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शुक्रवार, दिसंबर 27

नया वर्ष

नया वर्ष 


चार दिन है शेष हैं 

फिर वर्ष यह खो जाएगा 

स्मृति बनाकर इतिहास के पन्नों में 

सहेज लिया जाएगा 

कितने सुख-दुख 

अपने दामन में छिपाये 

कितनी बार रोये मन 

कितना मुस्कुराए 

धरती ने सही कितने ही दंश 

गगन पर घन कितने छाये 

देशों के भाग्य बने, टूटे 

 मौसम ने कितने

ख़ुद में बदलाव लाए 

जीवन यूँही चलता जाए 

हर नया वर्ष कुछ पल थम 

ख़ुद को देखने का

 अवसर दे जाये 

व्यक्ति, समाज और राष्ट्र 

सभी को अवलोकन कराए  

जो बीत गया उससे देकर सीख 

नया वर्ष आगे ले जाये ! 


शुक्रवार, जून 23

हम किधर जा रहे हैं


हम किधर जा रहे हैं

कितना बौना हो गया है समाज 

‘आदि पुरुष’ इसकी बानगी है 

बन गये हैं शास्त्र 

मनोरंजन का साधन 

छा गये हैं महानायकों के चरित्र पर 

कॉमिक्स और विदेशी कार्टून  

प्रबल हो गया है अंधकार का साम्राज्य 

अतीत का गौरव भुला देना चाहते हैं हम 

ताकि कोई उसे पुन: जीवित न कर सके 

शायद इसीलिए उसे विद्रूप भी कर रहे हैं 

जहां विमान था ऐश्वर्य का प्रतीक 

अब पशु प्रबल हो गया है 

जीवन का यह आधुनिक रूप है 

यहाँ भाषा की गरिमा नहीं रही 

हर मर्यादा टूट गई 

संस्कृति की रक्षा का दम भरने वाले ही 

आज उसके हंता नज़र आ रहे हैं 

पता नहीं कैसा है यह काल 

और हम किधर जा रहे हैं ? 


गुरुवार, मार्च 4

आने वाला है महिला दिवस

आने वाला है महिला दिवस 


मात्र नारी शक्ति का प्रतीक नहीं है 

बल्कि  याद दिलाता है यह दिवस कि 

अभी भी हो रहे हैं उनपर अत्याचार 

इक्कसवीं सदी में भी हो रहा है आए दिन ही 

उनके साथ दुर्व्यवहार 

अखबार के पन्नों पर तो कुछ ही खबरें आ पाती हैं 

मगर उन खबरों की हकीकत भीतर तक डरा जाती है 

महिलायें क्या-क्या कर रही  हैं 

यह तो जग जाहिर है 

मात्र उसे न दोहराएं 

बल्कि एक वंचित नारी के अधिकारों को याद कराएं !

आज के दिन प्रशंसा सुनकर अपनी 

स्वयं की पीठ न थपथपायें 

जो महिलायें अभी भी कुचली जाती हैं 

उनके दर्द को भी बाहर लाएं !

महिला दिवस कोई उपलब्धि नहीं है नारी के लिए 

एक चुनौती है 

नन्ही बच्चियों से लेकर बुजुर्ग माताएं तक 

होती हैं जहाँ  हिंसा व अपमान का शिकार 

हर उस बात को बाहर लाना है 

समाज को आईना दिखाना है !

जायदाद में अधिकार से वंचित रखा गया 

सदियों तक महिलाओं को 

नहीं था वोट देने का अधिकार 

न ही शिक्षा का 

 योगदान का जिक्र कहाँ होता है उस अनाम स्त्री  के

जो हर बार मिलती रही है एक सफल पुरुष के पीछे 

इस महिला दिवस पर यही मनाएं कि  

हर वर्ग की स्त्री समानता का अधिकार पाए !


गुरुवार, दिसंबर 4

विश्व विकलांग दिवस पर



मृणाल ज्योति – एक आश्वास

दुलियाजान, कुमुद नगर स्थित गैर सरकारी संस्था मृणाल ज्योति आज एक चिर परिचित नाम है, जो पिछले पन्द्रह वर्षों से विशेष बच्चों की सहायता में जीजान से संलग्न है. इस समय यहाँ के स्कूल में एक सौ चालीस बच्चे पढ़ते हैं. जिनमें से सतासी छात्र तथा चौसठ छात्राएँ हैं. यहाँ मानसिक रूप से अविकसित विद्यार्थियों की संख्या छियासठ है तथा सुनने-बोलने में बाधित उन्नीस बच्चे हैं. चार छात्र ऐसे हैं जिन्हें शारीरिक व मानसिक दोनों प्रकार की बाध्यता है. सतावन सेरीब्रल पालसी से बाधित हैं.  चार ऑटिस्टिक हैं   तथा एक  लोकोमोटर बाध्यता से ग्रस्त है. इन सभी प्रकार के बच्चों के पूर्ण विकास के लिए हर सम्भव प्रयास किया जाता है. उन्हें रोजमर्रा के कार्यों के योग्य बनाया जाता है. उन्हें स्वच्छता तथा सामान्य व्यवहार की शिक्षा दी जाती है. कला तथा नृत्य के माध्यम से उनमें आत्मविश्वास जागृत किया जाता है. विभिन्न हुनर सिखाकर उन्हें भविष्य में आत्मनिर्भर बनने की प्रेरणा दी जाती है. यहाँ कक्षा आठ तक की शिक्षा का प्रबंध भी है. जो बच्चे सामान्य स्कूल में जाने के योग्य हो जाते हैं उन्हें स्थानांतरित कर दिया जाता है. अठारह वर्ष तक उन्हें यहाँ रखा जा सकता है, इसके बाद वे यदि चाहें तो कुछ वर्ष और भी रुक सकते हैं. माता-पिता का सहयोग मिले तो ये बच्चे भविष्य में अपना रोजगार भी शुरू कर सकते हैं और किसी हद तक एक सम्मानजनक सामान्य जीवन जी सकते हैं. किन्तु देखा गया है जब इस स्कूल में सीख कर बच्चे अपना दैनिक क्रियाकलाप करने योग्य हो जाते हैं तो माता-पिता उन्हें स्कूल भेजना बंद ही कर देते हैं और कुछ ही दिनों में बच्चे सीखा हुआ भी भूल जाते हैं और पुनः उसी स्थिति में पहुंच जाते हैं जहाँ वे पहले-पहल आए थे. इसलिए मृणाल ज्योति ने समय-समय पर माता-पिताओं को भी प्रशिक्षण देना आरम्भ किया है.
बदलते हुए समय के साथ आज समाज में इनके जैसे व्यक्तियों के योगदान को नकारा नहीं जा सकता. यदि इन्हें अपने अधिकारों से रूबरू कराया जाये और सम्मानजनक जीवन जीने के अवसर प्रदान किये जाएँ तो ये बच्चे भी बहुत कुछ कर के दिखा सकते हैं. देखा जाये तो कमी किस इन्सान में नहीं है. समाज में कितने ही व्यक्ति ऐसे हैं जो शारीरिक व मानसिक रूप से पूरे सक्षम हैं पर समाज पर बोझ हैं, यदि वे किसी नशे की आदत के शिकार हैं या अपराधी प्रवृत्ति के हैं. जबकि ये बच्चे यदि इन्हें विशेष शिक्षा दी जाये समय पर उचित सहायता दी जाये तो राष्ट्र के विकास में अपनी भूमिका निभा सकते हैं. यह सही है कि समाज से विकलांगता को पूरी तरह मिटाया तो नहीं जा सकता पर इसे अभिशाप समझने की मानसिकता से बचा अवश्य जा सकता है. किसी भी कीमत पर इन्हें हीन भावना का शिकार नहीं होने देना है. प्यार और स्नेह से इन्हें सींचना है और बदले में इनके प्रेम को महसूस करना है. हर तरह से प्रोत्साहित करना है न कि इन्हें उपहास का पात्र समझना है. शारीरिक अक्षमता का यह अर्थ नहीं कि कोई मानसिक रूप से भी अक्षम है, इनमें भी भावनाएं हैं. इन्हें भी बराबरी से जीने का हक है.

सरकार ने भी ऐसे बच्चों के लिए कई योजनाये बनायी हैं. समान अवसर देना, अधिकारों की रक्षा करना और पूर्ण सहभागिता विकलांग व्यक्ति अधिनियम के अंतर्गत आते हैं. समय-समय पर सरकार द्वारा सहायक उपकरण प्रदान किये जाते हैं, छात्र वृत्तियाँ और पुरस्कार प्रदान किये जाते हैं. शासकीय नौकरियों में आरक्षण की व्यवस्था भी है. समाज का कर्त्तव्य है कि इनमें आत्मविश्वास जगाकर आत्मनिर्भर बनाने में मदद करे और सामान्य जीवन जीने का जज्बा पैदा करे. मृणाल ज्योति संस्था इनके पुनर्वास के लिए अनथक काम कर रही है और भविष्य में भी करती रहेगी.      

मंगलवार, दिसंबर 3

आज विश्व विकलांग दिवस है



एक ज्योति स्नेह की

मृणाल ज्योति कुमुद नगर, दुलियाजान में स्थित एक ऐसी संस्था है, जहाँ हर किसी का स्वागत किया जाता है. जहाँ के विशेष बच्चे, जिन्हें देखकर पहले-पहल मन में पीड़ा जगती है, अपनी मुस्कान से अतिथियों का मन हल्का कर देते हैं, चाहे वे स्वयं छोटी-छोटी खुशियों से भी वंचित क्यों न हों. यह एक ऐसी संस्था है जिसका उद्देश्य बाधाग्रस्त बच्चों को, जो किसी न किसी कारण से स्वयं को अक्षम पाते हैं, इतना समर्थ बनाना है जिससे वे भी समाज में सम्मान पूर्वक जी सकें. शारीरिक, मानसिक, एन्द्रिक या बौद्धिक विकास में किसी प्रकार की कमी से ग्रस्त बच्चे विकलांगता की श्रेणी में आते हैं. ऐसे बच्चों के लिए विशेष स्कूल खोलने की आवश्यकता होती है क्योंकि उन तक ज्ञान व संदेश पहुँचाने की विधि भिन्न है. १९९९ में जब इस संस्था का जन्म हुआ, इस क्षेत्र में ऐसे विशेष बच्चों के लिए, जिन्हें खास देखभाल की जरूरत होती है, कोई स्कूल नहीं था. धीरे-धीरे इस संस्था का विस्तार हुआ और आज इस क्षेत्र की यह एक मात्र संस्था है जिसमें लगभग एक सौ चालीस बच्चों का दाखिला हुआ है, उनमें से कुछ जो दूर रहने के कारण तथा कुछ ज्यादा अस्वस्थ होने के कारण नियमित रूप से स्कूल नहीं आ पाते, उनके घर जाकर माता-पिता को इस बात से अवगत कराया जाता है कि वे अपने बच्चों को रोजमर्रा के कार्यों को करने में कैसे आत्मनिर्भर बनाएं. यहाँ ट्रेनिंग पाए हुए शिक्षक भी हैं और फिजियोथेरेपिस्ट द्वारा इलाज की सुविधा भी. ज्यादातर बच्चे गरीब तबकों से आते हैं, जिनकी विकलांगता का कारण कुपोषण भी हो सकता है और माँ का अस्वस्थ होना भी.
आज इस संस्था ने चौदह वर्ष पूर्ण कर लिए हैं, और शिक्षा, इलाज तथा पुनर्वास के लिए पूरे मनोयोग से काम कर रही है. दुलियाजान के आस-पास तथा दूर-दराज के गावों से भी लोग इस संस्था से जुड़े हैं, ताकि वे रोजगार दिलाने वाली शिक्षा द्वारा बेहतर जीवन जीने के अवसर पा सकें. यहाँ समय-समय पर मछली पालन, पौधों की नर्सरी बनाना, बत्तख पालन, सिलाई का काम, वेल्डिंग आदि सिखाया जाता है. हाथ से कलात्मक वस्तुएं बनाना, राखियाँ तथा दीये बनाना भी सिखाया जाता है. कुछ बच्चे जो यहाँ शिक्षा पा चुके हैं अपना निजी रोजगार खोल चुके हैं, कुछ दुकानों पर मैकेनिक का काम करते हैं.

यहाँ पैर से लिखने तथा चित्र बनाने वाले एक छात्र को तथा सुंदर नृत्य करते छात्र-छात्राओं को देखकर सहज ही मन में विचार उठता है कि विकलांगता अभिशाप नहीं है, यह एक चुनौती है. शारीरिक रूप से अक्षम होते हुए भी कई बच्चे मानसिक रूप स्वस्थ हैं, कुछ में सुनने की क्षमता न होते हुए भी सीखने का पूर्ण जज्बा है. यूँ देखा जाये तो जीवन में सबसे बड़ी कमी है ‘उत्साह की कमी’ जो अच्छे-भले इन्सान को निर्बल बना देती है. इन बच्चों का उत्साह देखते ही बनता है. वास्तविकता यह भी है कि इस दुनिया में कोई भी पूर्ण नहीं है. कोई न कोई कमी तो हरेक में होती ही है. इन्हें विकलांग न कहकर विशेष कहना ज्यादा उचित होगा जिन्हें कुछ विशेष सुविधाएँ चाहियें. मृणाल ज्योति जैसी संस्थाएं समाज के निर्माण में महत्वपूर्ण भूमिका निभा रही हैं, वे पीड़ित परिवारों के जीवन में आशा की किरण जगाती हैं, उन्हें एक ऐसे पथ का ज्ञान कराती हैं जो शक्ति, उत्साह तथा क्षमता से भरा है.    

बुधवार, अगस्त 8

राह इंसानियत की - धीरज कुमार का काव्य संसार


महादेवी वर्मा ने कहीं कहा है, ‘कविता भाषा का फूल है’, कविता हमें अपने आसपास को देखने की एक नयी नजर देती है, जिन बातों को हम रोज अखबार में पढ़कर भुला देते है वे किसी कवि को विचलित कर देती हैं और उसकी दृष्टि से समाज समस्या को अपने स्तर पर न केवल महसूस करता है, बल्कि उसके विरोध में खड़ा भी होता है

खामोश खामोशी और हम के चौथे कवि हैं बिहार के छोटे से जिले नवादा के निवासी धीरज कुमार. इन्हें लिखने का शौक रेडियो पर गजलों का कार्यक्रम सुनकर हुआ. आजकल यह हैदराबाद में फ्रेंच भाषा के छात्र हैं. गजल सुनना व लिखना इनकी रुचि है. इस पुस्तक में इनकी तीन रचनायें हैं.
पहली रचना राह इंसानियत की में मजहब के नाम पर होने वाले नफरत के खेल पर कई सवाल उठाये गए हैं-

बेहतर है रास्ता इंसानियत का उसे है चुना किसने
होते हैं फसाद पल-पल ये मजहब का जाल है बुना किसने
...  ...
दुनिया की आंधी दौड़ में मजहब भी अब कहीं गम हो गए
वो एक दीया इंसानियत का जल रहा था दिया है बुझा किसने

दूसरी रचना में समाज में नारियों की दहेज के नाम पर होते अत्याचार के खिलाफ आवाज उठाई गयी है, मेरी नन्हीं शीर्षक से लिखी कविता उम्मीद की लौ जगाती है, जिसमें लेखक एक ऐसे समाज की रचना का ख्वाब देखता है जहाँ उसकी अजन्मी बच्ची चैन से जन्म ले सके और आजादी से जी सके.

हर रोज की तरह
चाँद ने आखिरी करवट ली  
और सूरज ने आपने मुँह से चादर हटायी
मैं भी निकला सैर को
...
रास्ते में एक अनजानी रूह से मुलाकत हो गयी
देखा और चौंका
ये तो वही बुधिया थी
जो आई थी कल अखबार में
जला दिया गया था जिसे दहेज को
....
यूँ लग रहा था कि
मेरी ही बेटी को जला दिया गया है
...
फिर लगा मेरी नन्हीं भी तो
आँख खोलेगी इसी वसुंधरा पर
उसे भी जला दिया जायेगा
और पिता होकर भी
मैं कुछ न कर पाउँगा
... ..
सामने ही संसद भवन था
दूरी तो ज्यादा नहीं थी
पर फासला बहुत था जो तय करना था

...
अकेला चलने को भी तैयार था
नन्हीं ने लड़ने की शक्ति दी थी
..
मेरी नन्हीं तुम आओ इस धरा पर
तुम्हें मिलेगा एक स्वछन्द जीवन, उन्मुक्त हवा
एक पिता का वादा है तुमसे

अंतिम कविता का शीर्षक नूर-ए-इश्क है-

चाँदनी गर तेरा नूर है, तो इश्क मेरा नूर है
चाँद गर जिंदगी तेरी, तो इश्क मेरा जरूर है
... ...
अभी दो पहर गुजरे हैं, अभी मीलों का सफर है बाकी
चल-चला तू ये न सोच कि मंजिल कितनी दूर है

धीरज जी की रचनाओं में समाज को विद्रूपताओं से मुक्त करने की तड़प है और एक ऐसे समाज का सपना भी जहाँ सभी प्रेम से रहते हों. आशा है आपको भी इन्हें पढ़कर सुकून मिलेगा.


  



रविवार, अगस्त 7

मृणाल ज्योति


प्रिय ब्लोगर मित्रों, मृणाल ज्योति से आप परिचित हैं, यह दुलियाजान, जिला डिब्रूगढ़, असम राज्य में स्थित एक स्वयंसेवी संस्था है जो शारीरिक व मानसिक रूप से बाधित बच्चों को समाज में पुनर्स्थापित करने का कार्य कर रही है. आज इसकी वार्षिक आम सभा थी जिसमें यह कविता मैंने पढ़ी, मैं आप सभी के साथ इसे बांटना चाहती हूँ. जैसा कि आमतौर से इस तरह की संस्थाओं में होता है फंड की जरूरत बढती जाती है, जैसे-जैसे संस्था आगे बढती जाती है. यदि इस तरह की हर संस्था धीरे-धीरे आत्मनिर्भर हो जाये तो इसे दान पर निर्भर नहीं रहना पडेगा. लेकिन इसके लिए भी आरम्भ में समाज की सहायता तो चाहिए ही.  


मृणाल ज्योति

आत्मनिर्भर यह बनेगा, आगे बस आगे बढ़ेगा
मृणाल ज्योति दीप बन कर, हर अँधेरे से लड़ेगा

तन-मन से जो प्रतिबंधित हैं, नव जोश उनमें भरेगा
सृजन करके कुछ नया अब, निज पांव पर खड़ा होगा

अभी कार्य बहुत शेष है, उत्साह लेकिन न घटेगा
स्वच्छता का ध्यान रखके, नए कुछ मानक गढ़ेगा

भवन नूतन इक बना है, थेरेपी का सेंटर बनेगा
सहयोग पा समाज का, नित नए सोपान चढ़ेगा

शिक्षकों की अथक सेवा, कर्मचारी गण समर्पित
दिल में सबके एक लक्ष्य, कार्य करते रात-दिन

राखियां रंगीन सुंदर, प्रेम का संदेश देतीं
दीपकों के रंग मनहर, जगत में भरते हैं ज्योति

स्वप्न देखे है सदा यह, समतल पूरा मैदान बनेगा
बरस के थक जाएँ बादल, नहीं इसमें जल भरेगा

नर्सरी भी एक सुंदर, बाग फूलों का खिलेगा
निज नए उद्योग पनपें, कोष इससे भी बढ़ेगा

शिक्षा के साधन नवीन पा, नई विधियों पर चलेगा
हस्त कौशल भी सिखाकर, सक्षम छात्रों को करेगा

व्यवसाय नये खोल, रोजगार औरों को देगा
मृणाल ज्योति अगले बरस में, नए कीर्तिमान रचेगा

आपका सहयोग चाहे, आपसे ही यह कहेगा
आप मित्रों पर है श्रद्धा, आप से ही स्नेह मिलेगा