बन जाता जब मानसरोवर मन का दर्पण
हंस तैरते हैं स्मृति के
कैलाश के उत्तंग शिखरों पर
थम जाती है जीवन चेतना
नहीं भाता जगत का कोलाहल
उहापोह अंतर की
ठहर जाता है आलोक प्रज्ञा का
अनवरत धारा बनकर
गंगा की लहरों का नर्तन
स्वर्ण रश्मियों का फैलाव
तृप्त हुआ मन
नहीं भासता अल्प अभाव
जग यह घाट सरोवर का ज्यों
जीते मरते पल पल प्राणी
रोते हंसते गाते खाते
चेहरे बदल गये हों जैसे
चलती हो कोई दीर्घ कहानी
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शनिवार, अप्रैल 19
मन का दर्पण
सोमवार, नवंबर 1
आयी जगमग दीवाली
पूर्ण हुआ वनवास राम का
सँग सीता के लौट रहे हैं,
अचरज हुआ लक्ष्मण को लख
द्वार अवध के नहीं खुले हैं !
अब क्योंकर उत्सव यह हो
दीपमालिका नृत्य करे,
रात अमावस की दमके
मंगल, बन्दनवार सजे !
हमने भी तो द्वार दिलों के
कर दिये बंद ताले डाले
राम हमारे निर्वासित हैं
पर अंतरदीप नहीं बाले !
राम विवेक, प्रीत सीता है
दोनों का तो मोल नहीं,
शोर, धुआँ ही नहीं दीवाली
उल्लास का कोई बोल नहीं !
धूम-धड़ाका, जुआ, तमाशा
उत्सव का नहीं करें सम्मान
पीड़ित, दूषित वातावरण है
देव संस्कृति का अपमान !
जलें दीप जगमग हर मग हो
अव्यक्त ईश का भान रहे
मधुर भोज, पकवान परोसें
मनअंतर में रसधार बहे !
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