सूर्य देव राशि बदलेंगे
संधिकाल आया ऋतुओं का
रुत शीत विदा लेने को है,
खेतों में सरसों फूलेगी
कुसुमाकर अब दूर नहीं है !
धरा घूमती निशदिन अनथक
सूर्य देव राशि बदलेंगे,
आम्र वाटिका महक उठेगी
तिल गुड़ के उपहार बँटेगे !
माना शीतल पवन अभी भी
हाड़ कँपाती हुई बहेगी,
किंतु आ रही आहट कोई
सूर्य रश्मियाँ यही कहेंगी !
खिचड़ी पोंगल की सुगंध से
महक उठेंगे सब घर आँगन,
रंग-बिरंगी कनकैया से
होगा सज्जित यह नीलगगन !
लोहरी की अग्नि ज्वाला में
मन से हर इक भेद मिटेगा,
मकर संक्रांति पर एक हुआ
भारत नई दिशा पकड़ेगा !

