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बुधवार, जून 4

अपना सा दर्द




अपना सा दर्द 

फिर वही झूला, वही ढलती हुई शाम है
कई दिनों बाद मिली दिल को फुर्सत, आया आराम है
आसमां चुप है सलेटी सी चादर ओढ़े
पेड़ खामोश है, हवा भी बंद, नहीं कोई धुन छेड़े
एक खलिश सी भीतर कोई अपना बीमार है
दुआ के सिवा दे न सकें कुछ ये हाथ लाचार हैं
लो एक कार की रफ्तार से पत्तों में हरकत आयी
हिल-हिल के जैसे भेज रहे उसे दवाई
जीवन है तभी तक दिल धड़कते हैं
रोते हैं, हँसते हैं साथ बड़े होते हैं
दो हैं कहाँ जो कोई असर हो दिल पे किसी की बात का
दो हैं कहाँ जो दूजा लगे, अपना सा दर्द है जज्बात का
दुःख कहने से जो भीतर कसक उठती है वह अहम है
या कोई आजमाया हुआ वहम है

शनिवार, जुलाई 1

यदि मुक्त हुआ चाहो



यदि मुक्त हुआ चाहो


जो दर्द छुपा भीतर

खुद तुमने उसे गढ़ा, 

नाजों से पाला है

खुद उसको किया बड़ा !


तुमने ही माँगा है

ऊर्जा पुकारी है,

यदि मुक्त हुआ चाहो

अभिलाष  तुम्हारी है !


हम ही कर्ता-धर्ता

हमने ही भाग्य रचा,

अजाने में ही सही

दुःख भरी  लिखी ऋचा !


अब हम पर है निर्भर

यह दांव कहाँ खेलें,

जीवन शतरंज बिछा

कैसे यह चाल चलें !


सुख की यदि चाह तुम्हें

कुछ बोली लग जाये, 

क्या कीमत दे सकते

यह सर भी कट जाये !


शनिवार, अक्टूबर 15

जीवन शतरंज बिछा

जीवन शतरंज बिछा


जो दर्द छुपा भीतर 

खुद हमने गढ़ा जिसको, 

नाजों से पाला है 

स्वयं बड़ा किया उसको !


हमने ही माँगा है 

ताकत यह हमारी है, 

यदि मुक्त हुआ चाहो 

मर्जी यह हमारी है !


हम ही कर्ता-धर्ता 

हमने यही भाग्य रचा, 

अनजाने में दिल पर 

दुःख वाली लिख दी ऋचा !


अब हम पर है निर्भर

नया दांव कहाँ खेलें, 

जीवन शतरंज बिछा

कैसे नयी चाल चलें !


सुख की यदि चाह हमें 

बोली तो लगाएँ अब,

क्या कीमत दे सकते

यह सर तो गवाएँ अब !


गुरुवार, जुलाई 22

एक चिंगारी असल की

एक चिंगारी असल की 

दर्द भीतर सालता जो 

प्रेम बनकर वह बहेगा,  

भूल चुभती शूल बनकर 

पंक से सरसिज खिलेगा !


खोल दो हृदय को अपने 

जब साथ है रहबर खड़ा, 

लक्ष्य अपना एक हो तो 

विष  यहाँ अमीय बनेगा !


परख लो हर बात अपनी 

बनी हो चाहे बिगड़ती,  

सत्य का दामन न छोड़ा 

झूठ फिर कब तक टिकेगा !


सौ भ्रमों से ढका हो मन 

ज़िंदगी आसान लगती, 

एक चिंगारी असल की 

खेल फिर कब तक टिकेगा !


हुआ सच से सामना जब 

नहीं कोई ठौर मिलता, 

नींद स्वप्नों से भरी हो 

जागना इक दिन पड़ेगा !




गुरुवार, मार्च 4

आने वाला है महिला दिवस

आने वाला है महिला दिवस 


मात्र नारी शक्ति का प्रतीक नहीं है 

बल्कि  याद दिलाता है यह दिवस कि 

अभी भी हो रहे हैं उनपर अत्याचार 

इक्कसवीं सदी में भी हो रहा है आए दिन ही 

उनके साथ दुर्व्यवहार 

अखबार के पन्नों पर तो कुछ ही खबरें आ पाती हैं 

मगर उन खबरों की हकीकत भीतर तक डरा जाती है 

महिलायें क्या-क्या कर रही  हैं 

यह तो जग जाहिर है 

मात्र उसे न दोहराएं 

बल्कि एक वंचित नारी के अधिकारों को याद कराएं !

आज के दिन प्रशंसा सुनकर अपनी 

स्वयं की पीठ न थपथपायें 

जो महिलायें अभी भी कुचली जाती हैं 

उनके दर्द को भी बाहर लाएं !

महिला दिवस कोई उपलब्धि नहीं है नारी के लिए 

एक चुनौती है 

नन्ही बच्चियों से लेकर बुजुर्ग माताएं तक 

होती हैं जहाँ  हिंसा व अपमान का शिकार 

हर उस बात को बाहर लाना है 

समाज को आईना दिखाना है !

जायदाद में अधिकार से वंचित रखा गया 

सदियों तक महिलाओं को 

नहीं था वोट देने का अधिकार 

न ही शिक्षा का 

 योगदान का जिक्र कहाँ होता है उस अनाम स्त्री  के

जो हर बार मिलती रही है एक सफल पुरुष के पीछे 

इस महिला दिवस पर यही मनाएं कि  

हर वर्ग की स्त्री समानता का अधिकार पाए !


गुरुवार, दिसंबर 24

अब जब कि

अब जब कि

अब जब कि हो गयी है सुबह 
क्यों अंधेरों का जिक्र करें, 
चुन डाले हैं पथ से कंटक सारे 
क्यों पावों की चुभन से डरें !
अब जब कि छाया है मधुमास 
अँधेरी सर्द रातों को भूल ही जाएँ, 
खिले हैं फूलों के गुंचे हर सूं
क्यों दर्द को गुनगुनाएं !
अब जब कि धो डाला है मन का आंगन 
आँधियां धूल भरी क्यों याद रहें,
सुवासित है हर कोना वहाँ 
क्यों कोई फरियाद आये ! 
अब जब कि हो गया है मिलन 
विरह में नैन क्यों डबडबायें 
बाँधा है बंधन अटूट एक 
भय दूरी का क्यों सताए ! 

 

गुरुवार, जुलाई 16

माया

माया 


कभी दर्द दिया 
कभी मुस्कानें
कभी रोये औरों के दुःख पर 
फिर दिए उन्हीं को ही ताने
कभी राह दिखाई मंजिल की 
कभी मन में  संशय भर डाला
कभी रोका जिस पथ चलने से 
फिर उसका पता बता डाला ! 
रिश्तों की ऐसी माया है 
कोई पार निकल कर ही जाने 
यह निज कर्मों की खेती है 
सुख-दुःख के बोये थे दाने !


गुरुवार, अप्रैल 30

अलविदा इरफ़ान

अलविदा इरफ़ान 

जब हजारों जीवन ज्योतियाँ रोज बुझ रही हों 
महामारी ने मजबूती से अपने पैर पसार लिए हों विश्व में 
दूर तक छाए हों अनिश्चय के बादल 
तो मन उम्मीद के सहारे स्वयं को संभाले रहता है 
गाता है आशा के गीत 
नकार देना चाहता है मृत्यु की आती हुई हर आहट
और दूर कहीं सो जाती हुआ जिंदगियों से 
उसका नाता ही नहीं बनने देता 
पर जब एक कोई अपना चला जाता है जहान से 
जिसकी आँखों में झाँका था 
जिसकी मुस्कान को सराहा था 
जिसके दर्द को महसूस किया था 
जिसकी सादगी और दिल की साफगोई पर 
कुर्बान हुए थे 
जो कभी खलनायक होकर भी नायक पर भारी था 
उस कलाकार की मौत पर 
सभी गमगीन नजर आते हैं 
हम उन्हीं के लिए अश्रु बहाते हैं 
जिनसे बन जाते दिल के नाते हैं !

मंगलवार, मार्च 17

कोरोना ने दी दस्तक



कोरोना ने दी दस्तक 

हर दर्द कुछ सिखाता है 
सोते को जगाता है,
अंतहीन मांगों पर 
अंकुश भी लगाता है !

कोरोना ने दी दस्तक 
घूँट कड़वे पिलाता है,
अति सूक्ष्म दुश्मन यह 
नजर नहीं आता है !

कोशिकाओं में जाकर 
निज व्यूह रचाता है, 
फेफड़ों को दुर्बल कर 
रोगी को सताता है !

प्रकृति की सीख नई 
मन सीख कहाँ पाता है, 
गर्वीला, भोला भी ?
दुःख ही बनाता है !

खुद से जो दूर हुआ 
कहाँ यह निकल गया, 
भीतर ही चैन है 
भेद यह भुलाता है !

दौड़ अब यह शांत हो 
थमो, नहीं क्लांत हो, 
घर लौट चलो अब तो  
यह राज भी बताता है! 

साँझी है पीड़ा अब 
संवेदना जगाता है, 
दुनिया को सही माने
एक घर बनाता है !


रविवार, जनवरी 19

व्यक्ति या अभिव्यक्ति


व्यक्ति या अभिव्यक्ति 


अव्यक्त जब व्यक्त होता है शक्ति के साथ कहलाता है व्यक्ति और तब अहंकार का जन्म होता है सीमाएं बनती हैं जब व्यक्ति मात्र एक अभिव्यक्ति बन जाये उस अव्यक्त की तो जन्मता है मोक्ष टूट जाती हैं सारी सीमाएं ! पृथ्वी जब व्यक्त होती हैं देशों के माध्यम से तो युद्धों का जन्म स्वाभाविक है जैसे मानव ने गढ़ लिए हैं एक भूमि पर अनेक देश वैसे ही नहीं क्या एक ब्रह्म में अनेक जगत एक को जिसने पहचान लिया वह मुक्त हुआ वही भागीदार बना उस अनन्त सत्य का एकत्व का अनुभव किया वृक्षों, पर्वतों, गगन, अनल, पवन के संग एक में सबको, सबमें एक को देखो कृष्ण ने यही तो गाया है एक ही प्रेम, एक ही दर्द हर दिल में समाया है एक ही सत्य को अनेक रूपों में दर्शाया है हर बुद्ध ने इसी पथ पर चलाया है !

गुरुवार, जून 6

कभी ख़ुशी कभी गम



कभी ख़ुशी कभी गम


तन जाती हैं शिराएँ जब भी सिर की
खो जाता है पल भर को चैन भी मन का
जाने कितना गहरा दर्द है या अहंकार भारी
बिसर जाती है किन्हीं परिस्थितियों में
सारी की सारी होशियारी...

प्रकृति सिखाये जाती है पाठ नित नये
हम हैं कि पिछला पढ़ा रोज भुला देते हैं
फिसड्डी छात्र की तरह
फिर अध्यापक की तरफ हाथ बढ़ा देते हैं !

वह भी असीम धैर्यशाली है सिखाये जाएगी
जब तक भेजे में सच्ची बात नहीं समाएगी
हार नहीं मानेगी वह इतना तो तय है
अब, तब तक हमें जलना है
जब तक मन में भय है..

जिस दिन खो जाएँगी सारी सीमाएं
अहंकार पिघल जायेगा
खुद में ही सारा आलम नजर आ जायेगा
उस दिन वह भी विदा ले लेगी
मुस्कुराते हुए
तब तक रहना है मन को
कभी ख़ुशी कभी गम के गीत गाते हुए..

शनिवार, फ़रवरी 24

राग अनंत हृदय ने गाया


राग अनंत हृदय ने गाया



मन राही घर लौट गया है
 पा संदेसा इक अनजाना,
नयन टिके हैं श्वास थमी सी
एक पाहुना आने वाला !

रुकी दौड़ तलाश हुई पूर्ण
आनन देख लिया है किसका,
निकला अपना.. पहचाना सा
जाने कैसे बिछड़ गया था !

कदर न जानी जान पराया
व्यर्थ दर्द के दामन थामे,
एक ख़ुशी भीतर पलती थी
जाने क्यों मुख मोड़ा उससे !

रसभीनी ज्यों पगी मधुक में
इक मनुहार छुपी थी मन में,
जिसकी खातिर आँखें बरसीं
वह झंकार बसी कण-कण में !

द्वार खुले अब दिल के ऐसे
भरा समन्दर, गगन समाया,
सिमट गयीं सारी सीमाएं
राग अनंत हृदय ने गाया !

नयन न खुलते जग फीका सा
मदिर-मदिर रस कोई घोले,
मौन की गूँज सुनी है जबसे 
चुप रहें अधर भेद न खोलें ! 

शुक्रवार, अक्टूबर 13

जिन्दगी हर पल बुलाती



जिन्दगी हर पल बुलाती

किस कदर भटके हुए से
राह भूले चल रहे हम,
होश खोया बेखुदी में
लुगदियों से गल रहे हम !

रौशनी थी, था उजाला
पर अंधेरों में भटकते,
जिन्दगी हर पल बुलाती
अनसुनी हर बार करते !

चाहतों के जाल में ही
घिरा सा मन बुने सपना,
पा लिये जो पल सुकूं के
नहीं जाना मोल उनका !

दर्द का सामां खरीदा
ख़ुशी की चूनर ओढ़ाई,
विमल सरिता बह रही थी
पोखरी ही उर समाई !

भेद जाने कौन इसका
बात जो पूरी खुली है,  
मन को ही मंजिल समझते
आत्मा सबको मिली है !


रविवार, नवंबर 27

घुटने का दर्द

घुटने का दर्द 

उम्र की सीढ़ी चढ़ते चढ़ते 
दर्द की इक सौगात मिली,
जितना जितना किया इलाज 
मर्ज को उतनी हवा मिली 

बचपन का वह कोमल सा तन 
युवा काल का गठा बदन,
प्रौढ़ावस्था भी जाने को 
वृद्ध हुआ न माने मन !

चाल में तेजी वही पुरानी 
नहीं आत्मा कभी बदलती,
शौके-फितरत कायम रहता 
सदा जवां यह भरम पालती !

उसी जुनूँ  ने दर्द दिया यह 
गहरी चोट लगी घुटने में,
चलने-फिरने पर बन्दिश है 
जीवन सिमटा है बस  घर में !

दफ्तर आना-जाना छूटा 
हर दिन ही मानता है संडे,
समय बिताने के सार्थक 
सीख लिए हैं कितने फंडे  !

देह भले न मोबाइल हो 
किन्तु हाथ में मोटोजी  है,
फेसबुक पर हाल बताया 
लाइक  की लंबी  लिस्ट है !

फुर्सत ही फुर्सत है अब तो 
जब भी चाहें तानें लंबी,
घण्टों लैपटॉप पर बैठें 
 मूव न हों पर देखें मूवी !







शुक्रवार, दिसंबर 12

इक अकुलाहट प्राणों में

इक अकुलाहट प्राणों में


इक दर्द की चाहत की है
जो मन को बेसुध कर दे,
कुछ कहने, कुछ न कहने
दोनों का अंतर भर दे !

इक पीड़ा मांगी उर ने
जो भीतर तक छा जाये,
फिर वह सब जो आतुर
है, आने को बाहर आये !

इक बेचैनी सी हर पल
मन में सुगबुग करती हो,
इस रीते अंतर्मन का
कुछ खालीपन भरती हो !

इक अकुलाहट प्राणों में
इक प्यास हृदय में जागे,
सीधे सपाट मरुथल में
चंचल हरिणी सी भागे !


गुरुवार, जून 19

मधुर अमराई में बदले


मधुर अमराई में बदले


थामता है हर घड़ी वह
जो बरसता प्रीत बनकर,
खोल देता द्वार दिल के
फिर सरसता गीत बन कर !

हर नुकीले रास्ते को
मृदु गोलाई में बदले,
कंटकों से जो भरी थी
मधुर अमराई में बदले !

मरहम रखता दर्द हरता
हर कदम पर साथ देता,
पोंछ देता दुःख इबारत
या नये से अर्थ देता !

बूंद बनकर जो मिला था
सिन्धु सा वह बढ़े आता,
रोशनी की इक किरण था
बन उजाला चढ़े आता !

दूर से था जो पुकारे
बस गया है दिल में आके,
डाल डेरा और डंडा
पा गया हो ज्यों ठिकाने !