस्तक पर चाँद सा टीका है 

दुनिया में उसे मिलेगा सम्मान 

उससे भी बढ़कर दुनिया को लाभ मिले 

यह उसका एक तरीक़ा है

सुबह से टीवी पर एंकर समझा रहे हैं 

सॉफ्ट मून लैंडिग के ग्राफ़ दिखा रहे हैं 

हरेक का मन उत्सुकता से भरा है 

कब आएगा वह पल 

जिसके लिए सदियों से 

मानव ने इंतज़ार किया है 

एक दिन चाँद पर बनेगी मानव बस्ती 

उसकी बुनियाद शायद आज ही रखी जाये 

पानी है या नहीं वहाँ 

इसकी पड़ताल की जाये 

विक्रम भारत का है 

भारत सबका है 

क्योंकि 'वसुधैव कुटुम्बकम्' का मंत्र 

यहीं से गाया गया है 

चंद्रमा को शिव के मस्तक पर 

यहीं तो बैठाया गया है ! 




शुक्रवार, अगस्त 18

वर्तमान भविष्य के हाथों में

वर्तमान भविष्य के हाथों में

नवजात शिशु की पकड़ भी 

कितनी मज़बूत है 

मुट्ठी में अंगुली थमाकर देखती है माँ   

 जकड़ लेता है 

दृढ़ता से

मुस्कान थिर है 

नींद में भी उसकी

माँ को लगता है 

जैसे वर्तमान ने 

भविष्य के हाथों में 

स्वयं को सौंप दिया हो ! 


गुरुवार, जुलाई 6

अव्यक्त

अव्यक्त 

कविता फूटती है 

मन की भाव धरा पर 

सिंचित होती है जब वह 

प्रेम बुंदकियों से 

प्रेम  ! जो फैला है 

कण-कण में परमात्मा की तरह 

पर मिलता नहीं 

तपे बिना 

गहन अभीप्सा की अग्नि में !

कविता भाषा नहीं है  

भाषा की आत्मा है 

जो छुपी रहती है 

अलंकारों और उपमाओं के आवरण में 

एक सूक्ष्म भाव है यह 

जो छू जाता है 

अंतस् को 

ऊष्मा ले जहाँ से 

वाष्पित होता हुआ 

उमड़ आता है

 नि:श्वास  बनकर

और कभी-कभी 

आकार ले लेता है शब्दों का 

वरना तो 

उड़ जाता है आकाश में

अव्यक्त ही !  


बुधवार, अप्रैल 26

कविता खो गई है !

कविता खो गई है !


प्रेम नहीं बचेगा जब जीवन में 

कविता खो जाएगी 

काव्य प्रेम का प्रस्फुटन है 

तुलसी, सूर, कबीर, नानक 

या मीरा हो 

प्रेम के मारे हुए थे 

कोई राम के प्रेम का दीवाना 

कोई कृष्ण का चाकर 

किसी को साहेब रिझाना था 

किसी को ओंकार गाना था 

प्रेम जब भीतर न समाये तो 

काव्य बन जाता है 

चाहे ख़ुद से हो या जगत से 

ख़ुद की गहराई में 

ख़ुदा से हो जाती है मुलाक़ात 

कण-कण में वही नज़र आता  है

इसलिए कविता की फ़िक्र छोड़ दो 

पहले भीतर प्रेम जगाओ 

मन का आँगन जरा बुहारो 

श्रद्धा दीप जलाओ 

प्रियतम की मूरत रखकर 

प्रीत सुगंध बहाओ 

तब फूटेगी काव्य की सरिता 

स्वयं को आप्लावित कर 

जगत में बहेगी 

हर पीड़ा, हर दुख मुस्कुरा कर सहेगी !