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मंगलवार, अक्टूबर 20

गिरें खंडहर हर विकार के

विजयादशमी पर

 हार्दिक शुभकामनाएँ 


एक दशहरा ऐसा भी हो

जल जाए हर कलुष हृदय से,

अहंकार का मुकुट गिरे फिर

भूमि पर श्री राम के शर से !


राम आत्मा का सुशासन हो

धी सीता घर वापस आये,

सजग चेतना ज्योति बने फिर

दीवाली सा उर सज जाए !


मृत हो सारी पूर्व धारणा

पूर्वाग्रही कुंभकर्ण विहत,

अंधानुकरण हर विस्मृत हो

नित्य नवीन चेतना जागृत !


गिरें खंडहर हर विकार के

प्रलय बरसे नूतन सृष्टि हित,

आसक्ति, मोह डोर तोड़कर

उड़े गगन में मानव का चित !


क्रांति घटे हर घर आँगन में

भय के बादल छँटे गगन से,

नीरव विमल व्योम का दर्शन

शरद पूर्णिमा हर जीवन में !

 

शनिवार, सितंबर 19

वही वही

आकाश 


एक वही अनंत आकाश 

 झरता है जिसमें से परम प्रकाश 

वही आश्रय है हमारा 

उपजे उसी से 

उसी में समा जाएँगे 

कुछ पल डोलेंगे यहाँ 

इंद्रधनुष की तरह 

देखते-देखते विलीन हो जाएँगे !


सागर 


एक वही गहरा सागर 

उसमें उठी एक लहर हैं हम 

कुछ घड़ी सिर पटकेगी फिर 

लौट जाएगी 

उसी की गहराई में 

सो जाएगी !


चेतना 


एक वही परम चेतना  

उधार लेकर थोड़ी सी 

बन गये हैं हम ‘मन’

थोड़ी देर सोचेगा, समझेगा 

सीखेगा, सिखायेगा 

फिर उसी में खो जाएगा !



शनिवार, सितंबर 12

लोक चेतना में बसते हैं

गणपति उत्सव 


श्रीगणेश कारण हैं सबके 

मिट्टी, गोबर से भी रच लो, 

दूर्वा का तिनका कर अर्पण  

छोटा सा मोदक ही धर दो !


बहुत सरल, शुभता के दाता 

कर्ण विशाल व आँखें गहरी,

ज्ञानी, बली  नृत्य भी जानें 

सब कलाओं के हैं पारखी !


एक मुक्त आकाश की भाँति 

गणपति प्रेम का बाना ओढ़े, 

सुखकर्ता, दुखहर्ता, पालक

 बन कर आते अतिथि अनोखे !

  

लोक चेतना में बसते हैं 

एक अनूठा हर्ष जगाते, 

भेद भावना तज कर सारे 

छोटे-बड़े सभी मिल गाते ! 


मोदक भाते गणनायक को 

है आमोद-प्रमोद प्रिय जिनको, 

घर, दुकान कहीं भी बसा दो 

विशालकाय, शुभ तुंडकाय को !


गजमस्तक मुख सबसे सुंदर 

लंबोदर औ" मूषक वाहन, 

अद्भुत अति सिखावन उनकी 

साधें हर हाल में संतुलन !


खुलकर, हँसकर, गाकर जीओ 

पाठ सिखाते सहज प्रेम का,  

हर नेत्र में अश्रु होते जब 

समय आ गया हो विदा का ! 


सर्जन और विसर्जन दोनों 

जीवन में सदा संग विचरते, 

गणपति उत्सव यही सिखाता 

मिट-मिट कर हम पुनः जन्मते !

 

शनिवार, जनवरी 31

कोई

 

कोई 
एक नीड़ है जग यह सारा
कोई समेटे है अपने पंखों की आंच में
और पोषता है जीवन को अहर्निश
चेतना की अखंड धार से
कोई रखे है आँख अपनी सन्तान पर
उड़ने का देता है हर अवसर
देखता रहता है हर छलांग आह्लाद से
प्रसन्न होता, जब भर जाता है आसमान गुंजार से !

गुरुवार, मई 22

देवी कवच

देवी कवच 


शैलपुत्री सी अडिग हो 

नित ब्रह्म में विचरण करे, 

चन्द्र ज्योति निनाद घंटा 

शुभ चेतना धारण करे !


स्कन्द जैसी वीरता हो 

कात्यायनी सी मधुर छवि, 

  कालरात्रि सी अति भीषण

गौरी माता सी हो द्युति !


सिद्धिदात्री हो प्रदाता 

चेतना पावन बनेगी,  

हर काल औ’ हर देश में 

सत्य का साधन बनेगी ! 


जगे प्राणशक्ति बन प्रबल 

उर भाव सारे शुद्ध हों, 

मन समर्पित हों हमारे 

सभी सर्वदा प्रबुद्ध हों !


हर दिशा में वह हमारा

मार्ग दर्शन मंगल करें,  

देवी कवच सी बन सदा  

नित भक्ति की रक्षा करें !


रविवार, फ़रवरी 16

गहराई

गहराई 


चेतना जुड़ती है जगत में 

इससे-उससे 

लोगों, विचारों 

क्रिया और वस्तुओं से 

शायद कुछ भरना चाहती है 

नहीं जानती 

भीतर अंतहीन गहराई है 

जो नहीं भरी जा सकती 

किसी भी शै से 

इसी कोशिश में 

कुछ न कुछ पकड़ लेता है मन 

और जिसे पकड़ता 

वह जकड़ लेता है 

फिर छूटने उस जकड़न से 

साधता है वैराग्य 

ऐसे ही बनता है

 मानव का भाग्य !



गुरुवार, दिसंबर 19

स्वतंत्रता

स्वतंत्रता


मुक्त चेतना 

उड़ जाती है अनंत की ओर 

अब कल्पनाओं की दीवार 

आड़े नहीं आती 

भरभरा कर गिर जाती है 

जैसे हवा में उठा रेत का महल 

अंततः वह एक छाया ही तो है !

 

उस असीम को 

अनुभव करके ही 

होती है तृप्त 

अनायास ही चेतना !


पंछी के पैरों में ज़ंजीरें नहीं बंधी 

वह चाहे तो उड़ सकता है 

पिंजरा खुला है 

हर बंधन ढीला है 

एक भ्रम है 

 स्वतंत्र है हर आत्मा

स्वतंत्रता उसका 

जन्मसिद्ध अधिकार है !



सोमवार, मई 13

निर्मल बुद्ध चेतना लेकर


निर्मल बुद्ध चेतना लेकर
एक समन्दर विमल शांति का
एक बगीचा ज्यों पुष्पों का,
एक अनंत गगन सम विस्तृत
मौन एक पसरा मीलों का !

दिवस अवतरण का पावन है
बरसों पूर्व धरा पर आये,
निर्मल बुद्ध चेतना लेकर
भारत धरती पर मुस्काए !

शैशव काल से ही भक्ति का
बीज अंकुरित था अंतर में,
लाखों जन की पीड़ा हर लूँ
यह अंकित था कोमल उर में !

कड़ी तपस्या बरसों इस हित
सहज ध्यान में बैठे रहते,
जग को क्या अनमोल भेंट दूँ
इस धुन में ही खोये रहते !

ख़ुद कुछ पाना शेष नहीं था
तृप्त हुआ था कण-कण प्रभु से,
चिन्मय रूप गुरू का दमके
पोर-पोर भीगा था रस से !

परम क्रिया की कुंजी बाँटी 
राज दिया भीतर जाने का,
छुपा हुआ जो प्रेम हृदय में
मार्ग दिया उसको पाने का !

सद्गुरु को शत-शत प्रणाम हैं
कृपा बरसती है नयनों से,
शब्द अल्प हैं क्या कह सकते
तृप्ति झरे सुंदर बयनों से !

लाख जन्म लेकर भी शायद
नहीं उऋण हो सकता साधक,
गुरू की इक दृष्टि ही जिसको
करती पावन जैसे पावक !



मंगलवार, नवंबर 1

नव भारत का निर्माण करें

नव भारत का निर्माण करें 


स्वर्णिम युग इस भू पर लाने 

योग धर्म का ध्वज लहराने, 

व्यर्थ जले,  रहे शेष सार्थक

मिलकर हम यही प्रयास करें !


नव भारत का निर्माण करें !


तोड़ें हर गढ़ रूढ़िवाद का 

कट्टरता औ' मिथ्या हठ का, 

झूठे दुर्ग, क़िले जो भीतर 

मतान्धता के सम्पूर्ण गिरें !


नव भारत का निर्माण करें !


नए हृदय की कोमल भू पर 

चट्टानों सम निर्णय लेकर,  

शिव जैसे कैलाश विराजें 

मानवता  उच्च  उड़ान भरे !


नव भारत का निर्माण करें !


किसने रोका है कदमों को 

स्वार्थ हृदय से झर जाने को,  

प्रतिपल बने चेतना पावन 

शुभ मुल्यों  का सम्मान करें !


नव भारत का निर्माण करें !


शुक्रवार, जुलाई 15

यह पल

यह पल 


जो अनंतानंत ब्रह्माडों का स्वामी है 

वही भीतर ‘मैं’ होकर बैठा है 

 एक होकर मानो दो में बंट गया है 

समय अखंड है, अखंड है चेतना

जैसे जीवन अखंड है 

जन्म-मृत्यु, प्रकाश-छाया, 

जगत-जगदीश्वर  

भेद सारे माया ने दिखाए !

हर नया पल बन सकता है बीज 

आने वाले हजार पलों का जन्मदाता 

यदि जाग जाये कोई इस पल में 

तो धीरे से वह अनंत मन को छू जाता 

न जाने किस श्वास में 

वर्तमान का एक पल

प्रेम की डाली से झरे फूल की तरह 

भर जाये विश्वास की सुवास 

या सीप में गिरी 

मोती बनने को उत्सुक बूँद की तरह 

छू जाए अंतर का आकाश !

शनिवार, फ़रवरी 19

चलना है हमको नव पथ पर

 चलना है हमको नव पथ पर 

देश, प्रदेश, शहर, गाँव सभी 

बुला रहे हैं हसरत भर कर,  

हाथ मिला लें, कदम बढ़ा लें 

चलना है हमको नव पथ पर  !


माना लंबी राह सामने 

निकल पड़ें हम साथ डगर पर, 

इक दूजे का हाथ थामते 

सारा जग लगता आँगन घर !


बनें चेतना की चिंगारी 

जगमग दीप जलाएँ मिलकर, 

ज्योति उस करुणामयी माँ की

चलती फिरती आग बनें फिर !

 

भस्म करे सारी भय बाधा 

पथ प्रशस्त कर दे जीवन का, 

बाहर भीतर भेद मिटा दे 

 पावन वही प्रकाश बनें हम !


चाहे दुःख  की ज्वालाएँ हों 

 शीतल सावन हो अंतर में, 

जो न कभी कम हो बहने से 

नयनों का उल्लास बनें हम !


मंगलवार, जनवरी 25

एक चेतना की डोरी से

एक चेतना की डोरी से 

 विजयगान गूँजे दुनिया में 

जय हिंद ! जय भारत न्यारा !

दिप-दिप दमक रहा गौरव से

महिमा मंडित भाल तुम्हारा !


युग-युग से करते आये हो 

संगम चिन्मय आदर्शों का, 

बहती आयी गंगा में नित 

ज्ञान, भक्ति व कर्म की धारा !


सदा सत्य के रहे पुजारी 

उपनिषदों का शुभ ज्ञान दिया, 

कोटि-कोटि जनों ने मिलकर 

सदा दिया उत्कर्ष का नारा ! 


एक चेतना की डोरी से 

बँधा हुआ हर भारत वासी, 

भिन्न बोलियाँ, भिन्न प्रांत हैं 

जुड़ा हुआ है भाग्य हमारा !


भारत माता की संतानें 

उसके हित कर्त्तव्य निभातीं, 

 दुश्मन आँख उठा भर देखे 

वीर सैनिकों ने ललकारा !



सोमवार, नवंबर 22

खिला-खिला मन उपवन होगा

खिला-खिला मन उपवन होगा 


एक अनेक हुए दिखते हैं 

ज्यों सपने की कोई नगरी, 

मन ही नद, पर्वत बन जाता 

एक चेतना घट-घट बिखरी !


कैसे स्वप्न रात्रि में देखें 

कुछ खुद कुछ अज्ञात तय करे, 

जीवन में भी यही घट रहा 

जगकर देखें कहाँ खो गए !


एक जागरण नित्य प्रातः में 

स्वप्नों से जो मुक्ति दिलाए, 

परम जागरण ऐसा भी है 

जीते जी यह जग खो जाए !


एक तत्व में टिकना हो जब 

जीवन तब क्रीडाँगन होगा, 

अपने हाथों दुःख कब बोए 

खिला-खिला मन उपवन होगा !


जिस क्षण थामी बागडोर निज 

सुख-दुःख की ज़ंजीरें टूटीं, 

इक ही अनुभव व्यापा मन में 

समता उपजी ममता छूटी !