सच की दुनिया कोमल कितनी !
छा जाये जब सघन अँधेरा
हाथ हाथ को भी ना सूझे,
राह नजर ना आये कोई
हाले दिल कोई ना बूझे !
भीतर कान लगाये सुनते
बिना रुके ना ही घबराये,
यानि अंतर्मन की गुनते
हिम्मत से बस बढ़ते जायें !
हिम्मत से बस बढ़ते जायें !
अभी तो हैं गुम अपने आगे
खुद से भी अनजाने हैं हम,
इसीलिए तो अंधकार है
इस जग से बेगाने हैं हम !
तिमिर घना यह हो कितना ही
ओढ़ाया गया है हम पर
है असत्य यह एक छलावा
अनावरण में लगेगा पल भर !
सच तो पिघला पिघला सा है
बहता जाता गति में अपनी,
नहीं आग्रह, नहीं धारणा
सच की दुनिया कोमल कितनी !
अनिता निहालानी
१९ जनवरी २०११