बुधवार, जून 4
अपना सा दर्द
शनिवार, जुलाई 1
यदि मुक्त हुआ चाहो
यदि मुक्त हुआ चाहो
जो दर्द छुपा भीतर
खुद तुमने उसे गढ़ा,
नाजों से पाला है
खुद उसको किया बड़ा !
तुमने ही माँगा है
ऊर्जा पुकारी है,
यदि मुक्त हुआ चाहो
अभिलाष तुम्हारी है !
हम ही कर्ता-धर्ता
हमने ही भाग्य रचा,
अजाने में ही सही
दुःख भरी लिखी ऋचा !
अब हम पर है निर्भर
यह दांव कहाँ खेलें,
जीवन शतरंज बिछा
कैसे यह चाल चलें !
सुख की यदि चाह तुम्हें
कुछ बोली लग जाये,
क्या कीमत दे सकते
यह सर भी कट जाये !
शनिवार, अक्टूबर 15
जीवन शतरंज बिछा
जीवन शतरंज बिछा
जो दर्द छुपा भीतर
खुद हमने गढ़ा जिसको,
नाजों से पाला है
स्वयं बड़ा किया उसको !
हमने ही माँगा है
ताकत यह हमारी है,
यदि मुक्त हुआ चाहो
मर्जी यह हमारी है !
हम ही कर्ता-धर्ता
हमने यही भाग्य रचा,
अनजाने में दिल पर
दुःख वाली लिख दी ऋचा !
अब हम पर है निर्भर
नया दांव कहाँ खेलें,
जीवन शतरंज बिछा
कैसे नयी चाल चलें !
सुख की यदि चाह हमें
बोली तो लगाएँ अब,
क्या कीमत दे सकते
यह सर तो गवाएँ अब !
गुरुवार, जुलाई 22
एक चिंगारी असल की
एक चिंगारी असल की
प्रेम बनकर वह बहेगा,
भूल चुभती शूल बनकर
पंक से सरसिज खिलेगा !
खोल दो हृदय को अपने
जब साथ है रहबर खड़ा,
लक्ष्य अपना एक हो तो
विष यहाँ अमीय बनेगा !
परख लो हर बात अपनी
बनी हो चाहे बिगड़ती,
सत्य का दामन न छोड़ा
झूठ फिर कब तक टिकेगा !
सौ भ्रमों से ढका हो मन
ज़िंदगी आसान लगती,
एक चिंगारी असल की
खेल फिर कब तक टिकेगा !
हुआ सच से सामना जब
नहीं कोई ठौर मिलता,
नींद स्वप्नों से भरी हो
जागना इक दिन पड़ेगा !
गुरुवार, मार्च 4
आने वाला है महिला दिवस
आने वाला है महिला दिवस
मात्र नारी शक्ति का प्रतीक नहीं है
बल्कि याद दिलाता है यह दिवस कि
अभी भी हो रहे हैं उनपर अत्याचार
इक्कसवीं सदी में भी हो रहा है आए दिन ही
उनके साथ दुर्व्यवहार
अखबार के पन्नों पर तो कुछ ही खबरें आ पाती हैं
मगर उन खबरों की हकीकत भीतर तक डरा जाती है
महिलायें क्या-क्या कर रही हैं
यह तो जग जाहिर है
मात्र उसे न दोहराएं
बल्कि एक वंचित नारी के अधिकारों को याद कराएं !
आज के दिन प्रशंसा सुनकर अपनी
स्वयं की पीठ न थपथपायें
जो महिलायें अभी भी कुचली जाती हैं
उनके दर्द को भी बाहर लाएं !
महिला दिवस कोई उपलब्धि नहीं है नारी के लिए
एक चुनौती है
नन्ही बच्चियों से लेकर बुजुर्ग माताएं तक
होती हैं जहाँ हिंसा व अपमान का शिकार
हर उस बात को बाहर लाना है
समाज को आईना दिखाना है !
जायदाद में अधिकार से वंचित रखा गया
सदियों तक महिलाओं को
नहीं था वोट देने का अधिकार
न ही शिक्षा का
योगदान का जिक्र कहाँ होता है उस अनाम स्त्री के
जो हर बार मिलती रही है एक सफल पुरुष के पीछे
इस महिला दिवस पर यही मनाएं कि
हर वर्ग की स्त्री समानता का अधिकार पाए !
गुरुवार, दिसंबर 24
अब जब कि
क्यों अंधेरों का जिक्र करें,
चुन डाले हैं पथ से कंटक सारे
क्यों पावों की चुभन से डरें !
अब जब कि छाया है मधुमास
अँधेरी सर्द रातों को भूल ही जाएँ,
खिले हैं फूलों के गुंचे हर सूं
क्यों दर्द को गुनगुनाएं !
अब जब कि धो डाला है मन का आंगन
आँधियां धूल भरी क्यों याद रहें,
सुवासित है हर कोना वहाँ
क्यों कोई फरियाद आये !
अब जब कि हो गया है मिलन
विरह में नैन क्यों डबडबायें
बाँधा है बंधन अटूट एक
भय दूरी का क्यों सताए !


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