शनिवार, जनवरी 31

कोई

 

कोई 
एक नीड़ है जग यह सारा
कोई समेटे है अपने पंखों की आंच में
और पोषता है जीवन को अहर्निश
चेतना की अखंड धार से
कोई रखे है आँख अपनी सन्तान पर
उड़ने का देता है हर अवसर
देखता रहता है हर छलांग आह्लाद से
प्रसन्न होता, जब भर जाता है आसमान गुंजार से !

गुरुवार, जनवरी 29

यदि मेरे हाथों में शासन की बागडोर हो

यदि मेरे हाथों में शासन की बागडोर हो
 
.....तो खोल डालूं पांच सितारा होटल के द्वार
उन निर्धन मजदूरों के लिये
जिन्होंने कड़ी धूप में तपकर खड़े किये थे
 वे गगनचुम्बी महल....
 
और दूर दराज के गावों में
जहाँ न सड़के हैं न बिजली
रहने को भेज दूँ मोटे-मोटे खादी धारियों को...
 
आलीशान बंगलों में
खाली पड़े हैं जो, सन्नाटा गूंजता है जहाँ
स्कूल और अस्पताल चलाऊँ
विवश हैं जो लम्बी कतारों में लगने को
उनको वहाँ दाखिला दिलाऊँ...
 
मिलावट करने वाले हों या कालाबाजारी
भेज दूँ उनको, उनकी सही जगह
और मेहनतकश, कर्मठ हाथों को
ईमानदारी से शुद्ध सामान बेचने में लगा दूँ...
 
जो भूल गए हैं ड्यूटी पर आना
ऐसे अध्यापकों, डाक्टरों, अधिकारियों या पायलटों को
रिटायर कर दूँ किसी भी उम्र में
और काम करने को आतुर लोगों की
रिटायरमेंट उम्र बढा दूँ जितनी वे चाहें....
 
जहरीली दवाएं और जहरीली खादें 
धरती को विषैला न बनाएँ
ऐसा फरमान निकालूं
विकलांग न हों जिससे
दूषित भोजन को खाकर और बच्चे...
 
टीवी पर आने वाले झूठे विज्ञापनों के जाल से
मुक्त करूं आम जनता को
बढ़ावा मिले योग और सात्विकता को
हर बच्चे की पहुँच हो
संगीत व नृत्य तक
पेड़ लगाना अनिवार्य हो जाये
हर बच्चे के जन्म पर....
 
विज्ञान के साथ-साथ
साहित्य पढ़ने वाले विद्यार्थी भी
उच्च पदों पर आयें
कलाविहीन मानव
पशु रूप में और न बढ़ने पाएँ...
 
गर्व हो अपनी संस्कृति पर ऐसे
मंत्री बनाऊँ
सरकारी ठेके की दुकानों पर दूध-लस्सी की
नदियाँ बहाऊँ...
 
ख्वाब तो यही है कि
न हो अन्याय किसी के साथ
हर किसी के पास हो
सम्मान से जीने का अधिकार...
 

बुधवार, जनवरी 28

समुद्री यात्रा

समुद्री यात्रा


समुन्दर की असंख्य लहरों पर 

डोलती, झूमता हुआ मस्त खटोले सी 

बढ़ता जाता है जहाज 

आकाश और समुंदर जहाँ मिलते हैं 

क्षितिज पर धूमिल हो गया है भेद 

आकाश छू रहा है लहरों को 

या लहरें उठती चली गई हैं उस तक 

सर्पिली लहरें फेन बनाती हुई नाच रही हैं 

जो बिखर जाता है पल भर में 

जीवन की नश्वरता का बोध कराता हुआ 

 शाश्वत है जल पर लहरें नश्वर 

ज्यों शाश्वत है जीवन, जगत नश्वर 

सामने बिछी है जल की अनंत राशि 

 आह्लादित हैं सैकड़ों दिल जिसे निहार

 संजो रहे हैं मनों में 

यह अनुभव शायद पहली बार !



रविवार, जनवरी 25

बहे अटूट प्रेम की धारा

77वें  गणतंत्र दिवस के अवसर पर 


भारत भू की गौरव गाथा 

आज सुनाने का दिन आया, 

 संविधान का पर्व मनाते

जिसको इस दिन था अपनाया ! 


  पावन संस्कृति अति पुरातन

विश्व साथ दे हर उत्सव में, 

भजन क्लबिंग कर युवा आज के 

भक्तिभाव जगायें उर में !


 वन्य प्रांत भी बढ़ता जाता 

नदियाँ भी नव जीवन पाएँ,

अक्षय ऊर्जा का प्रयोग कर 

ग्लोबल वार्मिंग नित घटाएँ !

 

उत्तर दिशा विराट हिमालय 

सागर तट सुंदर दक्षिण में, 

 भारत की सीमाएँ सुरक्षित 

मार्ग दिखाता नवाचार में, 


 जहाँ कहीं भारतवासी हों

विजयी तिरंगा जब फहराते, 

बहे अटूट प्रेम की धारा 

अनायास ही दिल जुड़ जाते !


विकसित राष्ट्र की नींव डल रही 

दूर बहुत अभी जाना है, 

 पाएँ सभी अधिकार समान 

यही मूल्य नित अपनाना है !


शुक्रवार, जनवरी 23

वसंत पंचमी

वसंत पंचमी  



खिले कुसुम महकी अमराई 

  मधु वासंती पवन बही है,  

ऋतुराजा का स्वागत करने 

 क़ुदरत सारी निखर रही है !


 सरसों फूली खलिहानों में 

कण-कण जीवंत हुआ भू का, 

 प्रीत जगाये रस अंतर में

नव उमंग नव भरे ऊर्जा ! 


सृष्टि में संगीत संजोने 

स्वरदेवी का हुआ अवतरण, 

कर वीणा तारों को झंकृत 

ज्ञान ज्योति का किया प्रस्फुटन !


रविवार, जनवरी 11

नये साल की कविता

नये वर्ष के लिए हार्दिक शुभकामनाएँ 


नये साल में निर्दोष न मारे जायें 

 हो नहीं अन्याय का शिकार भी कोई, 

बंद हों युद्ध, करें  निर्माण देशों का 

हो हितैषी ‘ए आइ’ न छल करे कोई !


मिटे विषमता, हर भेद मिटे दुनिया से 

हर इंसान, इंसान की क़ीमत जाने, 

दिल की गहराई में झांक सके मानव 

नहीं किसी को, कभी भी पराया माने !


एक ही लौ, जल रही है हरेक दिल में 

 संग शीतलता के जो उजाला देती, 

नूतन वर्ष  में बने वही पथ प्रदर्शक 

युगों-युगों से जो सदा हौसला देती !