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बुधवार, जनवरी 19

सच की दुनिया कोमल कितनी !


सच की दुनिया कोमल कितनी !

छा जाये जब सघन अँधेरा
हाथ  हाथ को भी ना सूझे,
राह नजर ना आये कोई
हाले दिल कोई ना बूझे !

भीतर कान लगाये सुनते
बिना रुके ना ही घबराये, 
 यानि अंतर्मन की गुनते
हिम्मत से बस बढ़ते जायें ! 

अभी तो हैं गुम अपने आगे
खुद से भी अनजाने हैं हम,
इसीलिए तो अंधकार है
इस जग से  बेगाने हैं हम !

तिमिर घना यह हो कितना ही
ओढ़ाया गया है हम पर
है असत्य यह एक छलावा
 अनावरण में लगेगा पल भर !

सच तो पिघला पिघला सा है
बहता जाता गति में अपनी,
नहीं आग्रह, नहीं धारणा
सच की दुनिया कोमल कितनी !

अनिता निहालानी
१९ जनवरी २०११