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मंगलवार, अक्टूबर 20

गिरें खंडहर हर विकार के

विजयादशमी पर

 हार्दिक शुभकामनाएँ 


एक दशहरा ऐसा भी हो

जल जाए हर कलुष हृदय से,

अहंकार का मुकुट गिरे फिर

भूमि पर श्री राम के शर से !


राम आत्मा का सुशासन हो

धी सीता घर वापस आये,

सजग चेतना ज्योति बने फिर

दीवाली सा उर सज जाए !


मृत हो सारी पूर्व धारणा

पूर्वाग्रही कुंभकर्ण विहत,

अंधानुकरण हर विस्मृत हो

नित्य नवीन चेतना जागृत !


गिरें खंडहर हर विकार के

प्रलय बरसे नूतन सृष्टि हित,

आसक्ति, मोह डोर तोड़कर

उड़े गगन में मानव का चित !


क्रांति घटे हर घर आँगन में

भय के बादल छँटे गगन से,

नीरव विमल व्योम का दर्शन

शरद पूर्णिमा हर जीवन में !

 

गुरुवार, अगस्त 6

माँ और मानव

माँ और मानव  

प्रेम और ज्ञान के तन्तुओं से 

बनी माँ शारदे 

शांति और सुख से भरी

शक्ति अपार धारे 

माँ दुर्गा 

निमग्न आनंद में 

बगिया सी हरी

पुनीता लक्ष्मी ! 


उत्साह कण-कण में समोये 

उदार व तृप्त सदा 

सृजनशील, अभय देती   

कृतज्ञ और सजग 

फूल सी खिली 

ईश्वरी ! 


उनकी ओर हो अपना प्रयाण 

जानें उन्हें और पाएँ वरदान 

मानव ह्रदय की 

यही तो उपलब्धि है 

अंतर में अभाव नहीं 

पूर्ण समृद्धि है !

 


गुरुवार, अप्रैल 30

पशुपतिनाथ सहायक बनते

पशुपतिनाथ सहायक बनते


पशु की नाईं रहता सोया 

असुर यही चाहे मानव से, 

मानव ने साधा है पशु को

बँधा हुआ जाने किस भय से !


बंद रहे घर के बाड़े में 

बस उतने घेरे में घूमें, 

 दूर ले गई रस्सी जितना 

बनी फाँस जो पड़ी गले में !


तन को रोटी मिल जाये बस 

 विचारों की जुगाली मन को,

ज्ञात हुए को फिर-फिर जाने 

 पुन: भोगता भोगे हुए को !


जब संतति ने दी सुविधाएँ 

उनके पीछे पीछे चलता, 

जहाँ नहीं समर्थ वे निकलीं 

अपनी क़िस्मत रहे कोसता !


‘मैं’ की रस्सी पड़ी गले में 

‘मेरे’ का दायरा बनाया, 

अविश्वास का विष है भीतर 

भय से भरा हुआ मन रहता !


या आँखों पर पड़ा आवरण 

या सुविधाओं का प्रलोभ है, 

मद, पाखंड, दिखावा मन में 

झूठमूठ  ही  करे  योग है !


पशु की नाईं जीवन जिसका 

पशुपतिनाथ सहायक बनते, 

वही माँगते हविष अहम् का 

 अंतर पावन भी वह करते !


शनिवार, अप्रैल 11

हल्का होकर उड़े गगन में

हल्का होकर उड़े गगन में 


ख़ुदबुद करती रही चेतना 

धक-धक करता रहा हृदय यह,

उठतीं-गिरती रहतीं लहरें 

लिप्सा कभी, कभी छाया भय !


कितनी चट्टानें थीं भारी 

रस्तों में पावन सलिला के,

राह बनाती उन्हें तोड़ती 

ठुक-ठुक चलती थी अंतर में !


जब अतीत के गट्ठर फेंके 

हल्का होकर उड़े गगन में, 

  फैला था दूर तक सेहरा

मीलों तक थे फूल चमन में !


किसे बिठायें, किसे विदा दें 

मानव को ही तय करना है।

दस्यु घूमते अफ़वाहों के 

दिल का द्वार भिड़ा रखना है !


मंगलवार, अप्रैल 7

माना अभी दूर जाना है

माना अभी दूर जाना है


कितनी पूनम जागेंगे हम

कितने सूरज और देखने, 

 छुपा गर्भ में यह भावी के

किंतु सजा सकते हैं सपने !


वर्तमान की कोख से उपज 

कल का वृक्ष अभी नव अंकुर, 

धूप प्रीत की, जल करुणा का 

सहलायेगा संबल देकर !


माना अभी दूर जाना है 

मानव को विकास के क्रम में, 

पल भर भी अब व्यर्थ न जाये 

 लौटे न पीछे किसी भ्रम में !


 द्वार ज्ञान के खुले हुए जब 

क्यों न दौड़ कर कदम बढ़ायें, 

अंधकार में जग यह खोया

दीप जागरण का ले आयें !

 

गुरुवार, फ़रवरी 12

जीवन

जीवन 


जीवन एक मधुर सुवास सा 

चारों ओर बिखरा है 

मानव ने खोज ली हैं 

हजार तरकीबें उससे बचने की 

वह सरल है, सहज प्राप्य है 

आदमी जटिल बन गया है 

एवरेस्ट पर चढ़ना चाहता है 

पड़ोसी के घर का रास्ता उससे तय नहीं होता 

जहां सुंदर फूल खिलाए हैं जीवन ने 

वह बम बनाकर क्या सिद्ध करना चाहता है 

जीवन बिखरा है 

प्रकृति का हास बनकर

आदमी ने बंद कर लिए हैं अपने कान 

या भर लिए हैं मशीनों की आवाज़ों से 

अथवा तेज फूहड़ संगीत से 

वह होश खोना चाहता है 

जबकि परम होश ही परम आनंद है 

जीवन बिखरा है उजास बनकर  !


शनिवार, दिसंबर 21

अपने में

अपने में 


क्या है 

जिसे मानव खोज रहा है 

धरती क्या कम थी 

अब  ख़ाक  छानने लगा है 

अन्य ग्रहों की भी

बस्तियाँ तक बसाने की सोच रहा है 

क्या पाएगा 

सागर की अतल गहराई में 

या अंतरिक्ष की असीम ऊँचाई में 

क्या है जो उसे 

अपने में नहीं मिल सकता 

सुना है 

 तपस्या करते थे ऋषिगण

और सारा हाल जान लेते थे

 एक जगह बैठे-बैठे 

कहते हैं, 

सब कुछ तो मन में ही है 

मन की गहराई में 

पहले-पहले शोर सुनायी देता है 

फिर संगीत 

उसके बाद अंतहीन सन्नाटा 

फिर भी बढ़ते रहो आगे तो 

भेद खुल जाते हैं 

कोई न कोई देवगण 

राह में मिल जाते हैं 

तृप्त हो जाता होगा मन 

थम जाती होगी सारी खोज 

जो जब चाहा हाज़िर हो जाता होगा 

 भर जाता होगा

 एक मधुर संतोष भीतर 

नयन मुस्काते होंगे 

अधर गाते होंगे 

थिरकते होंगे कदम 

फूल बिखरते होंगे हर तरफ़ 

 नींद आती होगी चैन की

स्वर्ग के आते होंगे 

शायद स्वप्न भी !




शुक्रवार, नवंबर 29

चमक

चमक 


चारों ओर से आकाश ने घेरा है 

धरा नृत्य कर रही है अपनी धुरी पर

और परिक्रमा भी उस सूर्य की 

जिसका वह अंश है  

ऐसे ही 

जैसे जीवन को सँभाला है 

अस्तित्त्व ने 

जैसे रत्न जड़ा हो सुरक्षित अंगूठी में 

आनंद में डोलती हर आत्मा 

परिक्रमा करती है परमात्मा की 

जैसे कृष्ण के चारों ओर राधा 

प्रेम की यह गाथा अनादि है 

और अनंत भी 

कितना भी झुठलाये मानव 

प्रेम उसके भीतर जीवित रहता है

वही चमक है आँखों की 

वही नमक है जीवन का 

प्रेम का वह मोती सागर में गहरे छिपा है 

पर उसकी चमक  

सूरज की रोशनी से ही उपजी है 

ऐसे ही जैसे हर शिशु की मुस्कान में

माँ ही मुस्काती है !



सोमवार, अक्टूबर 7

असली नवरात्रि

असली नवरात्रि 


कामना जगी तो

 धुआँ-धुआँ कर देती है भीतर 

अग्नि आत्मा की बुझ जाती है 

बुझती नहीं तो छुप जाती है !


हर चाह मन के दर्पण पर 

चिपक जाती है 

धूल की परत बन कर 

झलक आत्मा की खो जाती है 

खोती नहीं तो ढक जाती है !


आत्मा का सूरज जहाँ चमकता है 

वहाँ पारदर्शी होता है मन 

अग्नि प्रज्ज्वलित होती है 

पूरे वैभव में 

इच्छा की सुलगती लकड़ियाँ 

कोई धुआँ नहीं देती 

सारे बीज सुख गये होते हैं संस्कारों के 

जो तड़-तड़ कर जलते हैं !


देदीपम्यान होता है भीतर का आकाश 

और यही लक्ष्य है हर मानव का 

फिर भी ख़ुद को भरमाते हैं 

लड़ते और लड़वाते हैं 

माँ को सौंप दें सारी आकांक्षाएँ 

असली नवरात्रि तभी तो मनेगी 

दिल की बगिया 

फिर-फिर खिलेगी !  


गुरुवार, सितंबर 12

सच से नाता तोड़ लिया जब

सच से नाता तोड़ लिया जब

शब्दों में ताक़त होती है 

शब्द अगर सच कहना जानें,

धरती ज्यों सहती आयी है 

संतानें भी सहना जानें !


माटी, जल में विष घोला है 

पनप रही यहाँ  लोभ संस्कृति, 

खनन किया, वन जंगल काटे 

 आयी बुद्धि में भीषण विकृति !


युद्धों के पीछे पागल है 

दीवाना मानव क्या चाहे, 

शिशुओं की मुस्कानें छीनीं 

 रहीं अनसुनी माँ की आहें !


कहीं सुरक्षित नहीं नारियाँ 

वहशी हुआ समाज आज है, 

अनसूया-गार्गी  की धरती 

भयावहता  का क्यों राज है !


कहाँ ग़लत हो गयी नीतियाँ 

भुला दिये सब सबक़ प्रेम के, 

अपना स्वार्थ सधे कैसे भी 

शेष रहें हैं मार्ग नर्क के !


टूट रहे परिवार, किंतु है 

सीमाओं में जकड़ा मानव !

सच से नाता तोड़ लिया जब  

जागा भीतर सोया दानव !


शुक्रवार, मई 3

संबंध

संबंध 


यह जगत एक आईना है ही तो है 

हर रिश्ते में ख़ुद को देखे जाते हैं  

चुकती नहीं अनंत चेतना 

हज़ार-हज़ार पहलू उभर जाते हैं 

जन्म पर जन्म लेता है मानव 

कि कभी तो जान लेगा सम्पूर्ण 

ख़ुद को 

पर ऐसा होता नहीं 

जब तक अनंत को भी 

अनंतता का दीदार नहीं हो जाता 

तब तक बनाता रहता है संबंध 

विचारों, भावों, मान्यताओं 

और व्यक्तियों से 

वस्तुओं, जगहों, मूर्त और अमूर्त से 

यदि प्यार बाँटता है निर्विरोध 

तो भीतर सुकून रहता है 

रुकावट है यदि किसी भी रिश्ते में 

तो ख़ुद का ही दम घुटता है !