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रविवार, नवंबर 27

घुटने का दर्द

घुटने का दर्द 

उम्र की सीढ़ी चढ़ते चढ़ते 
दर्द की इक सौगात मिली,
जितना जितना किया इलाज 
मर्ज को उतनी हवा मिली 

बचपन का वह कोमल सा तन 
युवा काल का गठा बदन,
प्रौढ़ावस्था भी जाने को 
वृद्ध हुआ न माने मन !

चाल में तेजी वही पुरानी 
नहीं आत्मा कभी बदलती,
शौके-फितरत कायम रहता 
सदा जवां यह भरम पालती !

उसी जुनूँ  ने दर्द दिया यह 
गहरी चोट लगी घुटने में,
चलने-फिरने पर बन्दिश है 
जीवन सिमटा है बस  घर में !

दफ्तर आना-जाना छूटा 
हर दिन ही मानता है संडे,
समय बिताने के सार्थक 
सीख लिए हैं कितने फंडे  !

देह भले न मोबाइल हो 
किन्तु हाथ में मोटोजी  है,
फेसबुक पर हाल बताया 
लाइक  की लंबी  लिस्ट है !

फुर्सत ही फुर्सत है अब तो 
जब भी चाहें तानें लंबी,
घण्टों लैपटॉप पर बैठें 
 मूव न हों पर देखें मूवी !







मंगलवार, अगस्त 16

जन्म दिवस पर


जन्म दिवस पर

कैलेंडर ने याद दिलाया
उम्र की सीढ़ी चढ़ते-चढ़ते
एक कदम है और बढ़ाया !

जाकर जब दर्पण में देखा
बीता बरस भी छोड़ गया है
मुखड़े पर इक अपनी रेखा !

नयन मूंद जब भीतर झाँका
वही पुराने बचपन वाले
मुस्काकर उस “मैं” ने ताका !

कल की ही तो बात है जैसे
कॉलेज से जब घर लौटा था
दिए पिता ने फ़ीस के पैसे !

घर से दूरी, विरह का दुःख
भीतर बिलकुल ही ताजा है 
नई-नई नौकरी का सुख !

जब नन्हे को हाथ थमाया
कैसे भूलूं वह मुस्कान
वह क्रन्दन भी दिल में समाया ! 

मंगलवार, जुलाई 26

अर्थहीन


पिछले दिनों नार्वे में जो नरसंहार हुआ उससे पूरा यूरोप ही नहीं सारा विश्व स्तब्ध है. हिंसा का यह तांडव जल्द से जल्द थमना चाहिए...


अर्थहीन

मरना यदि होशोहवास में हो
नातेरिश्तेदारों के मध्य,
एक पूरी उम्र जी लेने के बाद
तभी सार्थक होती है मृत्यु..

यदि बिना कहे चली आये
किसी की गोली पर सवार,
बनाये किसी साजिश का शिकार
तो हत्या होती है,
और हत्या सदा अर्थहीन होती है..

यह अर्थहीन हत्या
डोल रही है
इस धरती पर
हर मुल्क में
जिसका चेहरा इतना विकृत है
कि पहचाना नहीं जाता
बहुरूपिये सी रूप बदल लेती है
यह अर्थहीन  हत्या....