अब राज छिपा कब तक रखे
कब अपना घूंघट खोलेगा
कब हमसे भी तू बोलेगा,
राधा का तू मीरा का भी
कब अपने सँग भी डोलेगा !
अब राज छिपा कब तक रखे
क्यों रस तेरा मन न चखे,
जब तू ही तू ही सभी जगह
इन नयनों को क्यों न दीखे !
अब और नहीं धीरज बंधता
मुँह मोड़ के क्यों है तू हँसता,
अब बहुत हुआ लुकना-छिपना
तुझ बिन ना अब यह दिल रमता !
जो तू है, सो मैं हूँ, सच है
पर मुझको अपनी खबर कहाँ,
अब तू ही तू दिखता हर सूं
जाती है अपनी नजर जहाँ !
यह कैसा खेल चला आता
तू झलक दिखा छुप जाता है,
पलकों में बंद करूं कैसे
रह-रह कर बस छल जाता है !
