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गुरुवार, जुलाई 28

बहुत रुलाते हैं


नार्वे, लीबिया हो या अफगानिस्तान, या अपना भारत, हर देश के निर्दोष आज हिंसा का शिकार हो रहे हैं.... जाने कब होगा इसका अंत.... 



बहुत रुलाते हैं

बहुत रुलाते हैं आतंक का शिकार हुओं के
परिवार वालों के आँसू
जो अखबार के दूसरे पन्ने पर अंकित हैं, सूखे नहीं हैं
वह रुदन और क्रन्दन
जो एक अर्थहीन हत्या से उपजा है
बहुत दंश देता है !

कुकुरमुत्तों की तरह उग आये हैं
हथियार और बीमार मानसिकताएं
छिड़ा है एक अनाम युद्ध
मुल्क दर मुल्क होते हैं निहत्थों पर वार
आतंक और जनतंत्र में टूटे हुए विश्वास
बहुत रुलाते हैं  !

गोली से व्यक्ति नहीं मरता
मरती है आस्था, टूट जाती है
प्यार की अनवरत धारा
बेबसी, पीड़ा झेलने को बाधित
परिवारों के आँसू
बहुत रुलाते हैं !


मंगलवार, जुलाई 26

अर्थहीन


पिछले दिनों नार्वे में जो नरसंहार हुआ उससे पूरा यूरोप ही नहीं सारा विश्व स्तब्ध है. हिंसा का यह तांडव जल्द से जल्द थमना चाहिए...


अर्थहीन

मरना यदि होशोहवास में हो
नातेरिश्तेदारों के मध्य,
एक पूरी उम्र जी लेने के बाद
तभी सार्थक होती है मृत्यु..

यदि बिना कहे चली आये
किसी की गोली पर सवार,
बनाये किसी साजिश का शिकार
तो हत्या होती है,
और हत्या सदा अर्थहीन होती है..

यह अर्थहीन हत्या
डोल रही है
इस धरती पर
हर मुल्क में
जिसका चेहरा इतना विकृत है
कि पहचाना नहीं जाता
बहुरूपिये सी रूप बदल लेती है
यह अर्थहीन  हत्या....