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शुक्रवार, जुलाई 18

तो खिलेगी पाँखुरी

तो खिलेगी पाँखुरी


बांस की इक पोंगरी हम
तुम बजाओ, तो बनेगी बांसुरी

एक बिखरा गीत जैसे
इक अधूरी सी कहानी
क्रम नहीं सतरों में कोई
तुम लिखो, तो बहेगी माधुरी !

चंद श्वासें पास अपने
पल रहे कुछ खास सपने
किस चरण पर हों समर्पित
तुम धरो, तो खिलेगी पाँखुरी !

बांस भी अपना नहीं है
श्वास भी पायी तुम्हीं से
तुम्हें अर्पित शै तुम्हारी
 तुम गहो, तो सधेगी रागिनी !



सोमवार, जून 27

फूल


फूल

फूल, बस खिलना जानता है !

उसे शुभ घड़ी, शुभ दिन की चाह नहीं
सम्पूर्ण हो जाने के बाद वह
 खुदबखुद आँखें खोल देता है...

पांखुरी-पांखुरी खिलता हुआ, अर्पित करता है सुगंध
निस्सीम गगन, उन्मुक्त पवन और धरा के नाम
वह कुछ भी बचाकर नहीं रखता
मुस्कान, रंग और गंध देकर
चुपचाप झर जाता है !

मोहलत नहीं मांगता
क्योंकि वह दाता है, भिक्षुक नहीं
फूल में सौंदर्य है, दर्प नहीं
फूल में औदार्य है, लोभ नहीं

फूल सहज है, जीवन और मृत्यु दोनों में सहज
वह सूरज का ताप और शीत की मार दोनों सहता है
उलाहना नहीं देता
सिफारिश नहीं करता कि उसे राज वाटिका चाहिए
जंगल का एकांत नहीं
उसे निहारो या उपेक्षा करो, वह गांठ नहीं बांधता
देवालय या मरघट दोनों पर चढ़ता है
फूल बस खिलना जानता है !


अनिता निहालानी
२७ जून २०११