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गुरुवार, फ़रवरी 10

हँसना मना है


 
ए जी,खायेंगे न ?

“ए जी, चलेंगे न” की जब
श्रीमती ने लगाई पांचवी बार गुहार
तो झकमार, जूता पहन, श्रीमान
हो गए सांध्य भ्रमण को तैयार !

साथ ही चलने लगा अंतर्मन में
धाराप्रवाह सोचविचार,
कुछ स्वास्थ्य पत्रिकाओं का असर
कुछ आस-पड़ोस का देख व्यवहार
रोज-रोज चढ़ने लगा है  
श्रीमती जी को टहलने का बुखार !

कहाँ गए वे दिन
जब रहा करतीं थीं व्यस्त,
बनाने में पापड़ और अचार
और इत्मीनान से चाय पीते
वह पढ़ा करते थे अखबार !

आज जिसे देखो वजन घटाने में लगा है
सेहत का हो रहा है गर्म बाजार
या फिर वजन नहीं उम्र घटाना चाहते हैं लोग
बुढ़ापे में हो जाता है अक्सर
जिंदगी से दुगना प्यार !

लगा विचारों को ब्रेक,
सामने आ गयी थी एक कार
पत्नी ने टोका, “कहाँ खो गए सरकार ?”
देखा कनखियों से, आ गया था
अचानक उनके चेहरे पर निखार !     

नजर दौड़ाई तो दिखा एक ठेले वाला
कर रहा था जो गोलगप्पों का व्यापार
एजी, खायेंगे न, आँखों ही आँखों में
पढ़ लिया श्रीमती का इसरार !

अनिता निहालानी
१० फरवरी २०११  



बुधवार, फ़रवरी 2

कुछ इधर की कुछ उधर की

कुछ इधर की कुछ उधर की

लोकतंत्र
लोकतंत्र का हुजूर असल अर्थ है यही
लोग अपने हों यदि, तन्त्र अपना हो गया !

जान पहचान के हैं हजार फायदे
अर्जियां धरी रहीं, यूँ ही काम हो गया !

दे दिला दिया उन्हें चाय-पानी वास्ते
हफ्ते भर से था खराब, फोन ठीक हो गया !

एब्स्ट्रैक्ट आर्ट

निकले जो सर के ऊपर महान है वह रचना
हैरान करके छोड़े, आलीशान है वह रचना !

जो उलटी है या सीधी पहचानना हो मुश्किल
इंसान या गधे की, यह जानना हो मुश्किल !

वह कलाकृति अमर है जो हो परे अकल से
लाखों में वह बिकेगी, टेढ़ी हो जो शकल से !

अनिता निहालानी
२ फरवरी २०११